Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 58

संस्कारों का शंखनाद

128 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

हे भगवन्! मेरा बोलना आपकी जाप हो, मेरी चेष्टाएँ आपकी उपासना से सम्बद्ध मुद्राओं की रचना हो, चलना आदि प्रदक्षिणा लगाना हो, भोजन करना आपको विधिवत् दी गयी आहुतियाँ हो, भूमि में लेटना आपके लिए प्रणाम हों, इस प्रकार जितना भी मेरा विलास और चेष्टाएँ हैं, वे सब आत्मार्पण की विधि से की गई आपकी पूजा के पर्यायवाची हो जाएँ।
भक्ति
उपासना के द्वारा विवेक उत्पन्न होता है, विवेकी होने से क्षणिक वस्तुओं का शोक और आनन्द ये दोनों ही नहीं होते हैं।
विवेक
सच्चा यज्ञ अपने भीतर की कषायों की आहूति देना है।
संयम
पूज्य पुरुषों की पूजा पूर्वक किए हुए कार्य अवश्य ही सफल होते हैं।
भक्ति
भगवान् के भक्त बनना भिखारी नहीं क्योंकि भक्त को बिन माँगे मिलता है जबकि भिखारी द्वार–द्वार पर माँगता फिरता है।
भक्ति
अन्य क्षेत्र में हुआ पाप धर्म क्षेत्र में नष्ट हो जाता है, धर्म क्षेत्र में किया पाप वज्र लेप के सदृश हो जाता है अत: धर्म क्षेत्र में निवास करते समय थोड़ा–सा भी पाप न करें।
धर्म
यदि तुम सर्वज्ञ परमेश्वर के श्री चरणों की पूजा नहीं करते हो तो तुम्हारी सारी विद्वत्ता किस काम की है?
भक्ति
जो मनुष्य प्रभु के गुणों का उत्साहपूर्वक गान करते हैं, उन्हें अपने–बुरे कर्मों का दु:खद फल नहीं भोगना पड़ता है।
भक्ति
संसार भर के धर्म ग्रन्थ, सत्य वक्ता महात्माओं की महिमा का घोष करते है।
धर्म
रूप तो सिर्फ आँखों तक ही पहुँचता है जबकि गुण सीधे आत्मा तक पहुँचते हैं।
चरित्र
मस्तिष्क इस शरीर का सबसे बड़ा कारखाना है, उसे कबाड़खाना मत बनाइये।
मन
गुण का जानकार ही गुणी मनुष्य से प्रेम करता है, गुणरहित मनुष्य को गुणी मनुष्य में सन्तोष नहीं होता हैं। भ्रमर वन से कमल के पास आता है, परन्तु मेंढक एक तालाब में निवास करने पर भी कमल के पास नहीं जाता है।
संगति
जिस परिवार में तीन पीढ़ियाँ एक साथ मिलकर भोजन और भजन करते हैं वह घर धरती पर साक्षात् स्वर्ग है।
परिवार
अच्छा स्वभाव सदा सौन्दर्य के अभाव को पूरा कर देता है किन्तु सौन्दर्य अच्छे स्वभाव के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकता है।
चरित्र
जब घर में अतिथि हो तब चाहे अमृत ही क्यों न हो, अकेले नहीं पीना चाहिए।
परिवार
जो बचपन और जवानी में भजन–साधना नहीं करते, वे प्राय: बुढ़ापे में भी भजन–साधना नहीं कर सकते हैं।
भक्ति
यदि माँ–बाप बच्चे का बचपन सम्हाल देते हैं तो बालक माँ–बाप का बुढ़ापा सम्भाल देता है।
परिवार
संस्कार बिना सुविधाएँ पतन का कारण हैं।
चरित्र
शिक्षा एक ऐसी चीज है जिसकी जड़ें तो कड़वी होती हैं, परन्तु फल हमेशा बहुत ही मीठे होते हैं।
ज्ञान
नैतिक व्यक्ति धार्मिक हो जरूरी नहीं किन्तु हर धार्मिक व्यक्ति नैतिक होता है।
चरित्र
दुर्जन और सज्जन सुई की नोक और पीछे के भाग के समान आचरण करते हैं। एक तो छेद करता है और दूसरा (पीछे का भाग) गुणवान् (धागे वाला) होने से छेद को बंद कर देता है।
चरित्र
पहले के लोग घर में कोई कुत्ता न घुस आये इसके लिए एक आदमी रख लेते थे, आज घर में कोई आदमी न आये इसके लिए एक कुत्ता रख लेते हैं।
विविध
सत्ता बुरी नहीं सत्ता का नशा बुरा है।
चरित्र
दो ही चीजें मनुष्य को दु:खी करती हैं–एक वस्तु का अभाव और दूसरा बुरा स्वभाव।
चरित्र
तर्क खोपड़ी की खुजलाहट है और श्रद्धा आत्मा की सजावट है।
भक्ति
तर्क पाप से जोड़ता है और श्रद्धा परमात्मा से जोड़ती है।
भक्ति
बुद्धिजीवी तर्क करते हैं और हृदय जीवी समर्पण करते हैं।
भक्ति
भूल होना स्वाभाविक है पर सबके सामने उसे मानने की हिम्मत करना महापुरुषों का ही काम है।
विनम्रता
अच्छी बात चाहे किसी धर्म, किसी आदमी की ही क्यों न हो उसे अवश्य ही ग्रहण करो।
ज्ञान
प्रेम ईमानदारी व स्वार्थ बेईमानी सिखाता है।
चरित्र
जो सन्तों की नहीं मानते हैं, सन्तान उनकी भी नहीं मानती हैं।
परिवार
आज का आदमी घर में टीवी सेट, सोफा सेट, डायमण्ड सेट, डिनरसेट आदि रखने के कारण इनके मेनेजमेन्ट में स्वयं अपसेट हो गया है।
अनासक्ति
जीवन का आनंद, गौरव, सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने में है।
चरित्र
सिंहनी एक ही सुपुत्र से निर्भय होकर सोती है, गधी दसों पुत्रों के साथ भार ढोती है।
परिवार
संतोषी सदा सुखी रहता है और लोभी सदा दु:खी रहता है।
संतोष
पुत्र बड़ा स्वार्थी होता है, जब सेवा करवाता है तो पिता के साथ रहता है और जब सेवा करने का समय आता है तो पिता को छोड़ पत्नि के साथ हो जाता है।
परिवार
संसार में संतोष ही उत्कृष्ट सुख का खजाना है।
संतोष
प्रात: काल माता–पिता को प्रणाम करने से दीर्घायु, काम करने से पहले प्रणाम करने से सफलता अवश्य मिलती है, माता–पिता का आशीष सबसे बड़ा होता है।
परिवार
माँ–बाप को बेइज्जत करने वाला बेटा अपने भाग्य का दीपक स्वयं बुझाता है।
परिवार
हम व्यक्ति को अपने व्यवहार से पानी–पानी भी कर सकते हैं और वक्त पर तूफानी भी कर सकते हैं।
चरित्र
मैं जीतकर हराना नहीं बल्कि हारकर जीतना चाहता हूँ।
विनम्रता
अपने अवगुण अपने को ही तकलीफ देते हैं।
चरित्र
किसी की गलती तो कोई मूर्ख भी बता सकता है पर उसकी अच्छाई को पहचानने के लिए खुद का अच्छा होना जरूरी है।
चरित्र
हर व्यक्ति को स्वावलम्बी और स्वतंत्र होना चाहिए।
चरित्र
यदि आप दूसरों के बारे में बुरा सोचते है तो स्वयं बुरे फल भोगने के लिए तैयार रहें।
कर्म
जो पुरुष अतिथियों की सेवा करता है वह देवताओं का सुप्रिय अतिथि बनता है।
दान
अहंकारी व्यक्ति कभी संस्कारित नहीं हो सकता है क्योंकि संस्कार अहंकार से नहीं समर्पण से प्राप्त होते हैं।
विनम्रता
सुसंस्कारों से ही लघुता आती है जिससे प्रभुता प्रकट होती है।
विनम्रता
अपने बच्चों को सुसंस्कार न देने वाले माता–पिता, उनके हितैषी नहीं अपितु शत्रु हैं।
परिवार
महानता सन्तान को जन्म देने में नहीं, अपितु उसे सुसंस्कारवान बनाने में है।
परिवार
जो बच्चों को सिखाते हैं, उसका पालन स्वयं बड़े करने लगे तो धरती स्वर्ग बन जाये।
परिवार
संस्कारित माँ ही संस्कार दे सकती है।
परिवार
बच्चों को बदलना हो तो स्वयं को बदलना जरूरी है।
परिवार
बच्चों को धनवान नहीं संस्कारवान बनायें क्योंकि संस्कार से ही संस्कृति का रक्षण हो सकता है।
परिवार
यदि आप अपनी सन्तान को महावीर या राम बनाना चाहते हैं, तो पहले आपको भी सिद्धार्थ और दशरथ बनना होगा।
परिवार
शास्त्रों (पुस्तकों) से ज्ञान मिल सकता है संस्कार नहीं।
ज्ञान
सुसंस्कारों से उत्थान हो सकता है तो कुसंस्कारों से पतन भी हो सकता है।
चरित्र
सुसंस्कारों से ही शिल्पी पत्थर में परमात्मा की प्रतिमा प्रकट कर देता है और मंत्र संस्कारों से गुरु उस पत्थर की प्रतिमा को पूज्य बना देते हैं।
चरित्र
संस्कार हीन सौ कौरवों से एक संस्कारवान युधिष्ठिर अच्छा है।
चरित्र
संसार के सारे विवादों को 'जियो और जीने दो' का सूत्र मिटा सकता है।
अहिंसा