Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 12

ब्रह्मचर्य

114 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

जो तप, शास्त्र ज्ञान, धैर्य, ध्यान, विवेक, यम और संयम के द्वारा वृद्ध हैं, वे प्रशंसनीय हैं न कि सफेद बालों से वृद्ध प्रशंसनीय हैं।
चरित्र
क्रांतिकारी की प्रशंसा मैं तब करूँगा, जब वह अहिंसक हो।
अहिंसा
जिन लोगों ने इन्द्रियों के समस्त भोगों को त्याग दिया है और जो तपस्वी जीवन व्यतीत करते हैं, धर्म शास्त्र उनकी महिमा को अन्य समस्त बातों से अधिक उत्कृष्ट बताते हैं।
संयम
नंगा मन और नंगा तन ही मनुष्य की आदर्श स्थिति है।
ब्रह्मचर्य
दान तीर्थ है, मन का संयम तीर्थ है संतोष को भी तीर्थ कहा जाता है लेकिन ब्रह्मचर्य परम तीर्थ है।
ब्रह्मचर्य
सुन्दर चेहरा देखकर विद्वत्ता भैंस चराने चली जाती है, अतः राख बनने वाले चेहरे देखने से बचें।
ब्रह्मचर्य
काम क्रोध ऊर्जा का अपव्यय है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री नहीं बाँधती, स्त्री की आकांक्षा बाँधती है।
ब्रह्मचर्य
काम का चिन्तन मन को और काय का आलिंगन देह को विकृत कर देता है।
ब्रह्मचर्य
विचार करो, जिससे आप सुख चाहते हैं, क्या वह सर्वथा सुखी है? क्या दुःखी नहीं है? दुःखी व्यक्ति आपको सुखी कैसे बना सकता है।
ब्रह्मचर्य
पुरुष के पास दृष्टि होती है और नारी के पास विषय कषाय सम्बन्धी दिव्य दृष्टि होती है अतः सावधान रहें।
ब्रह्मचर्य
जिस प्रकार सूक्ष्म छेद वाले जाल में फँसी हुई दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ मिलकर जाल को काट डालती हैं, उसी प्रकार ये काम और क्रोध दोनों विशिष्ट ज्ञान को लुप्त कर देते हैं।
ब्रह्मचर्य
काम वासना पर विजय जीवन का सबसे ऊँचा पुरुषार्थ है।
ब्रह्मचर्य
बुद्धिमान व्यक्ति वासना को शान्ति से वश में करता है, द्वेष तिरस्कार को प्रेम से जीतता है और अपकार के बदले में उपकार करता है।
संयम
बाहर जाती हुई उपयोग की धारा को अन्तर्मुखी बना देना ब्रह्मचर्य है।
ब्रह्मचर्य
शरीर व शरीर के अन्य अंगों से ब्रह्मचर्य पालना आसान है किन्तु मन का ब्रह्मचर्य अति कठिन है, मन का ब्रह्मचर्य ही परमब्रह्म से मिला सकता है।
ब्रह्मचर्य
जो जननेन्द्रिय के विकारों को रोकने की ठाने, उसे तमाम इन्द्रियों के विकारों पर काबू पा लेना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
मन के विकार में हम मददगार न हों तो आखिर हमारी जीत ही है।
संयम
यह सच है कि वीर्य-रक्षा ही ब्रह्मचर्य नहीं है पर वीर्य-रक्षा उसका प्रथम चरण अवश्य है।
ब्रह्मचर्य
वीर्य नाश से शरीर को निचोड़ना बेवकूफी है क्योंकि वीर्य का उपयोग शरीर और मन की शक्ति बढ़ाने के लिए है।
ब्रह्मचर्य
सच्चा मित्र और उत्तम पुस्तकें ब्रह्मचर्य पालन में सहायक होती हैं।
ब्रह्मचर्य
साधना के लिए विवाहित हो ही गये हो तो दोनों स्त्री-पुरुष एक दूसरे को भाई-बहन समझें।
ब्रह्मचर्य
बुद्धि व विवेक उसी का साथ देता है जो स्पर्शन, रसना इन दोनों काम इन्द्रियों को जीत लेता है। ब्रह्मचर्य-व्रत पालन के चार उपाय हैं– १. उसकी आवश्यकता को अच्छी तरह समझना तथा सत्संगति करना। २. इन्द्रियों को धीरे-धीरे वश में करना तथा मन में बुरे विचार न आने देना। ३. शुद्ध साथी, शुद्ध मित्र, शुद्ध पुस्तकें रखना और शुद्ध सात्त्विक आहार करना। ४. नित्य योगाभ्यास करना।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य का पालन करने से आत्म बल बढ़ता है।
ब्रह्मचर्य
जिसके पास शील है वह कुरूप होकर भी रूपवान, निर्धन होकर भी धनवान है तथा जिसके पास शील नहीं है वह रूपवान होकर भी कुरूप और धनवान होकर भी निर्धन है।
ब्रह्मचर्य
जिन साधकों ने स्त्रियों के संसर्ग से पीठ फेर ली है वे साधक समस्त उपसर्गों में स्थिर रहते हैं। विष खाना अच्छा है किन्तु विषय सुख का सेवन करना अच्छा नहीं है क्योंकि विष खाने से तो जीव एक ही बार मरण का कष्ट पाता है किन्तु विषय रूपी स्त्री के सेवन से मनुष्य नरक के गड्ढे में गिर कर बार-बार कष्ट पाता है अरे! विष तो खाने से ही मनुष्य को मारता है लेकिन विषय तो स्मरणमात्र से मनुष्य के संयमी जीवन की हत्या कर डालते हैं।
ब्रह्मचर्य
माता, बहन, पुत्री के साथ भी एकान्त में नहीं बैठना चाहिए क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी बलवती होती हैं, वे तपस्वी पुरुषों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं। अरे जिस प्रकार लाख का घड़ा आग के पास रखते ही पिघल जाता है, वह शीघ्र ही चारों ओर से तपकर गलकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही ब्रह्मचर्य भी स्त्री के साथ निवास करने से भ्रष्ट, शिथिलाचारी हो जाता है, अरे संसर्ग तो दूर रहा, स्त्री के स्मरण मात्र से ब्रह्मचारी का संयम नष्ट हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
काम-भोगों की लालसा में ही प्राणी उन्हें भोगे बिना ही दुर्गति में चले जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्री के साथ भोजन न करें, भोजन करती, छींकती, जंभाई लेती, एकान्त में सुखपूर्वक बैठी स्त्री को न देखें, नेत्रों में काजल या अंगों में उबटन लगाती हुई, नग्न बैठी हुई, स्नान करती हुई या प्रसव करती हुई स्त्री को तेजस्वी होने की इच्छा वाला साधक न देखें।
ब्रह्मचर्य
दिन में अनुराग बुद्धि से युवती (स्त्री) के साथ हर्षित होकर संभाषण करने वाले की अन्यजन हँसी मजाक किया करते हैं और दूसरे कितने ही जन उसकी निन्दा भी करते हैं, अतः साधु को स्त्री चर्चा छोड़ देना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
असावधान यौवन का भविष्य, दयनीय 'बुढ़ापा' होता है।
ब्रह्मचर्य
शीलवती स्त्री के पास लज्जा स्वभाव से होती है।
चरित्र
जो कोई भी स्त्री को वासना की दृष्टि से देखता है, समझ लो कि वह अपने मन के द्वारा उससे व्यभिचार कर चुका है।
ब्रह्मचर्य
वासना का पागलपन थोड़ी देर रहता है किन्तु उसका पछतावा बहुत देर तक रहता है।
ब्रह्मचर्य
जिस सौन्दर्य में शील नहीं, वह अशोभनीय है और जिस शील में संयम नहीं, वह नाटकीय है। बिना सद्गुण के सुंदरता अभिशाप है।
चरित्र
यदि आप सच्ची सुगंध फैलाना चाहते हैं तो श्रृंगार से परहेज करें और सुगंधित द्रव्यों के पीछे न दौड़ें।
चरित्र
स्वच्छता फटे पुराने वस्त्रों में भी सौन्दर्य ला देती है।
चरित्र
कुरूपता शील से सुशोभित होती है।
चरित्र
लज्जा नारी-जीवन का अनमोल रत्न है, जिसने इसे खो दिया उसका जीवन व्यर्थ है, फिर चाहे वह धनसम्पन्न परिवार की नारी ही क्यों न हो?
ब्रह्मचर्य
अच्छे कुल की सती स्त्री, पर पुरुष का धक्का लगने पर क्षमा माँगकर आगे बढ़ जाती है।
चरित्र
स्त्रियों पर विश्वास करना विनाश का कारण होता है। नारी शीघ्र शान्ति का हरण करने वाली होती है।
ब्रह्मचर्य
इन्द्रियों को अपने वश में रखने वाले के लिए नारी महत्त्वहीन है।
ब्रह्मचर्य
किसी भी पुरुष का दूसरी स्त्री से सम्बन्ध जोड़ना पाप है।
ब्रह्मचर्य
जिस तरह मुर्दे को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करना व्यर्थ है, उसी तरह स्त्री के सुख भोग से विरक्त हुए व्यक्ति के लिए धन का संचय करना व्यर्थ है।
ब्रह्मचर्य
जो मुनि महीने-महीने का उपवास करके केवल जल ही ग्रहण करता है ऐसा तपस्वी भी स्त्री की संगति पाकर मोहित हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
पुरुष को दूषित करना स्त्रियों का स्वभाव है, इसलिए विवेकी पुरुष युवती (स्त्रियों) के विषय में कभी प्रमाद नहीं करते हैं।
ब्रह्मचर्य
क्रोधित शेरनी का आलिंगन करना अच्छा है, कुपित नागिन से लिपट जाना अच्छा है किन्तु परनारी का आलिंगन करना योग्य नहीं है।
ब्रह्मचर्य
कामी व्यक्ति का मन सत्तर वर्ष की उम्र में भी सत्तरह वर्ष का हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
बच्चे माता-पिता के प्यार से वंचित हो रहे हैं, तभी वे दूसरे के प्यार के चक्कर में जिन्दगी बर्बाद कर रहे हैं।
परिवार
सभी नकारात्मक भावनाओं का एक ही समाधान है कि इस हालात और हकीकत को स्वीकारें जब भी दुःखी हो अपने आप से एक प्रश्न पूछे ''मैं क्या स्वीकार कर रहा हूँ'' यदि यह समझ में आ गया तो कभी दुःखी नहीं होंगे।
मन
सर्पिणी स्पर्श से खाती है पर स्त्री दूर से ही खा लेती है अतः स्त्री का नाम भी सुनकर दूर भाग जाना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
कामी पुरुष सुख-दुःख, हित-अहित, पुण्य-पाप, वध-बन्धनादि, मरण की समीपता और दुर्गति को नहीं जानता है तिल बराबर सुख के लिए सुमेरु बराबर इस लोक-परलोक में दुःख भोगता है। संयमित जीवन ही जिनशासन की प्रभावना का प्रतीक है।
ब्रह्मचर्य
मनुष्य जन्म उसका सार्थक है जिसका जीवन संयम मय और मरण समाधिपूर्वक होता है।
समाधि
अब्रह्म से शारीरिक क्षति से सहस्रगुणी आध्यात्मिक क्षति होती है।
ब्रह्मचर्य
मोती की कीमत चमक, साधना की कीमत ब्रह्मचर्य है। जीवन में करोड़ों उपवास, लाखों जप कर लेना लेकिन शीलहीन का जप-तप कार्यकारी नहीं होता है। सील की कीमत होती है, यदि सील खुल गयी तो बाजार में कीमत कम हो जाती है।
ब्रह्मचर्य
कार्य सिद्धि होने तक अपनी बात गुप्त रखें।
विवेक
बुद्धि को सुरक्षित रखना है तो वीर्य की रक्षा करो, संयम का पालन करो।
ब्रह्मचर्य
परस्त्री पर मोहित होना ही अपनी स्वतन्त्रता बेचना है।
ब्रह्मचर्य
व्रत पालन करना आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला है।
धर्म
व्रत हीन जीवन बिना ब्रेक की गाड़ी के समान खतरनाक होता है।
धर्म