Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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परिवार

320 सूत्र · पृष्ठ 3 / 5

नारी की उन्नति और अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति और अवनति निर्भर है।
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जिस व्यक्ति के घर में सुशील, सुन्दर, स्वस्थ, शिक्षित स्त्री होती है वह घर निश्चित ही सौधर्म इन्द्र के भवन से ज्यादा सुखकर माना जाता है।
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वही स्त्री उत्तम सहधर्मिणी है, जिसमें सुपत्नीत्व के सब गुण विद्यमान हो और जो अपने पति की सामर्थ्य से अधिक व्यय नहीं करती है।
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विवाहित होना 'पार्ट ऑफ लाइफ' है और विवाहित होकर भी मुस्कुराकर शान्ति से जीना 'आर्ट आफ लाइफ' हैं।
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शादी वो जख्म है जिसमें चोट से पहले हल्दी लगाई जाती है।
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लाइफ को सुखी रखने के लिए वाइफ को सुखी रखें।
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अच्छी स्त्री से विवाह जीवन रूपी तूफान में बन्दरगाह के समान है और बुरी स्त्री से विवाह बन्दरगाह में तूफान के समान हैं।
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अपनी स्त्री की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करते हुए मनुष्य अपनी सन्तान, चरित्र, कुल, स्वयं को और धर्म को सुरक्षित कर लेता है।
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नारी विवाह के दिन ही रोती है और पुरुष विवाह के बाद जीवन भर रोता है।
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जो स्त्री लोकमान्य और विद्वान् पुत्र को जन्म देती है, स्वर्गलोक के देवता भी उसकी स्तुति करते हैं।
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सोलह वर्ष की होने पर शूकरी जैसी स्त्री भी अप्सरा जैसी लगने लगती है।
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जिस घर में पति-पत्नी में झगड़ा नहीं होता वहाँ लक्ष्मी निवास करती है।
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घर बनाने वालों के लिए मेरा यह सूत्र है कि स्वामी से घर की शोभा हो, घर से स्वामी की नहीं।
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बालक अथवा कामिनी स्त्री के किसी कारण से मन में कुपित होने पर उनको मोदकादि भोज्य पदार्थ और अलंकारादि के देने से उनका शरीर प्रफुल्लित रोमांचित हो जाता है और अनेक इष्ट क्रियाओं को करते हुए वे अपने स्वामी के बारे में मधुर भाषण करती हैं।
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शादी होते ही बेटों की बुद्धि बिगड़ जाती है इसलिए भविष्य के बारे में सोचकर बुढ़ापे के लिए थोड़ा धन बचाकर रखिए।
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जो अपने भुजबल से कमाकर अपनी पत्नी को नहीं पाल सकते वे विवाह करने का विचार त्याग दें क्योंकि ससुराल की दौलत पर नजरें रखने वाले विवाह के योग्य नहीं होते हैं।
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आत्मनिर्भर होने से पहले शादी मत कीजिए, वरना पछताना पड़ेगा।
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बलात्कार पूर्वक (जबरदस्ती) कन्या का अपहरण करना 'राक्षस विवाह' है।
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वर के लिए योग्य पदार्थ देकर कन्या देना 'आर्ष विवाह' है।
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अपनी कमाई का भरोसा रखो, औलाद का नहीं।
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सहनशीलता और संयम ही गृहस्थ जीवन की गाड़ी के पहिए हैं।
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सफलता की सड़क पर चलने के लिए अपनी अर्द्धांगिनी का सहयोग लीजिए उसका कंधा आपके कंधे को मजबूत करेगा।
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सास-ससुर के चेहरे में माता-पिता का चेहरा देखिये वे माता-पिता बन जायेंगे।
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वही सबसे सुखी है, चाहे वह राजा हो या किसान, जो अपने घर में शान्ति पाता है।
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स्त्री में भला-बुरा दोनों करने की अटूट शक्ति है।
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स्त्री पुरुष की गुलाम नहीं–सहधर्मिणी, अर्द्धांगिनी और मित्र है।
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हर पुरुष की तरक्की के पीछे किसी स्त्री का हाथ अवश्य होता है।
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सच्ची पत्नी पति पर अंकुश नहीं लगाती और पति को अपने हाथों की कठपुतली नहीं बनाती है।
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यौवनावस्था में नारी गृहदेवी, प्रौढ़ावस्था में सच्ची मित्र, वृद्धावस्था में परिचारिका होती है।
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नारी प्रेम, त्याग, सेवा और उत्सर्ग भावना द्वारा ही पुरुष पर शासन करती है।
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नारी की आँखों में कानून से भी अधिक शक्ति होती है और किसी भी तर्क से अधिक प्रभावशाली उसके आँसू होते हैं।
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एक स्त्री हजारों पुरुषों को सन्मार्ग पर ला सकती है।
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एक धर्मपत्नी अपने पति को परमेश्वर बना देती है, जैसे चेलना ने श्रेणिक को कल्याण मार्ग पर लगा दिया था।
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जो नारी अपने पति या पुत्रों को सदैव प्रसन्न रखती है, उसके समक्ष संसार की महारानी का वैभव भी तुच्छ है।
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यह निर्भ्रांत सत्य है कि बालकों की मानसिक शक्तियाँ स्त्री के स्नेह की छाया में जितनी पुष्ट और विकसित हो सकती हैं, उतनी किसी अन्य उपाय से नहीं।
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पति अगर गिरता हो, तो उसको संभालना स्त्री का काम है।
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मनुष्य को विवाह न करना श्रेष्ठ है किन्तु विवाहित स्त्री की उपेक्षा करना उचित नहीं है।
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स्त्री की स्वतंत्रता के स्थान–सन्तान का परिपालन, गृहस्थी के दैनिक कार्यकलाप, शारीरिक श्रृंगार और पति के साथ शयन इन चार कार्यों में ही स्त्रियों को स्वतंत्रता देनी चाहिए, अन्य में नहीं। जैसे–अच्छी तरह स्वादिष्ट भोजन कराया हुआ कुत्ता अपवित्र हड्डियों को चबाना नहीं छोड़ सकता, सैकड़ों शिक्षाओं से समझाया गया बन्दर भी अपनी चंचलता नहीं छोड़ता, गन्ने के रस से सींचा गया नीम का वृक्ष अपना कड़वापन नहीं छोड़ता, सर्प मीठा दूध पीने पर भी अपनी विष प्रकृति नहीं छोड़ता ठीक उसी तरह वेश्याएँ भी धन के लोभ से अपनी व्यभिचार कराने की प्रकृति नहीं छोड़ सकती, स्त्रियाँ अपनी चंचलता नहीं छोड़ सकतीं अतः इनसे सदा दूर रहना चाहिए।
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स्त्रियों में स्वभाव से ही मायाचारी पायी जाती है।
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गायक-वादक में तालमेल न हो तो संगीत शोर गुल बन जायेगा उसी प्रकार पति-पत्नि में तालमेल न हो तो गृहस्थी महाभारत बन जायेगी।
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पुण्य संचय करने वाली स्त्रियों में पति का अति प्रेम रहता है।
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बाला स्त्री खेलने के समय दिये फल और भोजन से प्रसन्न होती है, जवान स्त्री वस्त्र और आभूषणादि से हर्षित होती है, प्रौढ़ स्त्री रति क्रीड़ा की कुशलता से प्रमुदित होती है और वृद्ध स्त्री मधुर भाषण तथा आदर सत्कार से अनुरक्त होती है।
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जो स्त्री आज्ञाकारिणी हो, संतुष्ट हो, दक्ष हो, साध्वी हो, पतिव्रता हो तथा विदुषी हो वह श्रेष्ठ लक्ष्मी होती है, इसमें संशय नहीं है।
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संसार में स्त्री अविश्वास की पात्र होती है।
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स्त्रियाँ मायाचारी से देवों के गुरु को भी ठग लेती हैं।
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याद रखिये जिन्दगी में वह सुखी नहीं हुआ, जिन्हें श्रेष्ठ जीवन साथी मिला, सुखी तो वे हैं जिन्होंने अपने साथी को श्रेष्ठ बना लिया है।
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कभी सोचा है कि पत्नी को बेगम क्यों कहते हैं? क्योंकि शादी के बाद सारे गम पति के हिस्से में आ जाते हैं अतः पत्नि बे-गम हो जाती है।
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विवाह को एक पिजँड़े के सदृश कहा जा सकता है, इसके बाहर के पक्षी प्रवेश न कर पाने से परेशान रहते हैं और अंदर के पक्षी बाहर न हो पाने से परेशान रहते हैं।
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शीघ्रता में विवाह करने पर लोग फुरसत से पश्चाताप करते हैं।
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देखने की अपेक्षा दूसरे से उसके बारे में सुनकर पत्नी का चुनाव करना चाहिए।
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जिस घर में पति-पत्नि एक दूसरे के प्रति समभाव नहीं रखते, वहीं दरिद्रता का निवास होता है, वहाँ उन दोनों का जीवन निष्फल होता है।
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वही भार्या उपयुक्त है जो पवित्र और कार्य कुशल है, पतिव्रता है, पति से प्रेम करने वाली है और सदा सत्य बोलती है।
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स्त्री यदि प्रसन्न रहे तो सारा कुल प्रसन्न रहता है और यदि स्त्री दुःखी रहती है तो सब कुछ बुरा लगता है।
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गृहस्थी के संचय में और स्वार्थ की उपासना में तो सारी दुनिया मरती है।
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जो पत्नि अपने पति का अपमान करती है, उसे लोक परलोक में कहीं शान्ति नहीं मिल सकती है।
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जो घर के काम-धन्धे में निपुण है, जो संतानवती है, जो मात्र पति को ही सब कुछ समझती है और जो पतिव्रता है, वही सच्ची भार्या है।
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जिसकी पत्नी अनुकूल है, उसका स्वर्ग यहीं है और जिसकी पत्नी प्रतिकूल है उसका नरक यहीं है।
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पति और पत्नी का एक दूसरे पर मृत्यु पर्यन्त पूर्ण विश्वास हो, संक्षेप में यही उनके लिए श्रेष्ठ धर्म है।
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अनुराग के बिना विवाह का कोई अर्थ नहीं होता है।
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विवाह एक जुआ के समान है, जिसमें पुरुष को अपनी स्वतंत्रता एवं स्त्री को अपनी प्रसन्नता दाँव पर लगाना पड़ती है।
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पूर्वजों की कीर्ति की रक्षा, देवपूजन, अतिथि सत्कार, बन्धु बान्धवों की सहायता और आत्मोन्नति ये गृहस्थ के पाँच कर्म हैं।
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जो लोग अपनी स्त्री के चरणों की अर्चना में ही लगे रहते हैं, वे कभी भी महत्त्व को प्राप्त नहीं कर सकते हैं और जो महान् कार्यों के करने की अभिलाषा रखते हैं, वे ऐसे निकृष्ट प्रेम के पाश में नहीं फँसते हैं।
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जिन लोगों के विचार महत्त्वपूर्ण कार्यों में रत हैं और जो सौभाग्य लक्ष्मी के कृपा पात्र हैं, वे अपनी स्त्री के मोहजाल में फँसने की कुबुद्धि नहीं करते हैं।
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जिस घर परिवार में सभी लोग प्रसन्न रहते हैं वह घर पृथ्वी पर स्वर्ग है और जहाँ सभी आपस में संघर्ष करते हैं, झगड़ते हैं वह घर नरक है।
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जब नाखून बड़े होते हैं तब नाखून ही काटे जाते हैं अंगुलियाँ नहीं, इसी प्रकार अगर रिश्तों में दरार आ जाये तो दरार मिटाइये रिश्तों को नहीं।
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जिसके घर में माता अथवा प्रिय बोलने वाली पत्नि नहीं है, उसे वन में चले जाना चाहिए क्योंकि उसके लिए जैसा वन वैसा घर।
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गृहस्थ जीवन स्नेह एवं धर्म युक्त हो तो वही उसका सौन्दर्य एवं फल होता है।
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माँ जो भी बनाए उसे बिना नखरे किए खा लिया करो क्योंकि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जिनके पास या तो खाना नहीं होता है या माँ नहीं होती है।
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मिलते हैं हजारों लोग, पर हजारों गलतियाँ माफ करने वाले माँ-बाप दुबारा नहीं मिलते हैं। लोगों से कह दो हमारी तकदीर से जलना छोड़ दें क्योंकि हम घर से दवा नहीं माँ की दुआ लेकर चलते हैं।
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माँ संसार का सुन्दर शब्द है, माँ कहते ही कलेजा भर आता है जवान मीठी हो जाती है और आँखों से गंगा जमुना बहने लगती है।
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देखो सच्चा प्यार! जब पति ने अपना पसीना पत्नि के दुपट्टे से पोछना चाहा तो पत्नि बोली दुपट्टा गंदा मत करो। जब माँ के दुपट्टे से पोछना चाहा तो माँ बोली ये गन्दा है साफ लाके देती हूँ।
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जिन मूर्तियों को हम बनाते हैं उनकी हम पूजा करते हैं, पर जिन्होंने हमें बनाया है हम उन माता-पिता कि सेवा क्यों नहीं करते हैं?
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दुनिया के सभी रिश्तों में माँ का रिश्ता सबसे बड़ा है क्योंकि उसकी आयु सभी रिश्तों से नौ माह अधिक है।
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जिन्दगी की वह उम्र जब इंसान को प्रेम की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह बचपन है।
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घर के बाहर भले ही दिमाग ले जाओ क्योंकि दुनिया एक बाजार है, लेकिन घर में दिल लेकर आना क्योंकि वहाँ एक परिवार है।
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