Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Charity

दान

491 सूत्र · पृष्ठ 4 / 7

संसार में ऐसी कौन सी दुर्लभ वस्तु है जो सेवा से प्राप्त न हो सके।
दान
जो स्त्री देश को तेजस्वी, नीरोग और सुशिक्षित सन्तान भेंट करती है, वह भी सेवा ही करती है।
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मानव, मानव के साथ केवल उपकार करके ही अपने को देवतुल्य बनाते हैं।
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स्वाध्याय और सेवा दोनों के अवसर एक साथ आ जाएँ तो सेवा श्रेष्ठ है।
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अगर पुण्योदय से आपको सम्पत्ति मिले तो स्वयं की सेवा के लिए भले ही नौकर रख लेना किन्तु माँ, महात्मा और परमात्मा की सेवा के लिए नौकर न रखें। प्रभु की प्रार्थना और माँ–बाप की सेवा स्वयं करना चाहिए।
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विधवा, विकलांग और अनाथ सेवा के प्रथम अधिकारी हैं।
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दूसरों का अहित करने से अपना अहित और दूसरों का हित करने से अपना हित होता है।
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जैसे माँ का दूध उसके अपने लिए न होकर बच्चे के लिए ही है, ऐसे ही मनुष्य के पास जो भी सामग्री है, वह उसके अपने लिए न होकर दूसरों के लिए ही है।
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कभी सेवा का मौका मिल जाय तो आनन्द मनाना चाहिए कि भाग्य खुल गया।
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सेवा से शत्रु भी मित्र बन जाता है।
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बिना प्रदर्शन के जो सेवा करता है, वह शीघ्र ऊँचाई पर पहुँच जाता है।
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बंधुभाव से की हुई सेवा की अपेक्षा आत्मभाव से की हुई सेवा उत्तम है।
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सेवा के लिए पैसे की जरूरत नहीं होती, जरूरत है अपना संकुचित जीवन छोड़ने की, गरीबों से एकरूप होने की।
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केवल वही व्यक्ति सबकी अपेक्षा उत्तम रूप से कार्य करता है, जो पूर्णतया निःस्वार्थी है, जिसे न तो धन की लालसा है, न कीर्ति की और न किसी अन्य वस्तु की।
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वृद्ध, बच्चे, बीमार व कमजोर पशुओं की सेवा अपने बन्धुओं की तरह करनी चाहिए।
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मैं हर काम आऊँ यह जरूरी नहीं, पर मैं हर किसी के काम आऊँ यह जरूर सोचता हूँ।
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जिनका भोजन पात्र के लिए है, धन का उपार्जन दान के लिए है और जीवन धर्म के लिए है, वे मनुष्य स्वर्गगामी देव होते हैं।
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वृक्ष अपने काटने वाले को भी छाया देता है।
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उपकार करके प्रत्युपकार न चाहना सज्जनता है।
दान
उपकार करना सबसे बड़ा धर्म है, कार्य निपुणता सबसे बड़ा अर्थ है, सुपात्र को दान देना सबसे बड़ी तृप्ति है तथा वैराग्य सबसे बड़ी मुक्ति है।
दान
सेवा करने से हृदय शुद्ध होता है अहंकार दूर होता है और बहुत शान्ति मिलती है भारतीय आदर्श भी है सेवा और त्याग।
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बिना कारण ही जो उपकार किए जाते है उनका फल अवश्य मिलता है।
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किसी को कुछ देने की इच्छा हो तो आत्म विश्वास जगाने वाला प्रोत्साहन सर्वोत्तम उपहार रूप में दें। ''उपहार का आदान–प्रदान मैत्री को मजबूत करता है।''
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कदाचित् भाग्य की प्रतिकूलता से माता भी विकार को प्राप्त हो जावे परन्तु अच्छी तरह की गई वृद्ध सेवा किसी भी देश व किसी भी काल में विकार को प्राप्त नहीं होती है।
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परोपकारी, सदाचारी दूसरे के हितार्थ अपनी आपत्ति की भी परवाह नहीं करता है।
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जब किसी जरूरतमंद की आवाज आप तक पहुँचे तो परमात्मा को धन्यवाद देना कि उसने अपने भक्त की मदद के लिए आपको चुना, वरना वो तो सबके लिए अकेला ही काफी है।
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मदद करने के लिए सिर्फ धन की ही नहीं एक अच्छे मन की भी जरूरत होती है।''जो सादगी में महत्त्व है, भलाई है, वह दौलत में नहीं'' जो हम प्राप्त करते हैं उससे हमारा जीवन बनता है तथा जो हम देते हैं उससे दूसरों का जीवन बनता है अत: अपने साथ–साथ दूसरों का जीवन भी बनाएँ।
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साधु दयालु और पवित्र होते हैं, वे अपकार होने पर भी उपकार करते हैं।
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दिल से दूसरों की सेवा करो तो दुआओं का दरवाजा खुल जायेगा।
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जो व्यक्ति रोगी, दु:खी, गुरु, माता–पिता और वृद्धजनों की सेवा करता है वह नियम से मुक्ति लक्ष्मी को प्राप्त करता है। कहा भी है ''सेवा करो मेवा पाओ''
दान
जब हम एक दूसरे की मदद करने या उन्हें समझाने मुड़ते हैं तो हम अपने दुश्मनों की संख्या कम कर देते हैं।
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जिन्दगी, धन और सत्ता के संचय का नाम नहीं है, बल्कि आशीर्वादों के मोती एकत्रित करने का नाम है, जहाँ धन और सत्ता की प्राप्ति के लिए शोषण और जुल्म अनिवार्य है वहाँ आशीर्वादों के मोती बटोरने के लिए किसी को पीड़ित करने की नहीं बल्कि दूसरों की पीड़ा हरने की जरूरत है।
दान
गुण रहित शरीर प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है, इसका एक ही महान् गुण है कि यह परोपकार का साधन है।
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करुणा से आर्द्र सज्जन सभी के निःस्वार्थ बन्धु होते हैं।
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अपने विनाश की ओर जाने वाले शत्रुओं को भी सज्जन दयालुता वश उपदेश देते हैं।
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अगर मेरे पास बहुतेरे साधन होते तो मैं कितनी ज्यादा सेवा कर सका होता, इस उधेड़बुन में पड़ने की अपेक्षा जो साधन आज तुम्हारे पास मौजूद हैं उनके द्वारा की गयी जरा सी मदद भी कहीं कीमती है।
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माँगने पर देना अच्छा है लेकिन आवश्यकता अनुभव करके, बिना माँगें देना और भी अच्छा है।
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व्यक्ति बहुत प्रत्युपकार करने पर भी पूर्व उपकारी के समान शोभा नहीं पाता है क्योंकि एक तो उपकृत होने पर उपकार करता है जबकि अन्य तो निष्कारण उपकार करता है।
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अपने उपाय से ही उपकारी का उपकार करना चाहिए उपकार बड़ा है या छोटा–इस प्रकार का विद्वानों का विशेष आग्रह नहीं होता है।
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जिस धनी पुरुष का जन्म याचक जन की इच्छा को पूर्ण करने के लिए नहीं है, उस पुरुष से ही यह पृथ्वी अत्यन्त भार वाली है न कि पेड़ों, पर्वतों या समुद्रों से।
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यह महापुरुषों का स्वभाव है कि वे आपत्ति में पड़े हुए लोगों से सहानुभूति रखते हैं।
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साधु पुरुष की सम्पत्ति थोड़ी भी हो तो भी दूसरों के काम आती है किन्तु दुष्ट की विपुल सम्पत्ति भी किसी के काम नहीं आती है।
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अपने को प्रकट किए बिना उपकार करना, छोटों को क्षमा कर देना, बिना माँगे देना, गुणों से प्रेम करना, बहुतों में से कुछ ही लोग जानते हैं।
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जैसे चन्द्रमा चाण्डाल को भी चाँदनी देता है वैसे ही सज्जन पुरुष गुणहीन प्राणियों पर भी दया करते हैं।
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दीन दु:खी एवं पीड़ित बंधुओं की सेवा करने में जो गौरव युक्त आनंद मिलता है, वह सभ्य समाज की दावतों में नहीं प्राप्त होता है।
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उन्नति का मूल मंत्र, सेवा और प्रेम है न कि आज्ञा और बल प्रयोग।
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महापुरुषों के प्रति सद्भाव पूर्ण उपकार शीघ्र ही फल देता है।
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तलवार मारे एक बार, अहसान मारे बार–बार।
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तृण तुल्य भी उपकार क्यों न हो, उसके फल को समझने वाले उसे ताड़ के समान मानेंगे।
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अच्छे लोग दूसरों के सन्ताप से सन्तप्त रहते हैं, यही उनके लिए परमात्मा की सर्वोच्च आराधना है।
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करुणा से आर्द्र हृदय वाले व्यक्ति सभी के अकारण बंधु होते हैं।
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धन, यश कमाने वाला नहीं, प्राणिमात्र के प्रति करुणा के भाव से जो चिकित्सा करता है, वह महान् है।
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वे जिनके हृदय में सदैव परोपकार की भावना रहती है उनकी आपदाएँ समाप्त हो जाती हैं और पग–पग पर धन की प्राप्ति होती है।
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करुणा करने वालों का शरीर परोपकारों से शोभा पाता है, चन्दन से नहीं।
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परोपकार के लिए मरने का सौभाग्य तो संस्कार वालों को ही प्राप्त होता है।
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जो दूसरों की भलाई करना चाहता है, उसने अपना भला तो कर ही लिया है।
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भलाई करना कर्त्तव्य नहीं आनन्द है क्योंकि वह तुम्हारे स्वास्थ्य और सुख में वृद्धि करती है।
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जो मेरे साथ भलाई करता है, वह मुझे भला होना सिखा देता है।
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जो मनुष्य दुष्ट से धन लेकर सज्जन को देता है, वह स्वयं को नाव बना कर दोनों को पार लगा देता है।
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डूबने वाले के साथ सहानुभूति का अर्थ यह नहीं कि उसके साथ डूब जाओ बल्कि तैरकर उसे बचाने का प्रयास करो।
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जीवन का सुख दूसरों को सुखी करने में है, दूसरों को लूटने में नहीं है।
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सुख बाँटने से बढ़ता है दु:ख बाँटने से घटता है।
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जो सच्ची सेवा करने वाला है उसका प्रचार तो अपने आप होने वाला है।
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हम अतिथि सेवा के माहात्म्य का वर्णन नहीं कर सकते कि उसमें कितना पुण्य है क्योंकि अतिथि सेवा का महत्त्व तो अतिथि की योग्यता पर निर्भर है।
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सेवा भाव को प्रदर्शित करने वाला विनम्र वचन बोलता है, मित्र बनाता है तथा बहुतों को लाभ पहुँचाता है।
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अवसर पर जो उपकार किया जाता है, वह देखने में छोटा भले ही हो परन्तु जगत् में सबसे महान् है।
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उस सद्व्यवहारी पुरुष को देखो जो दूसरे के कामों को भी अपने विशेष कार्यों के समान ही देखता–भालता है, उसके उद्योग–धन्धे अवश्य उन्नति करेंगे।
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हार्दिक उपकार से बढ़कर न कोई चीज इस भूतल पर मिल सकती है और न स्वर्ग में।
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जिन लोगों को उचित और योग्य बातों का ज्ञान है, वे बुरे दिन आने पर भी दूसरों का उपकार करने से नहीं चूकते हैं।
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परोपकारी जीव उसी समय अपने को गरीब समझता है जबकि वह सहायता माँगने वालों की इच्छा पूर्ण करने में असमर्थ होता है।
दान
याचक के ओठों पर संतोषजनित हँसी की रेखा देखे बिना दानी का मन प्रसन्न नहीं होता है।
दान
आत्मजयी की विजयों में श्रेष्ठजय है 'भूख को जीतना' पर उससे भी बढ़कर उस मनुष्य की विजय है जो दूसरों की क्षुधा को शान्त करता है।
दान
किसी रोते हुए को हँसाना और मरते हुए को बचाना ईश्वर की सबसे बड़ी प्रार्थना है।
दान
मनुष्यों के रूप में परमात्मा सदा आपके सामने है, अत: उनकी सेवा करो।
दान
जो पुरुष अतिथियों की सेवा करता है वह देवताओं का सुप्रिय अतिथि बनता है।
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