Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 12

ब्रह्मचर्य

114 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

व्रत एक प्रकार का आत्मानुशासन है, जिससे व्यक्ति सतर्क रहता है।
धर्म
प्राणों का अंत भी क्यों न हो जाए लेकिन गुरु की साक्षी में लिए व्रत भंग मत करना, यदि प्राणों का अंत होगा तो मात्र उसी समय दुःख होगा किन्तु जिसने एक बार व्रत को भंग कर दिया वह भव-भव में दुःखी होगा।
धर्म
संसार के दुःखों से छुटकारा प्राप्त करना चाहते हो तो वैराग्यपूर्वक व्रतों को धारण करो। व्रत पालन के लिए भी प्रबल पुण्य चाहिए।
धर्म
जिस प्रकार स्विच ऑन करने पर लोहे के तारों में तुरन्त विद्युत प्रवाहित होने लगती है उसी प्रकार हमारे जीवन में वासनाओं की स्थिति है। भोगसम्बन्धी चर्चा, वार्ता, क्रिया, स्मरण, दर्शन, चिन्तन आदि से वासनाएँ सक्रिय हो जाती हैं।
संयम
साधना की विराधना का कारण 'काम वासना' है। वस्त्र नहीं वासना उतारना कठिन है।
ब्रह्मचर्य
वासना के पीछे ही घर गृहस्थी बसाना पड़ती है यदि वासना वश में हो जाये तो संसार वास समाप्त हो जाये। सारा संसार वासना का फल है।
ब्रह्मचर्य
विषयों का सेवन छोड़ने पर भी जिसके विषय वासना नहीं छूटी उसकी भव सन्तति अभी कम नहीं हुई है। विकार भाव जीव को ज्ञान शून्य बना देता है।
ब्रह्मचर्य
इस लोक में शरीर के शीलवंत लाखों करोड़ों मिल जायेंगे पर मन के शीलवंत कम ही मिलेंगे।
ब्रह्मचर्य
जिनालय बाहरी मंदिर है, शरीर रूपी घर भीतरी मंदिर है।
भक्ति
जब-तक आपका कामदेव सोया है तभी तक आप संयमी हैं।
ब्रह्मचर्य
शील के साथ गरीब होना श्रेष्ठ है पर कुशील के साथ वैभवशाली होना ठीक नहीं है।
ब्रह्मचर्य
शील में ताकत होती है, सील बन्द में विश्वास होता है, सील खुल गई तो विश्वास चला जाता है। संसार में सबसे श्रेष्ठ ब्रह्मचर्य है।
ब्रह्मचर्य
संकट के समय जिसका कोई सहारा नहीं होता उसका शील सहारा होता है, सभी व्रतों में शील राजा है।
ब्रह्मचर्य
शील अपरिमित बल है, शील सर्वोत्तम शस्त्र है, शील श्रेष्ठ आभूषण है, शील चिन्तामणि रत्न है और शील ही रक्षा करने वाला अद्भुत कवच है।
ब्रह्मचर्य
विज्ञान ने जितनी समस्याएँ हल की हैं, उतनी ही नई समस्याएँ खड़ी कर दी हैं।
Misc.
विद्या लाभ विद्यालय के ऊपर नहीं, बल्कि मुख्यतः छात्र के ऊपर निर्भर करता है।
ज्ञान
अशुद्ध हृदय लेकर अपनी पुस्तकों या अपने शिक्षकों के पास मत जाइए शुद्ध हृदय लेकर उनके पास जाइए, तभी आपको जो कुछ आप चाहते हैं वह प्राप्त होगा।
ज्ञान
अनुभव बीस वर्ष में सिखाता है, विद्वत्ता एक वर्ष में उससे अधिक सिखा देती है।
ज्ञान
अभीष्ट फल की प्राप्ति हो या न हो विद्वान् पुरुष उसके लिए शोक नहीं करता है।
ज्ञान
विद्वान् की संसार में प्रशंसा होती है, विद्वान् सारे भूमंडल का गौरव है, विद्या से सभी कुछ मिल जाता है और विद्या की सभी जगह पूजा होती है।
ज्ञान
बुद्धिमान, प्रज्ञावान, बहुश्रुत तथा बहुत बातों का विचार करने वाले रोते नहीं हैं, आदमियों का यही परम शरण स्थान है कि पण्डित शोक को जीत लेते हैं।
ज्ञान
विद्वानों का मनोरंजन करने वाली शास्त्र ज्ञान गरिमा मूर्खों का मनोरंजन नहीं कर सकती, मोतियों में छेद करने वाली सलाई पाषाणों के छेदन में काम नहीं आ सकती है।
ज्ञान
महान् लोग खेल में भी ऐसा शब्द नहीं कहते कि जिससे चैतन्य शील व्यक्ति उपदेश न ले सकें लेकिन बुद्धिमत्ता के सौ अध्याय भी नादान के सामने पढ़ें तो उनके कानों को खेल ही लगते हैं।
ज्ञान
जो व्यक्ति मूर्खों के सामने विद्वान् लगने की कामना करते हैं, वे विद्वानों के सामने मूर्ख लगते हैं।
ज्ञान
राजा, मंत्री, वैद्य, विद्वान् तथा संन्यासी को वृद्धावस्था अलंकृत करती है तथा वेश्या, योद्धा, गायक एवं सेवक को अपमानित कराती है।
Misc.
पंखों के बिना उड़ा नहीं जा सकता नाव के बिना पार नहीं उतर सकते, शील के बिना कभी भी निर्वाण प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
ब्रह्मचर्य
शील रूपी चिंतामणि का विनाश हो जाने पर कौन-सी वस्तु है जो नष्ट नहीं हो जाती है?
ब्रह्मचर्य
उस स्वर्ण से भी क्या जहाँ चारित्र का खण्डन हो? यदि मैं शील से विभूषित हूँ तो मुझे और क्या चाहिए?
ब्रह्मचर्य
स्त्रियों में समझ हो तब भी वे विचित्र प्राणी होती हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्री को छोड़ने पर जगत् छूट जाता है अतः स्त्री छोड़कर सुखी बनें।
ब्रह्मचर्य
स्त्रियाँ मनुष्यों को जन्म देने वाली हैं किन्तु प्राणों को हरने वाली भी हैं, ये भीरु स्वभाव वाली भी हैं तथा अग्नि में प्रवेश भी कर सकती हैं, ये अत्यन्त कठोर भी हैं, साथ ही पल्लव के समान कोमल अंगों वाली भी हैं, वे सहज ही मुग्ध हो जाने वाली भी हैं किन्तु विद्वानों को भी ठग सकती हैं।
ब्रह्मचर्य
मोहित करती हैं, मदयुक्त बनाती हैं, उपहास करती हैं, भर्त्सना करती हैं, प्रमुदित करती हैं, दुःख देती हैं, ये स्त्रियाँ पुरुषों के दयामय हृदयों में प्रवेश कर क्या-क्या नहीं करती हैं?
ब्रह्मचर्य
सब जगह पुरुष ही पंडित नहीं होता, जिस-तिस विषय में विचक्षण स्त्रियाँ भी पंडिता होती हैं।
ज्ञान
स्त्री को पराजित करना हो तो उसकी प्रशंसा करो।
Misc.
स्त्री पुरुष से पूजा नहीं चाहती किन्तु सुख-दुःख में सहयोग चाहती है।
परिवार
अन्धे, कुब्जे, कोढ़ी, रोग से पीड़ित तथा आपत्ति ग्रस्त पति को जो नहीं छोड़ती वह महासति है।
चरित्र
संसार में लकड़ी, डोरी या लोहे का बंधन उतना दृढ़ नहीं है जितना चंचल नेत्रों वाली स्त्री के मुख और ललित वाणी का दृढ़ बंधन है।
ब्रह्मचर्य
सैकड़ों पुराणों, शास्त्रों व स्मृतियों के अध्ययन से उत्पन्न विवेक तभी तक समर्थ रहता है, जब तक मृग नयनी स्त्री का कटाक्ष हृदय में स्थान नहीं बना लेता है।
ब्रह्मचर्य
हाथी जब कमलिनी को देख लेता है तब उसे ग्राह नहीं दिखाई देता उसी प्रकार पुरुष जब स्त्री को देख लेता है तब उसे नरक का भी डर नहीं लगता है।
ब्रह्मचर्य
अवलोकन, संभाषण, विलास, परिहास, क्रीड़ा और आलिंगन आदि तो दूर रहे स्त्रियों का स्मरण भी मन को विकृत करने के लिए पर्याप्त है।
ब्रह्मचर्य
विंध्यपर्वत के वन में भूख-प्यास से पीड़ित होकर मर जाना अच्छा है, सर्पों से भरे हुए तथा घास-फूस के घिरे कुँए में गिरना अच्छा है, गड्ढे और भँवर वाले गहरे जल में डूब जाना अच्छा है परन्तु समझदार कुलीन का शील से भ्रष्ट होना अच्छा नहीं है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री के संग से मन में शीघ्र ही विषय वासना उत्पन्न हो जाती है, उससे वैराग्य नष्ट होता है और वैराग्य न होने से पुरुष उत्तम तपस्या से भ्रष्ट हो जाता है अतः तपस्वियों को स्त्रियों का संग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह विषय-कषाय की जड़ है एवं ज्ञान वैराग्य का विनाश करने वाली है।
ब्रह्मचर्य
सुख प्राप्ति की इच्छा रखने वालों को संयम का जीवन व्यतीत करना चाहिए।
संयम
संयम के चार रूप हैं–मन का संयम, वचन का संयम, देह का संयम और उपाधि सामग्री का संयम।
संयम
जो अपने ऊपर शासन नहीं करेगा वह सदैव दूसरों का सेवक रहेगा।
संयम
सर्व शक्तिमान वही है जो आत्म संयमी है।
संयम
असंयमी व्यक्ति जानवरों से भी गया बीता है। जानवर भी भोजन और वासनापूर्ति में कुछ संयम रखते हैं किन्तु इंसान बुद्धिमान होकर भी आहार-विहार में बड़े असंयमी होते हैं जिससे वे बीमार पड़ते हैं, संयम एक ऐसा अंकुश है जो हमें विवेक और सत्य के पथ पर आरूढ़ रखता है।
संयम
सब संयम का मूल 'जुबान और जननेन्द्रिय' को नियंत्रण में रखना है।
संयम
आत्म संयम की रक्षा अपने खजाने के समान ही करो क्योंकि उससे बढ़कर इस जीवन में और कोई निधि नहीं है।
संयम
धन्य है उसका पुरुषत्व जो पराई स्त्री पर दृष्टि भी नहीं डालता वह केवल श्रेष्ठ और धर्मात्मा ही नहीं वह सन्त है।
ब्रह्मचर्य
यदि तुम्हें किसी बात की कामना करनी ही है, तो पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाने की कामना करो और वह छुटकारा तभी मिलेगा जब तुम कामना को जीत लोगे।
अनासक्ति
उस आदमी को देखो, जो दूसरों के प्रति बिना अपने किसी कर्त्तव्य को कम किए शीलवान रह सकता है, वह पृथ्वी को उत्तराधिकार में पालेगा।
ब्रह्मचर्य
वेश्या जब अपने प्रेमी का दृढ़ आलिंगन करती है, तो वह ऊपर से यह प्रदर्शन करती है कि वह उससे प्रेम करती है; परन्तु मन में तो उसे ऐसा अनुभव होता है, जैसे कोई बेगारी अन्धेरे कमरे में किसी अज्ञात लाश को छूता है।
ब्रह्मचर्य
जिन लोगों के मन का झुकाव पवित्र कार्यों की ओर है, वे असति स्त्रियों के स्पर्श से अपने शरीर को कलंकित नहीं करते हैं।
ब्रह्मचर्य