Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Anger & Forgiveness

क्षमा

455 सूत्र · पृष्ठ 4 / 7

जो बदला लेने की सोचता है वह अपने ही घाव हरा-भरा रखता है।
क्षमा
गुस्सा और तकरार से बिगड़ी बातें, प्रेम पूर्ण व्यवहार से सुधर जाती हैं, गुस्सा स्वर्ग को नरक बना देता है।
क्षमा
पाँच बातें- 1.कभी किसी का दिल दुःखाने वाली बात मत कहो, 2.जो भी तुम्हारा भला करे उसकी बात मानो, 3.अधिक योग्य बने विना बड़ों की बराबरी का दावा मत करो, 4.जहाँ ज्ञान की दो बातें मिलें, ध्यान से सुनो, 5.जब किसी से द्वेष हो तब सोचो ये अपना ही तो है क्योंकि अपने से कभी घृणा और द्वेष नहीं होता है।
क्षमा
निन्दक से रूष्ट होना अपने लिये हानिकारक है।
क्षमा
क्रोध अदृश्य ज्वाला है जो भीतर ही भीतर सुलगता है जो अपने अद्वितीय व्यक्तित्व को राख कर देता है।
क्षमा
छोटी-मोटी गलतियों पर अप्रसन्न न हों।
क्षमा
रौब-धौंस की प्रवृत्ति घातक है, दूसरों से व्यवहार में कभी क्रोध न करें।
क्षमा
नफरत न दिखाएँ, चाहे सामने वाला बिल्कुल पसन्द न हो।
क्षमा
क्या आपका गुस्सा आने के दूसरे क्षण ही उतर जाता है?
क्षमा
क्या आपका गुस्सा आपके काबू में रहता है?
क्षमा
क्या आप दूसरों की गालियाँ सुनकर भी शान्त रहते हैं?
क्षमा
वर्णी जी के साथ शिखरजी यात्रा में सागर वालों का रसोइया था, वर्णी जी को भोजन रुचा नहीं, नाराज होकर बोले तुम्हरे हाथ का भोजन नहीं करेंगे, स्वयं भोजन बनाया तीन घण्टे लग गये, धुँआ से आखों में दर्द हो गया, रात में स्वप्न में बाईजी ने कहा! तुम गुस्से में यात्रा करोगे तो नरक जाना पड़ेगा, भावना पवित्र होना चाहिए।
क्षमा
दुर्जनों को गले लगाना सच्चा शङ्कर बनने का रास्ता प्रभु ने बताया है।
क्षमा
कषाय से आकुलित होकर सज्जनों के द्वारा निन्दनीय कार्य हो जाने पर अन्त में जो पश्चाताप किया जाता है, वह पापों को नाश करने वाली निन्दा कहलाती है।
क्षमा
महान् दुर्निवार कलुषता के कारण उपस्थित हो जाने पर भी अन्तरङ्ग में क्षोभ नहीं होना उपशम कहलाता है।
क्षमा
अपनी आँखों की लालिमा स्वयं को नहीं दिखती है, स्वयं के दोष भी स्वयं को नहीं दिखते हैं, इसलिए दूसरा बताता है तो सुधारना चाहिए, नाराज नहीं होना चाहिए, अशुभ सूचना सुनकर नाराज होना फ़ोन फेंकने के सामान है।
क्षमा
क्रोध इंसान को शैतान बना देता है, क्रोध दोस्त को दुश्मन बना देता है। अरे क्रोधाग्नि में जलने वालों, क्रोध गुलशन को वीरान बना देता है।।
क्षमा
क्षमा- जिसमें क= कषायों का, श= शमन हो और मा= माँ की तरह जो आत्मा की रक्षा करे उसे क्षमा कहते हैं।
क्षमा
कषायों को उपमा-क्रोध अन्धा, मान बहरा, माया गूँगी और लोभ नकटा होता है।
क्षमा
क्रोध उत्पत्ति के कारण- इच्छा पूर्ति में बाधा होना, मनचाहा न होना, मानसिक अस्त-व्यस्तता, अस्वस्थता, भोजन और मौसमादि का प्रभाव।
क्षमा
यदि आप से हर व्यक्ति खुश है तो आपने जीवन में बहुत से समझौते किए हैं, यदि आप हर व्यक्ति से खुश हैं तो आपने दूसरों की बहुत सी भूलों को अनदेखा किया है।
क्षमा
हर बार क्रोध करने पर कुछ सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।
क्षमा
क्रोध धीमा किन्तु घातक जहर है।
क्षमा
क्रोध से रक्त में उबाल आता है।
क्षमा
हृदय की धड़कन, रक्त सञ्चार एवं रक्तचाप में वृद्धि हो जाती है।
क्षमा
नाड़ी मण्डल भी क्षुब्ध हो जाता है।
क्षमा
मन की स्थिति में भयंकर परिवर्तन आ जाता है।
क्षमा
चेहरा, आखें, कान लाल हो जाते हैं।
क्षमा
वाणी और शरीर में कम्पन होने लगता है।
क्षमा
भाषा अनियंत्रित एवं आचरण विवेक हीन हो जाता है।
क्षमा
शनैः-शनै: शरीर में अनेक विकृतियां पनपने लगती है।
क्षमा
आयुर्वेद के अनुसार शरीर में पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है।
क्षमा
एसिडिटि, अपच, अल्सर, भूख न लगना, पाचन क्रिया आदि की समस्या पैदा हो जाती हैं।
क्षमा
क्रोध से होने वाले तनाव से मधुमेह, पागलपन, हृदयरोग की आशङ्का बढ़ जाती है।
क्षमा
कभी-कभी इससे दिल का दौरा, लकवा, ब्रेन हेमरेज तक हो जाता है।
क्षमा
क्रोध में व्यक्ति की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा नष्ट हो जाता है, इसके कारण कमजोरी आती है।
क्षमा
क्रोधी काँपता है एवं गुस्से के बाद शरीर शिथिल हो जाता है।
क्षमा
क्रोधी व्यक्ति से उसके परिजन, मित्र, हितैषी भी बोलते हुए कतराते हैं।
क्षमा
गुम-सुम वातावरण, सन्नाटा जैसा छाया रहता है।
क्षमा
क्रोधी के हित की बात भी स्वजन बताने का साहस नहीं कर पाते हैं।
क्षमा
परिणाम स्वरूप क्रोधी अलग-थलग पड़ जाता है, कुण्ठित हो जाता है।
क्षमा
इस प्रकार उस पर दोगुनी मार पड़ती है।
क्षमा
एक तो क्रोध का तनाव, दूसरा अलग-थलग पड़ने एवं कुण्ठा ग्रस्त होने का तनाव।
क्षमा
इन तनावों से व्यक्ति धीरे-धीरे शारीरिक एवं मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाता है।
क्षमा
क्रोध से नुकसान ही नुकसान है, इससे पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन तो खराब होता ही है।
क्षमा
स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है।
क्षमा
गाली देने वाला तभी विजयी होता है जब सुनने वाला नाराज हो।
क्षमा
जिस प्रकार अग्नि किसान के कष्ट से सञ्चित धान्य को जला देती है, उसी प्रकार क्रोध भी व्रती के समस्त पुण्य को क्षण भर में जला देता है।
क्षमा
परस्पर के घर्षण से वन के वृक्षों में अग्नि उत्पन्न होने पर वे वृक्ष ही जलते हैं, परन्तु क्रोध रूपी अग्नि नियम से सम्यग्दर्शन रूपी वृक्ष को भी जला देती है।
क्षमा
क्रोध देव गति को नष्ट कर, नरकगति में पहुंचाता है एवं सम्यग्दर्शन, विभूति, आयु और यश आदि का भी क्षय करता है।
क्षमा
सुन्दर मनुष्य भी क्रोध के समय वानर के समान हो जाता है व क्रोध से पाप का बन्ध कर करोड़ों जन्मों में कुरूप होता है।
क्षमा
लोभ से क्रोध होता है, क्रोध से बैर होता है और बैर से शास्त्र का जानकार विद्वान् पुरुष भी नरक जाता है।
क्षमा
पुत्र को लेकर पति-पत्नि में विवाद हो गया- पत्नि कहती मैं बेटे को डॉक्टर बनाऊँगी, पति कहता मैं बेटे को वकील बनाऊँगा। जज ने कहा! बच्चे से पूँछो वह क्या बनना चाहता है, बोले! बच्चा तो अभी हुआ ही नहीं।
क्षमा
बुढ़िया ने क्रोध में रोटी नहीं खाई पर बहु का दिमाग खा लिया।
क्षमा
जैसे वस्त्र के ऊपर लगा छोटा सा दाग वस्त्र पहनने का मजा बिगाड़ देता है, ट्यूब में हुआ छोटा सा पञ्चर कार को बेकार कर देता है, वैसे ही बैर की लगी छोटी सी गाँठ जीवात्मा को परमात्मा होने से रोक देती है।
क्षमा
क्रोध बुरे विचारों की खिचड़ी है, उसमें द्वेष, भय, तिरस्कार, घमण्ड, अविवेक सब मिले होते हैं।
क्षमा
क्रोध को हम बारूद के समान विस्फोटक और रासायनिक गैस की तरह अत्यन्त ज्वलन शील पदार्थ मान सकते है। क्रोध के समय विवेक नष्ट हो जाता है। वर्षों की मित्रता को क्रोध क्षण में नष्ट कर देता है।
क्षमा
क्रोध चारित्र मोह की प्रकृति है इससे संयम का घात होता है और निकट तम सम्बन्ध को भी तोड़ देता हैं।
क्षमा
प्रतिशोध के समय बोध अन्धा होता है एवं क्षमा माँगने पर क्षमा करना अहङ्कार को पुष्ट करना है।
क्षमा
क्रोध अग्नि या चण्डाल है, वह शरीर और क्षमादि गुणों को जलाता है।
क्षमा
क्रोध अज्ञानता से शुरू होता है और पश्चात्ताप पर खत्म होता है।
क्षमा
बहुत क्लेश से सञ्चित हुए यश और तप क्रोध से क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।
क्षमा
क्षमा के समय परमात्मा और क्रोध के समय राक्षस एक ही व्यक्ति के दो पहलु होते हैं।
क्षमा
सभी को भूलना अच्छा है पर स्वंय को भूलना पागलपन है, लेकिन व्यक्ति क्रोध के समय स्वयं को भूल जाता है।
क्षमा
क्रोध इञ्जन है, अविवेक और अज्ञान उसके दो पहिए हैं।
क्षमा
क्रोध के लक्षण शराब और अफीम से मिलते हैं।
क्षमा
क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, आदि बुद्धि का नाश तो करते ही हैं, निराशा के भी जनक हैं, निराशा तनाव की जननी है और तनाव अनेक रोगों की जड़ है, पेट के घाव में तनाव अहम भूमिका निभाता है।
क्षमा
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रम, स्मृति के नाश से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
क्षमा
जिनका मन वश में नहीं होता है वे क्षण भर में सन्तुष्ट हो जाते हैं और क्षणभर में गुस्सा हो जाते हैं उनकी प्रसन्नता भी दुःखदायी होती है।
क्षमा
वैर, अग्नि, व्याधि, विवाद और व्यसन ये पाँच वकार अनर्थकारी हैं।
क्षमा
हिरण घास में सन्तुष्ट रहता है, मछली जल में सन्तुष्ट रहती है, सज्जन सन्तोषी होते हैं फिर भी शिकारी हिरन का, मछुआरा मछली का और दुष्ट लोग सज्जनों के अकारण बैरी होते हैं।
क्षमा
कषाय से अनुरञ्जित चित्त में तत्त्व अवगाहित नहीं होता जैसे नीले रङ्ग के वस्त्र में कुमकुम का रङ्ग चढ़ता नहीं है।
क्षमा
उत्तम प्रकृति के पुरुष क्षण भर क्रोध करते हैं, मध्यम प्रकृति के एक मुहूर्त, जघन्य प्रकृति के चौबीस घण्टे और चाण्डाल प्रकृति के मर जाते है पर क्रोध नहीं छोड़ते हैं।
क्षमा
यशोधर का यशवर्धन- श्रेणिक ने अपने शिकार में बिघ्न जान यशोधर मुनिराज के गले में सर्प मारकर डाल दिया, तीन दिन बाद चेलना से कहा तो चेलना श्रेणिक को लेकर मुनिराज के पास पहुँची, मुनिराज के ऊपर सेकड़ों चींटियों का उपसर्ग हो रहा था। चेलना ने उपसर्ग दूर किया। मुनिराज ने ध्यान खोला तो दोनों ने नमोस्तु किया। मुनिराज ने दोनों को धर्म वृद्धि का आशीर्वाद दिया। श्रेणिक को पश्चाताप हुआ, कि मैंने मुनिराज को तीन दिन भूखा रखा, उपसर्ग किया, उसके बाद भी ये हमारा कल्याण चाहते हैं। मेरे स्थान पर यदि कोई दूसरा होता तो मैं उसे मृत्यु दण्ड देता। अब मैं स्वयं राजा हूँ और स्वयं अपराधी हूँ, अतः मुझे स्वयं आत्मघात कर लेना चाहिए। मुनिराज मनःपर्यय ज्ञानी थे अतः वे श्रेणिक के मन की बात जान गये, और बोले राजन्! आत्मघात करना तो पाप है ही आत्मघात की बात सोचना भी पाप है। ऐसा सुनकर श्रेणिक को आश्चर्य हुआ और सोचा ये तो साक्षात् भगवान् हैं, और अत्यधिक पश्चात्ताप करते हुए मुनि से क्षमा माँगकर प्रणाम किया, जिससे सम्यक्त्व को प्राप्त कर, बाद में भगवान महावीर के पादमूल में क्षायिक सम्यक्त्व और तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया, जिसके प्रभाव से सप्तम नरक की तेंतीस सागर की आयु घटकर पहले नरक की मात्र चौरासी हजार वर्ष शेष रह गयी, यह था क्षमा का प्रभाव।
क्षमा
क्रोधान्ध राजा- प्यास से पीड़ित राजा जङ्गल में भटक गया था, थककर एक वृक्ष के नीचे लेट गया, थोड़ी देर बाद आँख खुली तो उसने देखा कि वृक्ष की खोह से कुछ-कुछ पानी बह कर आ रहा है, राजा ने पत्तों का दोना बनाया पानी भरने को रख दिया दोना भरा था कि एक तोते ने दोने को नीचे गिरा दिया, बड़ी खिन्नता हुयी, पुनः पानी इकट्ठा किया तोते ने फिर गिरा दिया
क्षमा