Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 2

णमोकार की महिमा

83 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

णमोकारमन्त्र के एक अक्षर का भी भक्ति पूर्वक नाम लेने से सात सागर के पाप कट जाते हैं, पाँच अक्षरों का उच्चारण करने से पचास सागर के पाप कट जाते हैं तथा पूर्ण मन्त्र का उच्चारण करने से पाँच सौ सागर के पाप कट जाते हैं। सागर का दृष्टान्त– १. सुमेरु पर्वत पर कोई चिड़िया आकर चोंच घिसे और सौ-सौ वर्ष बाद पुनः आ-आकर चिड़िया एक-एक बार चोंच घिसे ऐसा करने पर जितने समय में सुमेरु पर्वत पूरा घिस जाये उससे भी बड़ा एक सागर का काल होता है। २. समुद्र के एक ओर जुआँरी डाली जाए और दूसरी ओर से सेल डाला जाये, जितने समय में लहराते-लहराते जुआँरी सेल में अपने आप घुस जाये उससे भी बड़ा एक सागर का काल होता है।
णमोकार
जो श्रद्धावान, जितेन्द्रिय, भव्य श्रावक एकाग्रचित्त हो सुगन्धित श्वेत पुष्पों से विधिपूर्वक सर्वभय नाशक णमोकार का 'एक लाख जाप' करता है, वह प्राणी 'त्रिलोकपूज्य तीर्थंकर पद' को प्राप्त करता है।
णमोकार
जिन्होंने पञ्चपरमेष्ठियों के नाम से उत्पन्न समस्त विघ्नों को हरने वाले एवं नित्य ऐश्वर्य के साधक नमस्कार मन्त्र का पूर्व में जाप किया था अथवा जो त्रिशुद्धिपूर्वक निरन्तर वर्तमान में उनका जाप करते हैं, वे ज्ञानवान् अतिशय धार्मिक पुरुष 'परलोक में त्रिलोकीनाथ' अवश्य होवेंगे।
णमोकार
अपवित्र हो, चाहे पवित्र हो, सुस्थित हो चाहे दुःस्थित हो, जो णमोकार का ध्यान करता है वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।
णमोकार
जो भव्य प्राणी उठते समय, गिरते समय, विश्राम करते समय, शयन के समय, जाग्रत होने के समय, श्मसान एवं वन में, भय के अवसर पर, विकट मार्ग में, नूतन गृह प्रवेश में, हर कार्य में णमोकारमन्त्र का स्मरण करता है, उसके समस्त विघ्न दूर होकर इच्छित कार्य की सिद्धि नियम से होती है।
णमोकार
नौ बार णमोकार का चिन्तन करने पर २७ उच्छ्वास मोक्ष प्राप्त कराने में समर्थ हैं।
णमोकार
परमात्मा पर वस्तु है किन्तु परमात्मा का ध्यान निज वस्तु है एवं संसार से पार उतारने में समर्थ है।
ध्यान
मन का ३३ प्रतिशत, वचन का ३३ प्रतिशत और काय का ३३ प्रतिशत पुण्य मिलता है, अगर जाप में मन नहीं लगता तो वचन और काय का ६६ प्रतिशत पुण्य मिलता है और संस्कार वश अँगुली चल रही है तो काय का ३३ प्रतिशत पुण्य मिलता है और ३३ प्रतिशत में विद्यार्थी उत्तीर्ण माना जाता है।
णमोकार
जो कोई भी मोक्ष गए हैं, जा रहे हैं, जायेंगे वे सभी णमोकार के प्रभाव से ही गये हैं, जा रहे हैं, और जायेंगे।
णमोकार
जिनशासन का सार, चौदह पूर्वों से निकाला हुआ णमोकार मन्त्र जिसके मन में है संसार उसका कुछ नहीं कर सकता है।
णमोकार
एकाग्र चित्त से पञ्च नमस्कार का जाप करना अथवा जिनेन्द्रोक्त शास्त्र का पढ़ना दोनों परम स्वाध्याय हैं।
ज्ञान
अर्हन्त, सिद्ध के समान आत्मा का चिन्तन करना पिण्डस्थ ध्यान कहलाता है, मन्त्र वाक्यों का ध्यान करना पदस्थ ध्यान कहलाता है, अर्हन्त का ध्यान करना रूपस्थ ध्यान कहलाता है और सिद्धों का ध्यान करना रूपातीत ध्यान कहलाता है।
ध्यान
हजारों पाप करके तथा सैकड़ों जीवों को मार कर तिर्यञ्च भी इस मन्त्र की आराधना करके स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।
णमोकार
घर में जाप करने से जितना पुण्य होता है, उसकी अपेक्षा वन में जाप करने पर सौ गुना ज्यादा पुण्य प्राप्त होता है, उसकी अपेक्षा पवित्र बगीचे एवं घने जंगल में जाप करने से हजार गुना ज्यादा लाभ होता है, उसकी अपेक्षा पर्वत पर दस हजार गुना ज्यादा लाभ होता है, उसकी अपेक्षा नदी किनारे जाप करने से लाख गुना ज्यादा लाभ होता है उसकी अपेक्षा जिनालय में करोड़ गुना ज्यादा लाभ होता है एवं भगवान् के निकट जाप करने से अनन्त गुना ज्यादा लाभ प्राप्त होता है, मुख्य रूप से जितनी श्रद्धा, विशुद्धि और एकाग्रता है उतना फल मिलता है।
णमोकार
हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति
पञ्च नमस्कार रूपी पूज्य देवता मेरी रक्षा करें, जो सुर सम्पदा को प्रदान करता है, मुक्ति लक्ष्मी को प्राप्त कराता है, चारों गतियों की विपदाओं को दूर करता है, आत्मा से पापों को दूर करता है, दुर्गति मे जाने वालों के लिए स्तम्भ के समान रोकता है और मोह को भी नष्ट करता है।
णमोकार
कदाचित् विष खाकर मरने वाला व्यक्ति यदि तत्काल सद्बुद्धि आ जाने से पश्चाताप करके पञ्च नमस्कार मन्त्र का जप करते हुए प्राण छोड़ता है, तो वह अपनी गलती का प्रतिकार कर लेता है, एवं अनन्त दुःख का भागी नहीं होता है।
णमोकार
जो मुनि मन-वचन-काय की शुद्धिपूर्वक णमोकार मंत्र का एक सौ आठ बार चिन्तन करता है, वह आहार करता हुआ भी एक उपवास का पूर्ण फल प्राप्त करता है।
णमोकार
जिस प्रकार अणु से कोई छोटा और आकाश से कोई बड़ा नहीं है, उसी प्रकार इस मन्त्रराज से बढ़कर कोई दूसरा मन्त्र सब सिद्धियों को करने वाला नहीं है, मन्त्र तोप के गोलों से भी बलवान होता है''।
णमोकार
कल्याण के इच्छुक मनुष्य ''सभी अवस्थाओं में, सभी स्थानों में'' नित्य मन्त्र का ध्यान करें और वचन से जाप करें।
णमोकार
स्फटिक, मोती, सोना, चाँदी, अच्छे रंग का मूंगा, कमलबीज या सूत की माला से जाप कर सकते हैं।
णमोकार
मनोरथों को पूर्ण करने के लिए कामधेनु तथा पापरूपी वृक्ष को जलाने के लिए अग्नि स्वरूप इस मन्त्र के रहते हुए अनिश्चित फल वाले अन्य मन्त्रों में क्यों लगा जावे?
णमोकार
णमोकार के स्मरण से– १. साता वेदनीय आदि पुण्य प्रकृतियों का बहुतायत से बन्ध होता है। २. जो पुण्य प्रकृतियाँ उदय में आने वाली हैं, उनमें अनुभाग वृद्धि होती है। ३. बंधे हुए पाप कर्मों की स्थिति-अनुभाग की हानि होती है। ४. नवीन पाप का बन्ध रुकता है। ये चार फल प्राप्त होते हैं।
णमोकार
तत्काल किया गया धर्म भी शुभ परिणामों की उत्कृष्टता से पाप कर्म के फल देने की शक्ति की उत्कृष्टता का घात कर शीघ्र ही मनुष्य को शान्ति देता है।
धर्म
णमोकार पूर्वबद्ध तथा आगामी समस्त पाप कर्म नष्ट करता है, अभ्युदय तथा कल्याणकारी पुण्य को लाता है, मंगलों में उत्कृष्ट मंगल है, जपों में उत्कृष्ट जप है एवं स्वाध्याय रूप तप भी है।
णमोकार
णमोकार के प्रभाव से ही जिनागम का पाठी और जिनलिङ्ग का धारी अभव्य भी नवम ग्रैवेयक तक जाता है।
णमोकार
मकार को मन, त्रिकार को त्राण (रक्षा करने वाला) कहा गया है, अतः जो मन को पाप से बचाता है उसे मन्त्र कहते हैं।
णमोकार
जिस प्रकार महाव्रतों में ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट है, मन्त्रों में कर्म को जीतने वाला णमोकारमन्त्र श्रेष्ठ है। अन्य मन्त्रों के फलदायक होने पर भी यही मन्त्र सेवनीय है क्योंकि यद्यपि वृक्ष अग्रभाग में फल देता है तथापि इसकी जड़ ही सींची जाती है अर्थात् यह मन्त्र सब मन्त्रों का मूल है तथा समस्त मंगलों में पहला मंगल है।
णमोकार
सिद्ध किया हुआ यह एक मन्त्र ही समस्त मन्त्रों का कार्य करने वाला होता है और वे अन्य सब मन्त्र इसके एकदेश का भी कार्य नहीं कर सकते हैं।
णमोकार
दुनिया माल वाले के पीछे घूमती है, पर प्रभु माला वाले के साथ होते हैं, साधक माला के लिए और संसारी माल के लिए बड़ा महत्त्व देता है, माला मालिक की प्रार्थना है नोट गिनने के लिए भी दो अँगुली ही चाहिए, फिर माला क्यों नहीं फेरते भाई, वरमाला के लिए जैसे उत्सुक रहते हैं, वैसे ही यदि करमाला के लिए उत्सुक रहें, तो मुक्ति वधु भी माला डालने को तैयार हो जाये, माला से ही व्यक्ति माला-माल होता है।
णमोकार
स्थिर मन वाले मनुष्यों को वचन अथवा मन से णमोकार मन्त्र का जाप करना चाहिए, वचन से जाप करने में सौ गुना फल प्राप्त होता है तो मन से जाप करने में हजार गुणा फल होता है।
णमोकार
आश्चर्य की बात नहीं है कि मन्त्र की शक्ति से इस जगत् में धर्मात्माओं पर आई हुई समस्त विपदाएँ सम्पदा रूप हो जाती हैं और दुःख सुःख रूप परिणत हो जाते हैं। सप्त व्यसनों में आसक्त अञ्जन चोर आदि तथा क्रूर परिणाम वाले जो तिर्यञ्च थे, वे भी मृत्यु के समय इस मन्त्र को प्राप्त कर स्वर्ग और मोक्ष को प्राप्त हुए थे।
णमोकार
ग्वाले ने मुनि के दर्शन कर णमोकार मन्त्र पढ़ने का नियम ले लिया, घर आया पत्नी ने प्रश्न किया तो उसने णमोकार मन्त्र ही पढ़ा, दो चार बार पत्नी ने कुछ पूछा ग्वाले ने हर बार णमोकार मन्त्र ही पढ़ा, पत्नी ने गुस्से में आकर जलती हुई लकड़ी मार दी, णमोकार मन्त्र के प्रभाव से सारे अंगारे मोती बन गये थे।
णमोकार
सुभग ग्वाले ने मुनि से णमोकार मंत्र पढ़ने का नियम लिया था अगले भव में सेठ सुदर्शन बने एवं पटना गुलजार बाग से मोक्ष पधारे। इनकी कथा पुण्यास्रव कथाकोश क्र.१७ पृ. ८९ पर देखें।
णमोकार
यह मन्त्रराज ज्ञानावरणादि कर्मसमूह को दूर करने वाला है, भव-भ्रमण का नाशक है, स्वर्ग और निर्वाणपुरी को प्राप्त कराने वाला है, भव्य जीवों के विघ्नों का निवारक है, मोहरूप सघन अन्धे गड्ढे में पतित जीवों को हस्तावलम्बन देने वाला है, प्राणिमात्र को जीवन दान देने वाला है, ऐसा यह मन्त्र समस्त त्रस व स्थावर जीवों की रक्षा करे।
णमोकार
णमोकारमन्त्र का जाप करने से संग्राम, समुद्र, गजराज, भुजंग, सिंह, भयंकर दुःसाध्य रोग, अग्नि, शत्रु, बन्धन, चोर, ग्रहबाधा, शाकिनी-डाकिनी आदि सभी प्रकार के भय दूर हो जाते हैं।
णमोकार
णमोकार मन्त्र के प्रभाव से चन्द्रमा सूर्यरूप, सूर्य चन्द्रमारूप, पाताल आकाशरूप और समस्त पृथ्वी स्वर्गरूप हो जाती है, अधिक कहने से क्या ? तीनों लोकों में जो-जो विषम स्थितियाँ हैं वे सभी अनुकूल हो जाती हैं।
णमोकार
संसार-शरीर-भोगों से विरक्त साधुजन भी मन्त्रराज के जाप के बिना मुक्ति को नहीं प्राप्त कर सकते, तब दीन संसारीजन तीनों लोकों के जीवों का उद्धार करने वाले मन्त्रराज के जाप के बिना कैसे स्वर्ग/मोक्ष के सुखों को प्राप्त कर सकते हैं ?
णमोकार
इस लोक में हिंसक, असत्यभाषी, परधनहर्ता, परस्त्रीरत इत्यादि तथा अन्य भी अनेक लोक निन्दित कुकर्म में रत रहने वाले प्राणिगण मरणकाल में श्रद्धापूर्वक मन्त्रराज के जाप के प्रभाव से अपने दुष्कर्म की निन्दा करके स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।
णमोकार
इस मन्त्रराज की अधिक प्रशंसा क्या करें ? यह णमोकारमन्त्र कल्याणकारी धर्मरूप है, आराधने योग्य जिनदेव रूप है, स्वर्ग/मोक्ष सुखदायी व्रत रूप है, अतः प्रत्येक प्राणी को इस मन्त्रराज की नित्य उपासना करनी चाहिए।
णमोकार
प्रत्येक प्राणी को शयन से पहले, जागने के बाद, किसी स्थान पर निवास करते समय, गमन के अवसर पर, गृहप्रवेश के समय, यहाँ-वहाँ भ्रमण के अवसर पर, आमोद-प्रमोद के अवसर पर, वन प्रवेश के समय, पर्वत पर चढ़ते-उतरते समय, समुद्र से पार होने के अवसर पर इत्यादि अवसरों पर मन्त्रराज का जाप अवश्य करना चाहिए।
णमोकार
दुःख में, सुख में, भय के स्थान में, मार्ग में, दुर्गम स्थान में, युद्ध के अवसर पर पञ्चनमस्कार मन्त्र का जाप करना चाहिए।
णमोकार
जो पञ्चगुरुओं के नमस्कार रूप लक्षण से सहित है तथा जगत् के जीवों को पवित्र करने में समर्थ है, ऐसे श्रेष्ठतम णमोकारमन्त्र का ध्यान करो।
णमोकार
विद्वानों को समस्त कल्याण की सिद्धि के लिए तथा समस्त विघ्नों को नष्ट करने के लिए, कहीं भी इस दुर्लभ मन्त्र को हृदय तथा वचन से नहीं छोड़ना चाहिए।
णमोकार
जिस प्रकार अग्नि से सन्तप्त स्वर्ण शुद्ध हो जाता है उसी प्रकार महान् पापों से कलंकित मनुष्य भी इस मन्त्र की ध्यानरूपी अग्नि के द्वारा सन्तप्त होकर शुद्धि को प्राप्त हो जाते हैं।
णमोकार
इस सम्पूर्ण मन्त्र का स्पष्ट उच्चारण सहित आनन्द विभोर होता हुआ जो जाप करता है, निःसन्देह उसके सर्व मनोरथों की सिद्धि होती है।
णमोकार
इस लोक तथा परलोक में निश्चित ही वाञ्छित फल की सिद्धि के लिए पञ्चपरमेष्ठी वाचक मन्त्र के सिवाय दूसरा मन्त्र न हुआ है, न है और न होगा।
णमोकार
मुनिसंघ भी परमपद की प्राप्ति के लिए सल्लेखना के काल में पैंतीस अक्षर वाले इसी मन्त्र का निरन्तर जाप करते हैं।
णमोकार
यह णमोकार मन्त्र संसार में सारभूत है, तीनों जगत् में अनुपम है, समस्त पापों का शत्रु है, संसार को नष्ट करने वाला है, विषम विष को हरने वाला है, कर्मों को निर्मूल करने वाला है, सिद्धि को देने वाला है, मोक्षसुख को उत्पन्न करने वाला है, केवलज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, हे भव्यजनों ! इस मन्त्र का बार-बार जाप करो क्योंकि जपा हुआ यह मन्त्र संसार से निर्वाण प्राप्त कराने वाला है।
णमोकार
जिनका मन इस समीचीन मन्त्र में लग रहा है, उनके दुष्ट राजा आदि से उत्पन्न होने वाले समस्त विघ्नों के समूह आधे क्षण में दूर हो जाते हैं।
णमोकार
इस मन्त्र द्वारा कीलित हुए शाकिनी, ग्रह तथा भूत आदि दुष्ट सर्पों के समान सत्पुरुषों का कहीं भी अनादर नहीं करते हैं।
णमोकार
चोर, शत्रु, दुष्ट राजा तथा दुर्जन आदि से उत्पन्न बुद्धिमान् मनुष्यों के उपद्रव महामन्त्र के द्वारा शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
णमोकार
वज्र से पर्वतों के समान मन्त्र जाप से कुष्ठ तथा वात, पित्त, कफ से उत्पन्न होने वाले समस्त रोग क्षय को प्राप्त हो जाते हैं।
णमोकार
दुष्ट भूत, पिशाच, शाकिनी और दुर्बुद्धि देव मन्त्र में संलग्न मन वाले मनुष्यों को परास्त करने में समर्थ नहीं होते हैं।
णमोकार
साँकल आदि बड़े-बड़े जाल तथा दृढ़ बन्धन आदि, मन्त्र के स्मरण मात्र से सैकड़ों टुकड़ों को प्राप्त हो जाते हैं।
णमोकार
मन्त्र से उत्पन्न पुण्य के द्वारा सर्प सत्पुरुषों के लिए हार हो जाता है, विष निर्विषता को प्राप्त हो जाता है और तलवार पुष्पमाला के समान हो जाती है।
णमोकार
मन्त्र ध्यान में कुशल मनुष्यों के लिए वज्राग्नि शीतलता को प्राप्त हो जाती है, समुद्र स्थल के समान हो जाता है और सिंह आदि सेवा करने लगते हैं।
णमोकार
जिस प्रकार सूर्य के द्वारा अन्धकार नष्ट हो जाता हैं, उसी प्रकार मन्त्र के ध्यान से बुद्धिमान पुरुषों के सैकड़ों अनिष्ट करने वाले बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं, मन्त्र लाखों करोड़ों मील दूर स्थित वस्तु और व्यक्ति को भी प्रभावित करता है।
णमोकार
पाप में फँसे हुए जीव इसी मन्त्र से विशुद्ध होते हैं और बुद्धिमान् मनुष्य इसी मन्त्र के द्वारा संसार के क्लेश से मुक्त होते हैं।
णमोकार
इस जगत् में यह मन्त्र ही भव्य जीवों को कष्ट से बचाने वाला बन्धु है, इसे छोड़कर जीवों पर कृपा करने वाला दूसरा कोई नहीं है।
णमोकार