Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 409

प्रसूति गृह में सङ्कल्प।

25 सूत्र

सिद्धों को, अर्हन्तों को और मुनियों को बार-बार नमस्कार करके आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी कहते हैं कि यदि दुःखों से छुटकारा चाहते हो तो मुनिपने को अङ्गीकार करो।
धर्म
मुनि दीक्षा होते ही संसार आधा हो जाता है, गुणस्थान सात हो जाते हैं, मोक्ष के लिये चौदह गुणस्थान पार करना होते हैं, मोहनीय की अट्ठाईस प्रकृति में से चौदह समाप्त हो जाती हैं।
कर्म
गुरु की भक्ति से और संयम से घोर संसार सागर को तैर जाते हैं, आठों कर्मों का नाश करके जरा-मरण रहित हो जाते हैं, जो नित्य ही व्रत मन्त्र एवं ध्यान रूपी अग्नि में कर्मों का हवन करते हैं, षट् कर्मों में रत रहते हैं और तप ही जिनका धन है, वे सम्यक् क्रिया वाले साधु होते हैं।
संयम
हे भगवन्! आपने अपने दोषों को ध्यान के तेज से भस्म कर दिया था।
ध्यान
दिन में सूर्य, रात में चन्द्रमा अन्धकार को नष्ट करता है और हृदय के गाढ़ अन्धकार को गुरू ही दूर करते हैं।
ज्ञान
संसार में गुरू कृपा सबसे निराली, होली यही दशहरा यह ही दिवाली। जो शिष्य है वह सदैव ऋणी रहेगा, कोई कभी न उपकार चुका सकेगा।।
भक्ति
प्रसूति गृह में किया संकल्प- प्रसूति की पीढ़ा से स्त्री को भोगों से वैराग्य होता है उस काल में भोगों के त्याग का सोचती है पर बाद में भूल जाती है।
अनासक्ति
विद्याधर जी से पूँछा मन्दिर कितनी दूर है? सत्ताईस बार णमोकार पढ़ने में जितना समय लगता है अर्थात् बाल्यवस्था से ही णमोकार के संस्कार थे।
णमोकार
आचार्य ज्ञानसागर जी ने कजोड़ीमल जी से पूँछा विधाधर पढ़ता है या नहीं? रात में देखा तो पूरी रात पढ़ते ही मिले।
पुरुषार्थ
आचार्यश्री से पूँछा विधवा विवाह होना चाहिए या नहीं, आचार्यश्री ने कहा मैं तो सभी विवाहों का विरोधी हूँ।
अनासक्ति
आचार्यश्री का प्रथम दीक्षा दिवस मनाने के लिए आचार्य ज्ञानसागरजी से अनुमति ली, उन्होंने कहा विद्या से पूँछ लो, लोगों ने उनसे पूँछा कल आपका दीक्षा दिवस मनायेंगे, आशीर्वाद दे दो, आचार्यश्री ने कहा! देख लो, दूसरे दिन तैयारी हो गयी, आचार्य श्री ध्यान में बैठ गए उठे ही नहीं, लोगों ने पूँछा महाराज आपने दीक्षा दिवस नहीं मनाया, आचार्य श्री ने कहा हमने तो ध्यान में बैठकर अच्छे से मनाया।
ध्यान
कोमलता- कुण्डलपुर में आचार्यश्री के पास आर्यिकायें आयीं, नमोऽस्तु करके बैठ गयीं, वहाँ हल्की सी धूप थी आचार्यश्री वहाँ से उठे, ताकि आर्यिकायें छाया में बैठ जायेंगी।
विनम्रता
कठोरता- नेमावर में भारी वर्षा सामने दिख रही थी, फिर भी आर्यिकाओं का विहार करा दिया, शिष्यों की दृढ़ता की परीक्षा कठोरता पूर्वक ली।
पुरुषार्थ
इन्द्रियों के विषयों को त्याग कर पुनः कितना भी कष्ट आये, सहते रहने वाले को सहिष्णु कहते हैं।
संयम
गृहीत व्रतों का कभी त्याग नहीं करने वाला अच्युत कहलाता है।
चरित्र
पतङ्ग की डोर जब तक हाथ में है तब तक अस्तित्व है, छूटने पर कोई ठिकाना नहीं कहाँ जा कर गिरेगी, इसी प्रकार शिष्य की डोर जब तक गुरु के हाथ में है, तब तक ही उन्नति होती है।
भक्ति
आचार्य श्री पक्षी की तरह आवास वाले हैं, कोई मठ, महल, कोठी अपने लिए नहीं रखते हैं।
अनासक्ति
इन्द्रिय दमन और कषाय का शमन जहाँ होता है उसे दीक्षा कहते हैं।
संयम
आठ दर्शन, आठ ज्ञान, तेरह चारित्र, बारह तप मिलकर इकतालीस प्रकार की आराधना कहलाती है।
धर्म
संसार शरीर भोगों से वैरागी साधु होता है इनमें जो राग करे वह स्वादु होता है।
अनासक्ति
आशीर्वाद के समय हाथ का पञ्जा कुछ झुका रहता है, अर्थात् 'मिल कर रहो और नम्र बनो' यह शिक्षा देता है।
विनम्रता
आचार्य श्री की दीक्षा स्थली अजमेर में जिनालय बनाया गया है, जन्मस्थली सदलगा में भी जिनालय बनाया गया है।
भक्ति
दीक्षा पर्व मनाने- तप का दीपक श्रद्धा वाती ज्ञान का दीप जलाने, भक्ति भाव घी डाल-डाल कर दीक्षा पर्व मनाने। अशुभ भाव तज भक्ति करना गुरुवर की शुभ भावों से, दीक्षा का सम्बन्ध जुड़ा है मात्र भीतरी भावों से।।
भक्ति
दीक्षा एक लड़ाई है- दीक्षा एक लड़ाई है, जिसको लड़ने में ही भलाई है। जो खुले मैदान में, बाहर नहीं वालों से, भीतर वालों से लड़ी जाती है। गुरू चरणों में सिर कर, आत्म समर्पण अदृश्य कर्म शत्रुओं से लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है... दिगम्बरत्व को धार कर, अम्बर को त्याग कर। विषय सरिता पार कर, कटीले रास्ते को पार कर लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है... यह एक खुली किताब है, जिसमें अनन्त का हिसाब है। जो मौन होकर, चर्म चक्षुओं को बन्द कर, ज्ञान चक्षुओं से लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है...
संयम
आदिनाथ भगवान के परिवार की तरह आचार्यश्री के परिवार ने भी दीक्षा ली, यह कम नहीं, परोपकार के कार्य करके आज भी सैकड़ों जैन बना कर आचार्यश्री द्वारा आहार किया जाता है।
दान