Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 1

आत्म साधना सूत्र

124 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय निग्रह, शास्त्र ज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्ति अनुसार दान देना और कृतज्ञता–ये आठ गुण पुरुष की ख्याति बढ़ा देते हैं।
चरित्र
किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
प्रकृति ने सूर्योदय, सूर्यास्त, गर्मी, बरसात, ठंड सब का समय निश्चित कर रखा है केवल मनुष्य को ही हर बात की छूट दे रखी है, कब सोना, कब जागना, क्या करना सब कुछ स्वयं मनुष्य के हाथ में है वह सब कुछ करने में स्वतंत्र है।
विवेक
उपदेश भले ही थोड़ा हो पर जो उच्चारण में हो वही आचरण में हो, जो मुख में हो वही मन में हो, जो दिमाग में हो वही दिल में हो, जो जिह्वा में हो वही जीवन में हो।
चरित्र
गृहस्थ के द्वारा मरण पर्यन्त जो पाप संचित किए जाते हैं। उन सब पापों को एक रात्रि का दीक्षित साधु'' नियम से भस्म कर देता है।
धर्म
जिन्दगी छोटी है जंजाल बड़े हैं। जंजालों को छोटा करो, जिन्दगी स्वयं सुखी और लम्बी हो जाएगी।
संतोष
आपके पास सिर्फ तीन ही चीजें हैं तन-मन और धन। अतः आप तन को अपने बीबी-बच्चों को दे देना, धन कुटुंब-कबीले को देना तो चल भी सकता है किन्तु 'मन' किसी को मत देना, मन तो मात्र परमात्मा के स्मरण में लगाना चाहिए।
मन
दुर्गति का घोंसला छोटी-छोटी बुरी आदतों के तिनकों से ही बुना जाता है।
चरित्र
दूसरों के दोषों पर ध्यान देने से स्वयं का मन गंदा होता है।
विवेक
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति
जीव का 'अपवित्र मन' ही प्रधान नरक है। उस मन की वेदना–चिंता, भय और अशान्ति ही नारकीय यातना है।
मन
तन से नहीं, मन से मिलें, पर से नहीं, स्व से मिलें।
मन
जो 'वर्तमान' में नहीं जीता है वह कभी 'वर्द्धमान' नहीं बन पाता है।
समय
यदि अपना उत्थान औरों के भरोसे हो सकता, तो गधा अब तक इंसान बन गया होता।
पुरुषार्थ
हर दिन यह सोचकर जियो कि आज जीवन का आखिरी दिन है।
समय
यह पर्याय पदार्थ पाने को नहीं, परमार्थ पाने को मिली है।
धर्म
आत्महित का पथ चर्चा प्रधान नहीं, चर्या प्रधान है।
चरित्र
आत्म रक्षा में कभी भी आलस्य या असावधानी नहीं करना चाहिए।
संयम
सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई, दया मित्र, शान्ति पत्नि और क्षमा पुत्र; ये छह ही संसारी प्राणी को सुख देने वाले हैं।
धर्म
यह जीव पुण्य से स्वर्ग पाता है, पाप से नरक जाता है और पुण्य-पाप दोनों से ममता छोड़कर जो अपने आत्मा का मनन करता है, वह शिवमहल में वास पाता है।
कर्म
जैसे अतिथि आपके माल पर मालकियत नहीं जताता है, वैसे ही आप भी पर पदार्थ पर मालकियत मत जताओ क्योंकि आप भी अतिथि हो।
अनासक्ति
निरन्तर अध्ययन से ही ज्ञान प्राप्त होता है।
ज्ञान
मस्तिष्क के लिए अध्ययन की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी शरीर को व्यायाम की।
ज्ञान
प्रकृति की अपेक्षा अध्ययन के द्वारा अधिक व्यक्ति महान् बने हैं।
ज्ञान
अध्ययन हमें आनंद प्रदान करता है, अलंकृत करता है और योग्यता प्रदान करता है।
ज्ञान
जिसकी अनुभूति जितनी गहरी होती है, उसकी संवेदना उतनी ही व्यापक होती है।
मन
दुनिया में सभी को अकेले ही जीना मरना पड़ता है, भले ही बहुत भीड़ हो किन्तु अपने आँसु स्वयं को ही पोंछने पड़ते हैं।
अनासक्ति
आशा और आकांक्षा की दीवार परमात्मा के दर्शन नहीं होने देती।
अनासक्ति
आकुलता ही दुःखों की जननी है।
संतोष
स्वच्छ आँखों के दर्पण से ही स्वच्छ आत्मा के दर्शन सम्भव हैं।
विवेक
कैमरा नहीं, एक्स-रे की मशीन बनो, जिससे प्रत्येक प्राणी में परमात्मा दिखने लगे।
विवेक
चिन्ता नहीं चिन्तन करो।
मन
सच्चरित्र ही तीर्थ है, सद्ज्ञान ही धन है, सद्-दर्शन ही धर्म है।
चरित्र
आत्मविश्वास से मनुष्य को वीरता तथा सुदृढ़ता पैदा होती है।
पुरुषार्थ
जिस मनुष्य को आत्मविश्वास नहीं, वह कभी भी महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकता है।
पुरुषार्थ
अच्छी जीवन शैली के लिए आवश्यक है कि अगर हम गर्मी से बचने के लिए कमरे में एयर कंडीशनर का उपयोग कर रहे हैं तो दिमाग हीटर की तरह गर्म न रखें।
मन
आत्मा की हानि शारीरिक रोग से नहीं, विकारी भावों से होती है।
अनासक्ति
यदि आत्म कल्याण करना है तो बुरी आदत और भीड़ से मुक्त होना होगा।
संगति
विषयों से विरक्ति व अध्यात्म में आसक्ति वाला ही आनंद को प्राप्त करता है।
अनासक्ति
मनुष्य जितनी अधिक आवश्यकता पैदा करता है, उतना ही वह पराधीन हो जाता है।
संतोष
धन्य है वह जो आशा नहीं रखता क्योंकि उसे कभी निराश नहीं होना पड़ेगा।
संतोष
विश्वास ही व्यक्ति के लिए संजीवनी औषधि होता है।
भक्ति
आत्म कल्याण के लिए सरस्वती से श्रेष्ठतर कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई औषधि नहीं।
ज्ञान
समस्त भय और चिंताएँ इच्छाओं का परिणाम हैं।
संतोष
कनक, कामिनी और कीर्ति की कामना ही साधक को साधना से गिराती है।
अनासक्ति
सुख इन्द्रिय-विषयों में नहीं, इच्छाओं के रोकने में है।
संतोष
इन्द्रियाँ स्विच और मन मैन स्विच है, अतः इन्द्रियों को नहीं मन को जीतो।
संयम
इन्द्रियों को काबू में रखने की एक ही युक्ति है–उनसे प्रतिकूल काम करते रहना।
संयम
जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है, वह देवों के द्वारा भी वंदनीय है।
संयम
मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं। इसको वश में करके साधना करने वाला चतुर एवं धीर पुरुष काबू में किए हुए घोड़ों से सारथी की भाँति सुखपूर्वक यात्रा करता है।
संयम
इन्द्रियाँ वश में न होने के कारण अर्थ को अनर्थ और अनर्थ को अर्थ समझकर अज्ञानी पुरुष बहुत बड़े सुख से हाथ धो बैठता है।
संयम
जो अधिक धन का स्वामी होकर भी इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रखता वह इन्द्रियों को वश में न रखने के कारण ही ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
संयम
ईश्वर के द्वारा बताये नियमों का पालन करना ही ईश्वर का जाप है।
धर्म
किसी को किसी भी धार्मिक कार्य से रोकने पर आपने उसे ही नहीं रोका किन्तु अपने पुण्य आस्रव को रोका है एवं अपने पुण्य के द्वार बन्द किए हैं।
कर्म
उपकार करके उसके बदले की आशा रखना अपने सत्कर्म पर राख डालने के समान है।
दान
साधक का न तो जन-समुदाय में राग होना चाहिए, न एकान्त में। कल्याण परिस्थिति से नहीं होता, अपितु राग रहित होने से होता है।
अनासक्ति
हमारे जीवन में सुख कम और दुःख ज्यादा हैं, इसका कारण यह है कि हमने अपना उपयोग धर्म कमाने में कम और कर्म कमाने में अधिक किया है।
धर्म
सांसारिक उपलब्धियाँ समय में हैं, आध्यात्मिक उपलब्धियाँ संकल्प में हैं।
धर्म
आत्मा और परमात्मा का चिन्तन करने का नाम ही उपवास है।
ध्यान
किसी के अभाव में कष्ट की अनुभूति न होना अनासक्ति है।
अनासक्ति