Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
दान

चतुर्विधस्य सङ्घस्य, वैयावृत्यमगर्हितं। अन्नौषधिभिर्दिव्यं, वात्सल्यमभिधीयते।।

मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका की आहार-औषधि आदि के द्वारा प्रशंसनीय सेवा करना दिव्य वात्सल्य कहलाता है।

Rendering praiseworthy service to the monk, nun, layman and laywoman through food, medicine and the like is called divine vatsalya (affection).

— आराध्य सूत्र · #32

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परोपकार में सर्वदा संलग्न रहने वाला सज्जन व्यक्ति विनाश के अवसर पर भी विनाश करने वाले से भी शत्रु भाव नहीं रखता है जैसे चन्दन का वृक्ष काटने वाले कुल्हाड़े का भी मुख सुगन्धित कर देता है।
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