Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 1

आत्म साधना सूत्र

124 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

जो चीज आपको आपसे दूर ले जा रही हो, वह 'पाप' है और जो चीज आपको आपके पास ला रही हो, वह 'पुण्य' है।
कर्म
मनुष्य को कर्मों का त्याग नहीं करना, अपितु कामना का त्याग करना है।
अनासक्ति
'कुकर्म' करते समय मीठे और सुखदायी लगते हैं और कर्मफल भोगते समय दुःखदायी लगते हैं।
कर्म
मानव जीवन कलह करने को नहीं कल्याण करने को मिला है।
धर्म
संसार से विमुख होने पर बिना प्रयत्न किए स्वतः सद्गुण आते हैं।
अनासक्ति
गुरु कहते हैं–तुम्हारी जैसी अर्जी, प्रभु की वैसी मर्जी।
भक्ति
विचार करो कि अपना कौन है? अगर अभी मौत आ जाये तो क्या कोई हमारी सहायता कर सकता है?
अनासक्ति
बालक जन्मता है तो वह बड़ा होगा कि नहीं, पढ़ेगा कि नहीं, उसका विवाह होगा कि नहीं, उसके बाल-बच्चे होंगे कि नहीं, उसके पास धन होगा कि नहीं आदि सब बातों में सन्देह है, पर वह मरेगा कि नहीं, इसमें कोई संदेह नहीं है।
समाधि
आगमन शब्द में ही गमन छुपा है। अतः जो आयेगा वह जायेगा जरूर लेकिन हाँ, जो जा रहा वह आयेगा इसकी कोई गारंटी नहीं, यही जीवन का सच है।
समाधि
जन्म को नहीं, मरण को सुधारो, अगला जन्म सुधर जायेगा।
समाधि
स्वयं को जाने बिना, संसार का सब कुछ जानना अन्ततः घातक ही है।
ज्ञान
जीवन को सहज भाव से लेना मुक्ति का पहला चरण है। आप स्वयं को महत्वाकांक्षों से जितना अधिक बाँधोगे, मुक्ति की मंजिल उतनी ही दूर होती जाएगी।
अनासक्ति
हमारा जन्म नर से नारायण बनने को हुआ है, ना कि नर से वानर बनने को।
चरित्र
जीवन जीने की कला है कि आप अपने निन्यानवे रुपये में सुखी रहिए एक रुपये की कमी की चिन्ता मत करिए।
संतोष
निष्कर्म होने के लिए जीवन में सरलता एवं सहजता लाइए।
चरित्र
जीवन का अमर फल उसी को प्राप्त होता है, जो स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ को अधिक महत्त्व देता है और समभाव से जीवन व्यतीत करता है।
धर्म
जीवन सफल करने के लिए पहले खोजिए 'मैं कौन हूँ?'
ज्ञान
मुक्ति इच्छा के त्यागने से होती है, वस्तु के त्यागने से नहीं।
अनासक्ति
दुनिया का सबसे दरिद्र व्यक्ति वह है जिसके पास अपने लिए समय नहीं है।
समय
देह की उपयोगिता तो है किन्तु देह ही अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता, समूचे व्यक्तित्व का विकास करना है तो देह के साथ आत्मा को भी जानना होगा।
ज्ञान
धर्म और प्रेम जीवन का दान देकर हासिल किया जाता है।
धर्म
जब तक तुम्हें अपने लिए सुख और दूसरे के लिए दुःख की चाह है, तब तक तुम सदा दुःखी रहोगे।
अनासक्ति
यदि जिंदगी को नरक नहीं बनाना चाहते तो न किसी से अपेक्षा करो, न उपेक्षा पर ध्यान दो।
संतोष
संत, पंथ, मंत्र और ग्रन्थ को बार-बार बदलने वाला दुःखी होता है।
धर्म
अब देश से नहीं अपितु इस देह से स्वतन्त्र होना चाहिए।
अनासक्ति
अपने दोषों को माफ मत कीजिए और दूसरों के दोषों पर ध्यान मत दीजिए।
विवेक
'सन्तोष' से काम, क्रोध और लोभ; तीनों नष्ट हो जाते हैं।
संतोष
हम जैसे होते हैं या हमारी दृष्टि जैसी होती है वस्तु प्रायः वैसी दिखती है पर आवश्यक नहीं वस्तु वैसी ही है।
विवेक
जिसकी दृष्टि में भुक्ति है अर्थात् भोग हैं; मुक्ति उससे बहुत दूर है।
अनासक्ति
अपने कृत्य पर दृष्टि नहीं और दूसरे के कृत्य पर दृष्टि रखना ही सबसे बड़ी अज्ञानता है।
विवेक
जिससे राग हो जाता है, उसमें दोष नहीं दिखते और जिससे द्वेष हो जाता है, उसमें गुण नहीं दिखते।
अनासक्ति
राग-द्वेष रहित होने पर ही वस्तु अपने वास्तविक रूप में दिखती है।
अनासक्ति
धर्म को तिलांजलि देकर न कभी कोई सुखी हुआ है और न ही कभी कोई सुखी हो सकता है। धर्म नहीं जाना चाहिए चाहे सब कुछ चला जावे। धर्म गया तो फिर कुछ नहीं बचेगा।
धर्म
धर्म 'पंथ' नहीं, 'पथ' देता है जिस पर चलकर परमात्मा तक जाया जा सकता है। पथ चलने के लिए होता है जबकि पंथ पकड़ने और झगड़ने के लिए होता है।
धर्म
दुनिया का सबसे बड़ा धर्म स्वयं को जानना है।
धर्म
'धर्म' का सम्बन्ध तन से नहीं मन से होता है, देह से नहीं दिल से होता है, प्रदर्शन से नहीं आत्मदर्शन से होता है।
धर्म
'कर्म' को ध्वस्त करने के लिए धर्म में व्यस्त रहिये।
धर्म
'अधर्म' से जीने की अपेक्षा धर्म से मरना ही श्रेयस्कर है।
धर्म
'धर्म' का आभूषण वैराग्य है, वैभव नहीं।
धर्म
'धर्म' हीन मनुष्य बिना पतवार की नाव के समान है।
धर्म
'धर्म' के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान बिना धर्म अंधा है।
धर्म
यदि गुलाब की तरह सभी को आकर्षित करना चाहते हो तो याद रखो कि सुख में फूलना नहीं और दुःख में कूलना नहीं।
चरित्र
ईश्वर के चिंतन से करोड़ों पाप इस तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे आग की एक चिंगारी सूखी घास के ढेर को जला देती है।
ध्यान
जैन दर्शन में आत्मा का ध्यान प्रमुख है और जैनेत्तर दर्शन में परमात्मा का ध्यान मुख्य है।
ध्यान
'ध्यान' स्वयं में सोई हुई शक्ति को जगाने की प्रक्रिया है।
ध्यान
'ध्यान' में परिग्रह और परिचय ही बाधक है।
ध्यान
'ध्यान' की अग्नि कर्मों के पर्वतों को तिनके की भाँति जला देती है।
ध्यान
आत्महित की भावना ही सच्चा 'ध्यान' है।
ध्यान
'ध्यान' के लिए वित्त की नहीं चित्त की जरूरत होती है।
ध्यान
दुनिया में ऐसा कोई मंत्र नहीं जो एकाग्रता से सिद्ध न हो सके।
ध्यान
व्रतों को सही ढंग से समझने से नम्रता अपने आप आने लगती है।
विनम्रता
उस काम को, जिसे तुम दूसरे व्यक्ति में बुरा समझते हो, स्वयं त्याग दो लेकिन दूसरों पर दोषारोपण न करो।
विवेक
अपनी आलोचना (निंदा) में रुचि होना इस बात का सबूत है कि मैंने अपने घर की देखभाल शुरू कर दी है।
विनम्रता
चाहे आप हिम के समान निर्मल और निष्पाप हो जाओ तब भी निंदा से नहीं बच सकते।
वाणी
दूसरों की निंदा और अपनी प्रशंसा करने से नीचगोत्र का बंध होता है और वह बंध दूसरे गुणस्थान तक ही होता है अतः निंदा करने वाला नियम से ही मिथ्यादृष्टि पापी है।
वाणी
दूसरे की जिन्दगी के बारे में अँगुली उठाना बहुत आसान है स्वयं की तरफ उठाना उतना ही कठिन है।
विवेक
वास्तव में मूल चीज 'मानसिक नियंत्रण' है।
संयम
सब नियंत्रणों से बढ़कर 'आत्म नियंत्रण' श्रेष्ठ होता है।
संयम
'निराग्रह' व्यक्ति ही निर्माण को उपलब्ध होता है।
अनासक्ति
आजकल ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, पर्यावरण प्रदूषण का इतना आतंक नहीं है जितना कि मानसिक प्रदूषण का है।
मन