Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 15

चेहरा नहीं, चारित्र उज्ज्वल हो

222 सूत्र · पृष्ठ 4 / 4

ममत्व के वशीभूत जीव स्वयं के द्वारा स्वयं का ही पतन करता है।
अनासक्ति
बुद्धिमान को एक व्यक्ति का त्याग कर कुल की, कुल का त्याग कर ग्राम की, एक ग्राम का त्यागकर देश की और पृथ्वी का त्याग कर अपने आप की रक्षा करना चाहिए।
विवेक
जितनी अधिक सहजता उतनी अधिक साधुता।
संयम
साधु का जीवन साधा हुआ नहीं सहज होता है।
संयम
साधु में यदि आध्यात्मिक निधि नहीं है तो मानवता पर कलंक है।
संयम
साधु लोग यदि अपने आलस्य को दूर कर मठों, धर्मस्थानों में रखा धन सार्वजनिक सेवा में खर्च करें, तो उनके विरुद्ध जो शिक्षितों में भावना है वह अविलम्ब दूर हो सकती है।
दान
मुनियों का संयम गृहस्थों को दबाने के लिए नहीं बल्कि अपनी महत्त्वकांक्षा को मिटाने के लिए होता है।
संयम
साधुओं के लिए श्रावक को डाँटना नहीं चाहिए क्योंकि श्रावक नौकर नहीं भक्त हैं वे साधुओं को भगवान् समझकर पूजते हैं।
विनम्रता
दुःख आने पर प्रसन्न होना बहुत ऊँची साधना है।
संयम
जो अवगुण तुम्हें दूसरे में दृष्टिगत हो उन्हें अपने भीतर न रहने दो।
चरित्र
जब तक लोग स्वयं को सुधारने का प्रयत्न नहीं करेंगे, तब तक कोई सुधार होना असंभव है।
चरित्र
बाह्य के साथ सुधार आंतरिक होना चाहिए, तुम सद्गुणों के लिए नियम नहीं बना सकते।
चरित्र
सुंदर वह है जो सुंदर कार्य करें।
चरित्र
यदि सुंदर दिखाई देना है तो तुम्हें भड़कीले कपड़े नहीं पहनना चाहिए बल्कि अपने गुणों को बढ़ाना चाहिए।
चरित्र
'शोभा' चाल-चलन में होती है, दिखावट में नहीं।
चरित्र
शरीर का शृंगार दूसरों के लिए होता है किन्तु चेतना का शृंगार स्वयं के लिए।
संयम
बुरा मत सोचना क्योंकि बुरा सोचने वाला भला नहीं बन पाता है।
मन
आदर्शों की होली जलाकर दूसरों की कृपा पर जीना तथा स्वार्थ के लिए अन्याय से समझौता करना चापलूसी है।
चरित्र
परम ज्ञान ग्रन्थ पढ़ने से नहीं परम चरित्र व ध्यान से उत्पन्न होता है।
ज्ञान
ज्ञान बिना भी चरित्र पूज्य और हितकारी है।
चरित्र
ज्ञानपूर्वक होने वाला समभाव ही सामायिक है।
ध्यान
साधु साधना में श्रम करते हैं इसलिए श्रमण कहलाते हैं।
संयम
जो श्रावक श्रावकत्व को छोड़कर मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा करता है वह अशिक्षित घोड़े के समान उन्मार्गगामी हो जाता है।
धर्म
''नाच न जाने आँगन टेढ़ा'', नाचना सीखो आँगन को टेढ़ा मत कहो, त्याग करना सीखो काल को दोष मत दो, टेढ़े आँगन में भी व्यक्ति नाचा जा सकता है, जो परमात्म भाव से भरा है वह पंचम काल में भी भावलिंगी मुनि बन सकता है।
पुरुषार्थ
सबसे मिलकर रहना पर किसी से भी बंधकर नहीं रहना चाहिए।
अनासक्ति
जिनेन्द्र देव की वीतराग वाणी स्वतंत्र बनाती है, स्वच्छंद नहीं बनाती है।
धर्म
राग आग के समान है अतः राख होने से पहले राग छोड़ देना चाहिए।
अनासक्ति
जो व्यक्ति सच्चाई के मार्ग पर चलता है वह हर प्रकार की उलझनों से दूर रहता है किन्तु जो व्यक्ति गलत तरीकों से आगे बढ़ता है उसका जीवन समस्याओं और उलझनों में घिरा होता है।
सत्य
राष्ट्र उत्कर्ष हेतु संत समाज का योगदान आपेक्षित है।
धर्म
समाज का नेता पवित्र जिह्वा वाला और हजारों का पालन पोषण करने वाला होना चाहिए।
वाणी
छोटी-छोटी बातें दिल में रखने से बड़े-बड़े रिश्ते कमजोर हो जाते हैं।
संगति
रिश्तों की खूब सूरती एक-दूसरे की बात बर्दाश्त करने में है, खुद जैसे इंसान की तलाश करोगे तो अकेले रह जाओगे।
संगति
सभी मेहमानों में से किसी को देखकर, किसी को मुस्कुराकर, किसी को हँसकर और किसी को सम्मान/भेंट देकर प्रसन्न किया जाता है।
चरित्र
व्यसनी व्यक्ति को व्यसनों की तृप्ति के लिए अत्यधिक धन की आवश्यकता पड़ती है जिससे वह अन्याय, अनीति और अधर्म से धनोपार्जन करता है।
चरित्र
जुआरी; धनहीन, वस्त्रहीन, भाग्यहीन, कुबुद्धि और धर्म से रहित देखे जाते हैं।
चरित्र
जो सदाचारी, विनयवान, विवेकवान, विद्वान्, पवित्र, तत्त्वों का ज्ञाता, क्रोध-लोभ रहित, बुद्धिमान, सब दर्शनों-मतों के सारभूतज्ञान का ज्ञाता, संसार से भयभीत है, मर्यादा से युक्त है वही श्रेष्ठ वक्ता है।
वाणी
जो बोलता कम और सुनता ज्यादा है उसका जीवन स्वर्ग बनने से कोई नहीं रोक सकता है।
वाणी
जो विपत्तियों के दिनों में भी मुस्कुराना जानता है वह विपत्ति को भी विपत्ति में डाल देता है।
पुरुषार्थ
बुद्धिमान व्यक्तियों की प्रशंसा की जाती है, धनवान से ईर्ष्या की जाती है बलशाली व्यक्तियों से डरा जाता है लेकिन विश्वास सिर्फ चारित्रवान व्यक्तियों पर ही किया जाता है।
चरित्र
मीठे शब्दों पर नहीं अच्छे आचरण पर विश्वास करो।
चरित्र
स्त्री की मधुरवाणी से परिवार में स्नेह की सरिता बह निकलती है।
वाणी
एक बुद्धिहीन महिला अपने पति को अपना गुलाम बनाती है और खुद गुलाम की पत्नि बन जाती है, जबकि एक बुद्धिमती महिला अपने पति को राजा जैसा बनाकर खुद रानी बन जाती है।
परिवार