Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 58

संस्कारों का शंखनाद

128 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

बच्चों की शिक्षा माँ के पेट से ही शुरू होती है।
परिवार
रूढ़िवादी लोग धार्मिक शिक्षा के अभाव में अपना अज्ञान, अपना अंधविश्वास, अपने रोग और अपनी शत्रुताएँ सन्तान को दे रहे हैं।
परिवार
संस्कारित शिक्षा ही संस्कृति की रक्षा कर सकती है।
ज्ञान
कभी-कभी उन लोगों से शिक्षा मिलती है, जिन्हें आप अभिमानवश अज्ञानी समझते हैं।
विनम्रता
हम प्रायः दूसरों के गुणों की अपेक्षा उनकी गलतियों से अधिक सीख लेते हैं।
ज्ञान
संसार में जितने प्रकार की प्राप्तियाँ हैं, उनमें शिक्षा सबसे बढ़कर है।
ज्ञान
कर्त्तव्य-ज्ञान से शून्य पुरुष के लिए शिक्षा देना अन्धे के सामने नाँचने के समान है।
ज्ञान
दुष्ट विचार ही मनुष्य को दुष्ट कर्म की ओर ले जाते हैं।
मन
यदि आप अपना व्यक्तित्व प्रभावशाली बनाना चाहते हैं, अपने व्यक्तित्व में चुम्बकीय गुण लाना चाहते हैं तो आपको आज और इसी समय से अपने विचारों एवं भावनाओं को सकारात्मक बनाना होगा।
मन
यदि आपके विचार शुष्क, नीरस व अनाकर्षक है तो आप किसी को भी अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकते हैं।
मन
माँ सिर्फ जन्मदाता ही नहीं बल्कि जीवनदाता भी होती है क्योंकि जन्म तो जंगली गधे भी देते हैं पर वे सुसंस्कारित जीवन नहीं दे पाते हैं।
परिवार
स्वच्छ मन वाला व्यक्ति दूसरों की अच्छाईयों को देखता है जबकि दूषित मन वाला बुराई ही ढूँढ़ता है।
मन
बच्चों का भविष्य माता-पिता के हाथ में होता है।
परिवार
वस्तु का महत्त्व नहीं है, प्रत्युत उसके सदुपयोग का महत्त्व है।
विवेक
इन्तजार ईमानदारी की पहचान है।
चरित्र
जो जितने ऊँचे पद पर होता है, वह उतनी ही हीन भावना से भरा होता है।
विनम्रता
जिन्दगी में दिया गया गुलाब का एक फूल, मरने के बाद दिए गए गुलदस्ते से बेहतर है।
विविध
त्यौहार में पदार्थ ग्रहण किए जाते हैं तथा पर्व में समस्त पदार्थों का विषय वासनाओं का त्याग किया जाता है।
धर्म
जैन दर्शन संस्कृति, समन्वय व सामंजस्य प्रधान है।
धर्म
जब तक दुष्टता का अवसर नहीं मिलता तब तक सभी सज्जन दिखते हैं।
चरित्र
जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को क्षति पहुँचाये, वह दुष्ट है।
चरित्र
विनय से पूर्ण, ज्ञान युक्त तर्क ही सफलता की कुंजी है।
समृद्धि
श्रेष्ठ जीवन के लिए बड़े झूठ की अपेक्षा छोटा सत्य अधिक मूल्यवान होता है।
सत्य
मूर्ति की तरह जिन्दगी भी सब तरफ से सुन्दर होनी चाहिए।
चरित्र
अत्यन्त सुखी बचपन कई अच्छे कैरियर खराब कर देता है।
विविध
गरीब वह नहीं जिसके पास थोड़ा धन है, अपितु सच्चे गरीब तो वे हैं जो बहुत के पीछे भाग रहे हैं।
संतोष
अपराध करने के पश्चात् भय पैदा होता है और यही उसका दंड है। अपने दोष को स्वीकारना कोई अपमान नहीं है।
चरित्र
गलती कबूल कर लेने वाले को शर्मिन्दा नहीं होना पड़ता है।
विनम्रता
दूसरों के गुणों और अपने अवगुणों का सदैव ध्यान रखो।
विनम्रता
जो मनुष्य अपने अवगुण व दूसरों के गुण देखता है वही महान् पुरुष बनता है।
विनम्रता
हर बुरी घटना के साथ कुछ अच्छाईयाँ भी छिपी होती हैं।
विविध
हर आदमी किसी न किसी गुण में हम से बेहतर होता है, अतः उससे वह गुण ग्रहण करना चाहिए।
विनम्रता
असली रूप तो अपने गुणों से ही झलकता है। अपनी छाप गुणवान होकर डालना चाहिए, रूपवान होकर नहीं।
चरित्र
ज्ञानी मनुष्य की दृष्टि दूसरों की अच्छाईयों पर पड़ती है; जबकि मूर्ख लोग दूसरों के अवगुण देखते हैं।
ज्ञान
घर में प्रेम होना पृथ्वी पर स्वर्ग के समान है।
परिवार
गृहस्थ का घर भी एक तपोभूमि है। सहनशीलता और संयम को खोकर कोई गृहस्थी में सुखी नहीं रह सकता है।
परिवार
जीवन का नियम स्पर्धा नहीं, सामंजस्य है।
विविध
डरने वाला मौके पर ऐसे बुरे कार्य कर जाता है कि बाद में उसको ही आश्चर्य होने लगता है।
मन
आपके खान-पान से पता लग जाएगा कि आप किस तरह के इंसान है।
आहार
इंसान को ईमानदार मजबूरी में नहीं मजबूती से बनना चाहिए।
चरित्र
जो केवल उल्लास के क्षण याद रखते हैं, वे कभी उदास नहीं रहते हैं।
मन
यदि आप किसी के उपकार का बदला उपकार से नहीं चुका सकते तो कम से कम अपकार से तो न चुकाये।
चरित्र
किसी व्यक्ति ने हमारी आपत्ति में सहायता की हो ऐसे व्यक्ति की आपत्ति में हम भी सहायता कर दें तो यह कोई बड़ी बात नहीं है उपकारी पर उपकार करना यह तो सज्जनता का लक्षण है परन्तु है अपकारी पर भी उपकार करना यह तो महापुरुष का लक्षण है।
चरित्र
जंगली आदमी शिक्षित आदमी से बेहतर है क्योंकि उसके पास मस्तिष्क कम हृदय ज्यादा है।
विविध
आनन्द अनुभूति के स्थान पर हम आनन्द के प्रदर्शन में अधिक रुचि रखते हैं जो अनुचित है।
मन
विद्याविहीन का उच्च कुल में जन्म लेना व्यर्थ है और विद्वान् चाहे नीचकुल में जन्म ले तो भी सम्माननीय है।
ज्ञान
बिना अनुभव के कोरा शाब्दिक ज्ञान अंधा है।
ज्ञान
अनुशासनहीन बालक आसानी से बिगड़ जाते हैं।
संयम
अज्ञान की सबसे बड़ी सम्पत्ति है मौन, इस रहस्य का ज्ञान होने पर अज्ञानी को अपमानित नहीं होना पड़ता है।
वाणी
अज्ञानी का झुकाव सत्य व तथ्य पर नहीं अपितु आश्चर्य पर होता है।
ज्ञान
अज्ञानी अपने आपको ज्ञानी और ज्ञानी अपने आपको अज्ञानी मानता है।
विनम्रता
जो भी अधर्म के पथ पर चलेगा उसका पतन अवश्य होगा चाहे वह श्रावक हो या साधु।
धर्म
विद्या का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण होना चाहिए।
चरित्र
यद्यपि तुम्हें गुरु या शिक्षक के सामने उतना ही अपमानित होना और नीचा बनना पड़े जितना कि भिक्षुक को धनवान् के समक्ष बनना पड़ता है, फिर भी तुम विद्या सीखो, मनुष्यों में अधम वे ही लोग हैं जो विद्या सीखने से विमुख होते हैं।
ज्ञान
अंधा वह नहीं जिसकी आँखें नहीं, अंधा तो वह है जो अपने दोषों को ढँकता है।
विवेक
इस लोक में अन्धे वे ही मनुष्य हैं जिन्होंने गुरु के समीप सभी तत्वों को प्रकाशित करने वाला कल्याणदायक नेत्र प्राप्त नहीं किया है।
ज्ञान
ढोंग से नहीं ढंग से जिओ।
चरित्र
आज काम थोड़ा, शोर ज्यादा हो रहा है, होंठ हँसते हैं, मन बेचारा रो रहा है।
मन
अन्धकार को भगाने के लिए दीपक को लड़ना नहीं पड़ता बस जलना पड़ता है।
पुरुषार्थ
जो बच्चों को सिखाते हैं उस पर स्वयं अमल करें तो यह संसार स्वर्ग बन जाये।
चरित्र