Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 51

पित्त चित्त और चारित्र शुद्धि करो

53 सूत्र

कोई काम चाहे अच्छा हो या बुरा, बुद्धिमान को पहले उसके परिणाम का विचार करना चाहिए बाद में काम में हाथ लगाना चाहिए।
विवेक
जिससे अपयश और कुमति हो तथा जिससे पुण्य नष्ट हो जाए, ऐसा कर्म कभी न करें।
कर्म
उसी काम का करना ठीक है जिसे करके पश्चाताप न करना पड़े और जिसके फल का प्रसन्न मन से भोग कर सकें।
विवेक
यह कहना कि 'जब सब करेंगे तब हम करेंगे', न करने का बहाना है, हमें ठीक लगता है यह इसलिए हम करें, जब दूसरों को ठीक लगेगा तब वे करेंगे।
पुरुषार्थ
वह कर्म सबसे उत्तम है जो अधिकतम लोगों को अधिकतम प्रसन्नता प्रदान करता है।
दान
कार्य करने वाले में थोड़ा कट्टरपन हुए बिना तेजस्वी कार्य नहीं हो सकता है।
पुरुषार्थ
सदा दक्ष, उद्योग परायण और स्वयं काम करने वाला बनें। अपने सभी कर्त्तव्यों के पालन करने में दूसरे को अवकाश नहीं देना चाहिए।
पुरुषार्थ
सुनने वाले लाखों है, सुनाने वाले हजारों हैं, समझने वाले सैकड़ों हैं परन्तु करने वाले कोई विरले ही हैं, सच्चे पुरुष वे ही हैं और सच्चा लाभ भी उन्हीं को प्राप्त होता है, जो करते हैं।
पुरुषार्थ
जैसे लेकर न चुकाया हुआ ऋण यहाँ-वहाँ बन्धनकारी होता है, वैसे ही किया हुआ पाप भी इस लोक या परलोक में फल भोगे बिना या प्रायश्चित्त आदि किए बिना नष्ट नहीं होता है।
कर्म
निष्काम कर्मयोगी तभी सिद्ध होता है जब हमारे बाह्य कर्म के साथ अन्दर से चित्तशुद्धि रूपी कर्म का संयोग होता है।
ध्यान
विघ्न के भय से कोई काम न करना कायरता का लक्षण है।
पुरुषार्थ
यदि तुम्हारा लक्ष्य महान् हो और तुम्हारा साधन सामान्य हो तो भी कार्य करो क्योंकि केवल कार्य के द्वारा ही तुम्हारे साधनों में वृद्धि हो सकती है।
पुरुषार्थ
बड़े क्षेत्रों पर आधिपत्य करो, लेकिन छोटे क्षेत्रों को भी विकसित करो।
समृद्धि
जो स्वजनों पर उदारता, सेवकों पर दया, दुर्जन के साथ माध्यस्थता, सज्जन के साथ प्रीति, राजा के साथ नीति, विद्वानों के साथ सरलता, शत्रुजनों के साथ शौर्य, गुरुजनों के साथ क्षमा और स्त्रियों के साथ चतुरता का व्यवहार करते हैं और कला कुशल है, उन्हीं पुरुषों पर यह जगत् स्थित है।
चरित्र
शील, ज्ञान वृद्धों का उपदेश, बहुश्रुतता, धर्मानुकूल आचरण और अनाशक्ति ये उन्नति के द्वार हैं।
चरित्र
प्रेम, लज्जा, सहयोग, दयार्द्रता तथा सत्यवचन ये पाँच शान्ति के स्तम्भ हैं।
चरित्र
अपने भीतर छुपे इन गुणों को प्रकट करो–ईमानदारी, गंभीरता, परिश्रम, भोग से अरुचि, सन्तुष्टि, उदारता, स्पष्टवादिता और चरित्रबल।
चरित्र
विष से भी अमृत को, बालक से भी सुभाषित को, शत्रु से भी सदाचार को और अपवित्र स्थान से भी सुवर्ण को ग्रहण करना चाहिए।
विवेक
शत्रु के भी गुण ग्रहण करने चाहिए और गुरु के भी दोष बताने में संकोच नहीं करना चाहिए।
विवेक
योग्य पुरुषों के लिए कोई भी कार्य अत्यन्त कठिन नहीं होता है, उद्योगी मनुष्यों के लिए कोई स्थान दूर नहीं होता है, विद्वानों के लिए कोई देश विदेश नहीं होता है, प्रिय वचन बोलने वाले के लिए कोई व्यक्ति पराया नहीं होता है।
पुरुषार्थ
कृतघ्न, दुराचारी, अत्यन्त क्रोधी और कपटी–चाण्डालों के ये चार प्रकार हैं, पाँचवें प्रकार का चाण्डाल जन्म से होता है।
चरित्र
स्पर्शन इन्द्रिय डेढ़ प्रतिशत, रसना एक प्रतिशत, घ्राण साढ़े तीन प्रतिशत, चक्षु तिरासी प्रतिशत, कर्ण ग्यारह प्रतिशत, अच्छे या बुरे पदार्थों से आत्मा को प्रभावित करते हैं।
संयम
जो उद्योगी, सचेत, शुचि कर्म वाला, सोचकर काम करने वाला, संयत, धर्मानुसार जीविका वाला और अप्रमादी है उसका यश बढ़ता है।
चरित्र
मंगलवार को पूर्व दिशा में गमन लाभकारी है। सोमवार व शनिवार को दक्षिण दिशा में गमन से अर्थ लाभ होता है। बुधवार व बृहस्पतिवार को पश्चिम दिशा में गमन से कार्य सिद्धि होती है, रवि व शुक्रवार को उत्तर दिशा में जाने से अर्थ लाभ होता है।
विविध
व्यवहार की छोटी-छोटी बातें ही व्यक्ति के चरित्र का दर्पण होती हैं, न कि लम्बी चौड़ी बातें। मनुष्यों के कार्य उनके विचारों के सर्वोत्तम व्याख्याता हैं।
चरित्र
काम में देरी न होना कार्य-सिद्धि का ही लक्षण है।
पुरुषार्थ
समय का नियमित विभाग न करके किए जाने वाले कार्य अस्त-व्यस्त हो जाते हैं।
समय
कुलीनता पूर्व जन्म के कर्मों का फल है, चारित्र इस जन्म के कर्मों का प्रकाशक है।
चरित्र
मैं नहीं जानता कि मेरे बाबा कौन थे, मुझे यह जानने की चिंता अधिक है कि उनका पौत्र क्या बनेगा?
चरित्र
मनुष्य प्रायः क्षोभ से अपने पराक्रम को प्राप्त होता है।
पुरुषार्थ
बुद्धिमत्ता के साथ तथा धीमे चलो, जो तेज भागते हैं, उन्हें ठोकर लगती हैं।
विवेक
एक ही पत्थर से दो बार ठोकर खाना लज्जा जनक है।
विवेक
गलती करना मनुष्य का काम है पर जान-बूझकर गलती पर जमे रहना शैतान का काम है।
चरित्र
त्रुटियाँ तो केवल उसी से नहीं होगी जो कभी कोई काम करे ही नहीं, सर्वोत्तम मनुष्य त्रुटियों से ढलकर ही निकलते हैं।
पुरुषार्थ
वह मनुष्य जो गलतियाँ नहीं करता है, प्रायः कुछ नहीं कर पाता है।
पुरुषार्थ
कोई भी व्यक्ति अनेक और बड़ी गलतियाँ किए बिना कभी महान् नहीं बना है।
पुरुषार्थ
सज्जन लोग ही सत्पुरुषों के गुण समूह को विख्यात करते हैं।
संगति
सद्गुणों की साधना का कार्य भुजाओं से सागर तैरने जैसा है।
पुरुषार्थ
बहुश्रुत होना, शिल्प सीखना, विनयी होना, सुशिक्षित होना और सुभाषित वाणी बोलना, यह उत्तम मंगल है।
ज्ञान
कोई भी दुःखी आदमी घृणा के योग्य नहीं हो सकता है।
अहिंसा
जैसे मैले वस्त्रों वाला जहाँ-कहीं भी बैठ जाता है, उसी प्रकार बिगड़े चरित्र वाला व्यक्ति भी अपने शेष चरित्र की रक्षा नहीं करता है।
चरित्र
नीतिज्ञ के लिए अपना लक्ष्य ही सब कुछ है, गौरव सम्पन्न प्राणियों के लिए अपना चरित्र बल ही सर्व प्रधान है।
चरित्र
आत्म त्याग, प्रेम तथा कर्त्तव्य से प्रेरित होकर किए गए छोटे-बड़े कार्यों से ही चरित्र का निर्माण होता है।
चरित्र
भली-भाँति विचार करने से और सत्य के अभ्यास से वासनाओं का नाश हो जाता है, वासनाओं के विलय से चित्त उसी प्रकार विलय हो जाता है जैसे तेल समाप्त हो जाने पर दीपक बुझ जाता है।
ध्यान
देखने, बोलने, सोचने और करने के विषय में पहले सोचिए कि क्या देखना, क्या बोलना, क्या सोचना और क्या करना क्या नहीं करना।
विवेक
मनुष्य अपनी कम से कम जरूरत से ज्यादा जितना भी लेता है, वह चोरी करता है।
संतोष
जनता कभी अचेत नहीं होती, उसके नायक अचेत या भ्रम मय हो सकते हैं।
विविध
उसी का जन्म सफल है जिसके जन्म लेने से वंश की उन्नति होती है, नहीं तो परिवर्तनशील संसार में कौन नहीं मरता है और कौन जन्म नहीं लेता है?
समृद्धि
महान् सुयश के अतिरिक्त अन्य कोई स्थायी सम्पत्ति संसार में नहीं है।
चरित्र
यथायोग्य आहार-विहार करने वाले, कर्मों को यथायोग्य करने वाले, यथायोग्य शयन करने वाले तथा जानने वाले का योग दुःख दूर करने वाला होता है।
स्वास्थ्य
सामने आया हुआ मनुष्य अनुरक्त हो जाए, परोक्ष में गुणों की प्रशंसा करने लगे और कोई भी प्राणी भयभीत न हो यह योग की सिद्धि का सूचक लक्षण है।
ध्यान
यश की अपेक्षा योग्यता अधिक महत्त्वपूर्ण है।
चरित्र
जीव की बाल्यावस्था को ज्ञान हीन होने के कारण पशुता-सी और वृद्धावस्था को मृत्यु तुल्य ही समझना चाहिए। यदि विवेक सम्पन्न हो तो युवावस्था ही उसका जीवन है।
समय