Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 15

चेहरा नहीं, चारित्र उज्ज्वल हो

222 सूत्र · पृष्ठ 3 / 4

मन को चंचल करने वाले अश्लील चलचित्र व विज्ञापन पर कंट्रोल नहीं किया गया तो संस्कृति का नामोनिशान शेष ना रहेगा।
चरित्र
मनुष्य या स्त्री की संस्कृति का पता इस बात से लग जाता है कि वे झगड़े के समय कैसा व्यवहार करते हैं।
चरित्र
गाय घास खाकर दूध देती है और साँप दूध पीकर जहर उगलता है बस सज्जन और दुर्जन में यही अंतर होता है।
संगति
सज्जनों का स्वभाव सूपा जैसा गुण ग्रहण का होता है जबकि दुर्जनों का स्वभाव चलनी जैसा दोष ग्रहण का होता है।
संगति
राजकीय ठाठ-बाट की अपेक्षा सज्जनता की निर्धनता में अधिक मिठास है।
संतोष
शान्ति और हर्ष (प्रसन्नता) सज्जन पुरुष के लक्षण हैं।
चरित्र
संसार में सज्जन पुरुष ही स्वतंत्र होते हैं नीच पुरुष सेवक होते हैं।
चरित्र
सज्जन चाहे फटेहाल ही हो, बड़प्पन के पूरे ठाठ वाले दुर्जन से अधिक शक्तिशाली होता है।
चरित्र
यदि आप चाहते हो कि लोग आपके साथ सच्चाई का व्यवहार करें तो आप स्वयं सच्चे बनो और दूसरे लोगों के साथ सच्चा व्यवहार करो।
सत्य
यदि आपके जीवन में सच्चाई है तो उसका असर अपने-आप लोगों पर पड़ेगा।
सत्य
सत्य के रास्ते पर असफल हो जाना असत्य के रास्ते पर सफल हो जाने से लाख दर्जा बेहतर है।
सत्य
सत्य में सब बातों का समावेश हो जाता है।
सत्य
ऐसा हो ही नहीं सकता कि महान् व्यक्ति में सादगी, अच्छाई और सत्य न हो।
सत्य
अपने आचरण की पूरी देख-रेख रखो क्योंकि तुम जगत् में कहीं भी खोजो सदाचार से बढ़कर पक्का मित्र कहीं नहीं मिलेगा।
चरित्र
अध्ययन करना, सुनना, चारित्र पालन करने वाले का ही पूर्ण सार्थक है, नट के समान दुरात्मा मनुष्य का बहुत अध्ययन करना अति लाभदायक नहीं है।
ज्ञान
खराब चित्र देखने से चित्त खराब होता है और मन खराब होने से चरित्र खराब हो जाता है।
चरित्र
जो हितकारी तप, दान, धर्म तथा चारित्र ग्रहण आदि की प्रेरणा देकर कराते वे श्रेष्ठ हैं।
धर्म
जैसे दिखते हो या दिखाना चाहते हो वैसे बनो।
चरित्र
जो कोई रिश्ते न होने पर भी रिश्ता निभाते हैं, बस दुनिया में वो ही दिल को छू जाते हैं।
संगति
अपना व्यवहार इतना आकर्षक रखो कि कोई तुम्हें छोड़ तो सके पर भुला न सके।
चरित्र
जो रखती है मायके का मान, ससुराल का सम्मान, पति का अरमान, बच्चों का ध्यान रहती है खुद से अनजान वह है स्त्री की पहचान।
परिवार
न्याय प्रियता, लज्जाशीलता, सदाचार, हँसमुख चेहरा, उदार हाथ, मृदुभाषण और स्निग्ध-निरभिमानता ये उच्च कुलीन पुरुष के लक्षण हैं।
चरित्र
स्वयं को ऐसा बनाओ जहाँ तुम हो वहाँ तुम्हें सब प्यार करें, जहाँ से तुम चले जाओ वहाँ तुम्हें सब याद करें, जहाँ तुम पहुँचने वाले हो वहाँ तुम्हारा सब इंतजार करें।
चरित्र
अच्छाइयों का एक-एक तिनका चुन-चुनकर जीवन भवन का निर्माण होता है, पर बुराई का एक हल्का झोंका ही उसे मिटा डालने में समर्थ है।
चरित्र
तीव्र कामी-क्रोधी-ईर्ष्यालु जीव को रोग ज्यादा घेरते हैं, एक समय सीमा के बाद उसके ज्ञान का क्षयोपशम नष्ट हो जाता है।
क्षमा
अजीब है यह बात कि दूसरे की मदद करने का समय किसी के पास नहीं हैं लेकिन दूसरों के काम में अड़ंगे डालने का समय सबके पास है।
विविध
जीवन जीने के सात सूत्र– १. धीरे बोलिए शान्ति मिलेगी। २. भक्ति करो मुक्ति मिलेगी। ३. सेवा कीजिए शक्ति मिलेगी। ४. दान कीजिए मान मिलेगा। ५. संतोष कीजिए सुख मिलेगा। ६. सहन कीजिए साथ मिलेगा। ७. अहम् छोड़ो अर्हं बनोगे।
विविध
मनुष्य के मार्ग पर नहीं प्रभु के मार्ग पर चलो, यह मत कहो कि हमें अमुक व्यक्ति के मार्ग पर चलना है बल्कि यह कहो कि हमें सत्य के मार्ग पर चलना है क्योंकि मनुष्य कितना भी महान् हो सदा अपूर्ण ही हैं।
सत्य
निषिद्ध कर्मों को करते हुए कोई व्यक्ति साधक नहीं बन सकता है।
संयम
साधक को चाहिए कि वह अपने को कभी भोगी या संसारी व्यक्ति न समझे, उसमें सदा यह जागृति रहनी चाहिए कि ''मैं साधक हूँ''।
संयम
साधक उसी को कहते हैं, जो निरन्तर सावधान रहता है।
संयम
जब तक साधक को अपनी स्थिति पर असन्तोष नहीं होता, तब तक उसकी उन्नति नहीं होती है। साधक वह होता है, जो चौबीसों घण्टे साधना करता है।
पुरुषार्थ
साधक को सत्य-तत्त्व का अनुयायी होना चाहिए, किसी व्यक्ति, सम्प्रदाय आदि का अनुयायी नहीं।
सत्य
इन्द्रियों के निग्रह, राग-द्वेष पर विजय प्राप्त करने और प्राणीमात्र के प्रति अहिंसक रहने से साधक अमरत्व प्राप्त करता है।
अहिंसा
जैसी परिस्थिति आये उसी में साधना करनी चाहिए, अनुकूलता देखोगे तो साधना नहीं हो पायेगी।
संयम
जो साधना सुगम दिखे उसको करना शुरू कर दें तो जो कठिन दिखती है वह सुगम हो जायेगी और जो समझ में नहीं आती वह समझ में आने लग जायेगी।
पुरुषार्थ
यदि भगवान् की याद स्वतः नहीं आती, उन्हें याद करना पड़ता है तो समझें कि अभी साधना शुरू ही नहीं हुई है।
भक्ति
साधुत्व का सम्बन्ध ख्याति, पूजा और लाभ से नहीं स्वयं से होता है।
संयम
शास्त्र की आँख से जो देख-देखकर चलता है, जो देख-देखकर बोलता है, जो देख-देखकर पूर्ण क्रिया करता है वही साधु है।
संयम
प्रायः समस्त प्रकार की उपाधि का मूल यह शरीर है, यह ही संसार में भटकाने वाला है, सभी को सबसे अधिक ममत्व अपने शरीर से होता है, साधु बनकर शरीर का गुलाम बनने वाले जीव के लिए नरक व पशु ये ही दो गतियाँ हैं।
अनासक्ति
मात्र व्यापार करने से लाभ नहीं होता है बल्कि समझदारी से जो व्यापार करता है उसे लाभ होता है अन्यथा मूलधन भी खो बैठता है। इसी प्रकार साधु बनने मात्र से कल्याण नहीं होता, साधु बनने के बाद साधुपने के प्रति वफादार रहने से व साधुपने का पूर्ण पालन करते रहने से ही कल्याण होता है।
संयम
जो हृदय से कोमल हो और काया से खूब कठोर वह साधक आत्म कल्याण साध सकता है।
संयम
जो सदाचार का पालन नहीं करते उन्हें शिक्षित होने पर भी उसी प्रकार लाभ नहीं मिलता जिस प्रकार जादू की गाय दूध नहीं देती है।
चरित्र
दिल बड़ा रखो, दिमाग ठंडा रखो, वाणी मीठी रखो फिर कोई आपसे नाराज हो तो कहना।
चरित्र
क्या जरूरत है दिया सलाई की, यहाँ तो आदमी से आदमी जलता है।
विविध
प्रसन्नता के सूत्र–संतोषी बनें, आशावादी बनें, हमेशा खुश रहें, हमेशा सकारात्मक एवं अच्छी सोच रखें, हमेशा चिन्ता मुक्त रहें, परोपकार की भावना रखें, विपत्ति में सोचें जो होगा सो देख लेंगे इत्यादि।
मन
फूलों की सुगन्ध केवल वायु की दिशा में फैलती है परन्तु एक व्यक्ति की अच्छाई हर दिशा में फैलती है।
चरित्र
सफल व्यक्ति होने का प्रयास न करें, अपितु गरिमामय व्यक्ति बनने का प्रयास करें। आत्म प्रभावना से शून्य धर्म प्रभावना बंध्या स्त्री के शृंगार के समान है।
चरित्र
हे प्रभु! मुझे अधिक लेने के नहीं अधिक देने के योग्य बनाओ।
भक्ति
किसी को अपनी पसंद बनाना कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात है किसी की पसंद बन जाना।
चरित्र
अपने रहस्यों को किसी के सामने प्रकट न करें, यह आदत आत्मघाती है।
विवेक
बुद्धिमान अपने अनुभवों से सीखता है, अधिक बुद्धिमान दूसरों के अनुभवों से भी सीखता है।
ज्ञान
बुद्धिमान वह है जो जगत् को यथार्थ रूप से जाने, वर्तमान को ठीक से पढ़ सके, परिस्थिति के अनुसार चल सके और दूसरे का अभिप्राय समझ सके।
ज्ञान
वीरता के साथ जब बुद्धि नहीं रह जाती तो मानव भेड़िया बन जाता है।
ज्ञान
बुरा करने वालों का भी जो भला करता और सोचता है वह महान् होता है।
चरित्र
प्रभावना चित्रों से नहीं चरित्र से होती है। विद्या का आभूषण शान्ति है।
चरित्र
जो व्यक्ति गंभीर, शान्त चित्त, चंचलता रहित होगा वही मंत्र सिद्ध कर सकता है, वाचाल को मंत्र की सिद्धि नहीं होती है।
णमोकार
कर्म ऐसा होना चाहिए कि मनुष्य जहाँ भी बैठ जाये वहाँ मन्दिर बन जाये।
चरित्र
महात्मा स्वयं कष्ट में होने पर भी दूसरों को सहारा देता है, स्वयं मरणोन्मुख होने पर भी दूसरों को धैर्य प्रदान करता है।
चरित्र
यदि आप सुख से जीना चाहते हो तो निर्ममत्व होकर जीना सीखो।
अनासक्ति