Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 15

चेहरा नहीं, चारित्र उज्ज्वल हो

222 सूत्र · पृष्ठ 2 / 4

इन पाँच प्रकार के मनुष्यों को समाज में न तो धन प्राप्त होता है और न ही यश— १. मलिन वस्त्र पहनने वाले, २. मलिन दाँत रखने वाले, ३. सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सोने वाले, ४. कड़वी बात करने वाले, ५. अधिक भोजन करने वाले।
चरित्र
जिनके अभिमान, काम क्रोधादि कषाय शान्त नहीं हुई है, जिनको इन्द्रियजन्य विषय भोगों से विरक्ति नहीं हुई है, जो जन्म-मरणादि के दुःख से भयभीत नहीं हैं जिन्हें शरीर सम्बन्धी सुख आदि से अभी वैराग्य नहीं हुआ है ऐसे प्राणियों की दीक्षा संसार में मात्र उदर पूर्ति के लिए ही है, मुक्ति प्राप्ति के लिए नहीं है, अतः ऐसे गुरुओं को तो दूर से ही त्याग देना चाहिए।
धर्म
भलाई करने की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी बुराई का त्याग करने की आवश्यकता है। बुराई का त्याग करने से भलाई अपने आप होगी, करनी नहीं पड़ेगी।
चरित्र
जिसको हम अच्छा समझते हैं उसका पूरा-का-पूरा पालन करने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर नहीं है, परन्तु जिसको हम बुरा समझते हैं उसका पूरा-का-पूरा त्याग करने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है और उसके त्याग का बल, योग्यता, ज्ञान, सामर्थ्य भी भगवान् ने हमें दिया है।
चरित्र
जैसा तू बोलता है वैसा तू लिख और जैसा तू लिखता है वैसा तू दिख।
सत्य
भगवान् महावीर का सूत्र है—जो तुम अपने लिए चाहते हो वही दूसरों के लिए चाहो और जो आप अपने लिए नहीं चाहते वह दूसरों के लिए भी मत चाहो।
अहिंसा
एकान्त में रहना ही महान् आत्माओं का भाग्य है।
ध्यान
लोग हमें अच्छा मानें या न मानें, अच्छा जानें या न जानें, अच्छा कहें या न कहें, पर हमारे भाव अगर अच्छे हैं तो हमारे मन में हर समय प्रसन्नता रहेगी और मरने पर सद्गति होगी।
मन
प्रत्येक मनुष्य को सच्चाई, कर्त्तव्य और मौत को हमेशा याद रखना चाहिए।
समाधि
महात्मा तो केवल वह है जिसकी कोई माँग नहीं है।
संतोष
पेट और पेटी रुपया और रोटी के लिए, गृहत्याग करने वाला महात्मा नहीं होता है।
अनासक्ति
महान् पुरुष की महानता का पता इस बात से लग जाता है कि वह छोटे व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
विनम्रता
जैसे सूर्य आकाश में छिपकर नहीं विचर सकता वैसे ही महापुरुष भी संसार में छिपकर नहीं रह सकते हैं।
चरित्र
मनुष्यों का गृहस्थ रहना अच्छा परन्तु इन्द्रिय, आहार दोष और रागद्वेषादिक के द्वारा कलंकित मुनिपद अच्छा नहीं है।
धर्म
प्रतिदिन यथायोग्य निर्दोष आहार करना अच्छा है परन्तु मासोपवास के बाद सदोष आहार करना अच्छा नहीं है।
आहार
ग्रन्थ पढ़ने से नहीं निर्ग्रन्थ बनने से मोक्ष मिलता है।
अनासक्ति
शान्त होना संत होने से भी ज्यादा कठिन है।
क्षमा
अपने कर्तव्य में लगे रहना और मौन रहना लांछन का सबसे अच्छा उत्तर है।
संयम
संसारी कीड़े की तरह मरने से कहीं अधिक अच्छा है कि संयम धारणकर कर्त्तव्य का पालन करते हुए समतापूर्वक समाधि से मरो।
समाधि
साधना त्याग से होती है और 'भोग' संयोग से होता है।
संयम
योगी इन्द्रियों का दास नहीं मालिक होता है।
संयम
जो मन, वचन और काय को अपने वश में रखे वही सच्चा योगी होता है।
संयम
जब तक परिग्रह और परिचय के प्रति राग है तब तक सत्संग और संन्यास बकवास है।
अनासक्ति
बुद्धिमत्ता का लक्ष्य स्वतंत्रता है, संस्कृति का लक्ष्य पूर्णता है, ज्ञान का लक्ष्य प्रेम है और शिक्षा का लक्ष्य चरित्र है।
ज्ञान
विचार शुद्धि से आचार शुद्धि स्वयमेव होती है।
मन
हजार मील चलने के विचार करने से एक कदम भी चलना ज्यादा मूल्यवान होता है।
पुरुषार्थ
आपका हर विचार आपके भविष्य का बीज बनता है।
मन
आचरण रहित विचार कितने अच्छे क्यों न हों, उन्हें खोटे मोती की तरह समझना चाहिए। अच्छे विचार रखना भीतरी सुंदरता है।
मन
महान् विचार जब कार्य रूप में परिणत हो जाते हैं तब महान् कृतियाँ बन जाती हैं।
मन
मारना चाहते हो तो स्वयं के बुरे विचारों को मारो।
मन
सहसा कम न करें, अविवेक मुसीबतों को आश्रय देता है, विचारशील मानव को गुणों से प्रेम करने वाली सम्पत्तियाँ खुद चुन लेती हैं।
विवेक
अगर किसी की गलती से अपना कुछ नुकसान हो जाए तो जान-बूझकर उसका नुकसान करने का विचार मन में मत लाओ।
क्षमा
विज्ञापन वे करते हैं जिन्हें अपनी साधना पर विश्वास नहीं होता है।
संयम
विद्या का अंतिम लक्ष्य चरित्र-निर्माण होना चाहिए।
ज्ञान
कठिनाइयों में ही सिद्धान्तों की परीक्षा होती है, बिना विपत्तियों में पड़े मानव नहीं जान सकता है कि वह ईमानदार है अथवा नहीं।
चरित्र
मीठे शब्दों पर नहीं आचरण पर विश्वास करो।
चरित्र
जिस किसी भी क्रिया से वैराग्य की जागृति होती हो उसका पूर्ण श्रद्धा के साथ आचरण करना चाहिए।
अनासक्ति
जो गृहस्थ अधिकार और कर्त्तव्य का पालन करता है वह मानव है और जो अपनी स्वार्थ पूर्ति करता है वह दानव है।
चरित्र
अभिप्राय में उदारता, कार्य सम्पादन में मानवता, सफलता में संयम इन्हीं तीन चिह्नों से मानव महान् बन जाता है।
चरित्र
निरतिचार व्रत पालन ही संसार के विच्छेद का कारण है।
संयम
व्रतहीन मनुष्य निरन्तर भाग्यहीन धन धान्यादि से रहित भयभीत तथा सदा दुःखी रहता है।
संयम
आप संसार में रहें लेकिन आपके भीतर संसार न रहे।
अनासक्ति
अनुशासन मात्र अपने जीवन को ही नहीं अपितु परिवार, समाज, देश व सम्पूर्ण विश्व को उज्ज्वल करता है।
संयम
जो अपने ऊपर शासन नहीं करेगा वह सदैव दूसरों का सेवक रहेगा।
संयम
जो अपनी बुराइयों पर विजय पा लेता है वही अजेय होकर संसार पर शासन करता है।
संयम
सन्तों की इच्छाशक्ति और शासकों की कार्य शक्ति एक हो जाए तो देश की तस्वीर बदल सकती है।
Misc.
सांसारिक उपलब्धियाँ समय में हैं, आध्यात्मिक उपलब्धि संकल्प में है।
संयम
संकल्प तलवार है जो समय को मारती है, शाश्वत की रक्षा करती है।
संयम
संसार में पत्थर से शक्तिशाली लोहा, लोहे से शक्तिशाली अग्नि, अग्नि से शक्तिशाली पानी, पानी से शक्तिशाली हवा और हवा से शक्तिशाली संकल्प होता है।
संयम
दुनिया बुद्धिमान का सम्मान करती है और चरित्रवान का अनुसरण करती है।
चरित्र
संन्यास समाधि का प्रथम चरण है।
संयम
दुर्बल मन का मनुष्य संयम पालन नहीं कर पाता, पर जिसके मन में लगन होती है वह अभ्यास से संयम पालना सीख लेता है।
संयम
सुख-शान्ति; ऐशो-आराम से नहीं संयम से प्राप्त होती है।
संयम
सब संयमों का मूल जिह्वा और जननेन्द्रिय के नियन्त्रण में बसता है।
संयम
मन के विकारों को जीतने के लिए इन्द्रिय संयम की सहायता लें, विजय निश्चित होगी।
संयम
आत्मज्ञान, खिन्नता का अभाव, सहनशीलता, धर्मपरायणता, वचन रक्षा तथा दान ये गुण महापुरुषों में होते हैं अधमपुरुषों में नहीं।
चरित्र
आत्मसंयम की रक्षा अपने खजाने के समान करो क्योंकि उससे बढ़कर इस जीवन में और कोई निधि नहीं है।
संयम
नाशवान की दासता ही अविनाशी के सम्मुख नहीं होने देती है।
अनासक्ति
जो तन व धन को संभाले वह संसारी और जो मन व वचन को संभाल ले वह संन्यासी है।
संयम
भ्रष्टाचार संस्कृति की विकृति का कारण है।
चरित्र