Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Discernment (Vivek)

विवेक

522 सूत्र · पृष्ठ 4 / 7

धन, साधन, समय, कर्म तथा स्थान; इन पाँचों का स्पष्ट विचार करके ही किसी कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए।
विवेक
तुम अपने जीवन का निरीक्षण, विश्लेषण कर देखो! यदि तुम्हारे जीवन में शान्ति बढ़ रही है, संतोष बढ़ रहा है, आनंद बढ़ रहा है तो तुम्हारा जीवन सही है, यदि अशान्ति बढ़ रही है, तनाव बढ़ रहा है और जीवन बोझिल हो रहा है तो गलत है, यह बात स्वयं सोचो, स्वयं विचारो किसी दूसरे से पूछने की जरूरत नहीं जीवन की दिशा बदलो, जीवन का मार्ग बदलो।
विवेक
पीछे के अनुभवों से जो लाभ नहीं उठाते, वे भविष्य को नहीं बना सकते, जो भविष्य को दूर तक नहीं देखता, वह ठोकर खाकर गिर पड़ता है।
विवेक
कई युद्ध ऐसे भी होते हैं जिनमें हारना ही विजय है।
विवेक
युवकों को अपने जोश का उपयोग करना चाहिए पर होश के साथ।
विवेक
कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से पहले उसके अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं पर विचार कर लेना चाहिए।
विवेक
सफलता उन्हीं के चरण चूमती है जो किसी भी समस्या या कार्य के दोनों पक्षों को देखते हैं और जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं करते हैं।
विवेक
हर किसी को खुश रखने की कोशिश विफलता का रास्ता है।
विवेक
अपने कार्य के अभिप्राय को देखो, आप प्रायः उसके लिए प्रयत्न नहीं करते हैं जो सच में आपको चाहिए हैं। सभी लक्ष्य आसानी से प्राप्त नहीं होते हैं
विवेक
किसी भी कार्य को करने में हमारी प्राथमिकता स्वयं की जागरुकता, उपयोगिता, आवश्यकता होनी चाहिए यह नहीं सोचना चाहिए कि लोग क्या कहेंगे, जैसे ही भय आपके करीब आये उस पर आक्रमण कर नष्ट करें।
विवेक
अपनी कमजोरियों का जिक्र न करना जमाने से क्योंकि लोग कटी पतंग को लूटते हैं।
विवेक
धन, साधन, समय, कर्म और स्थान इन पाँचों का स्पष्ट विचार करके किसी कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए।
विवेक
मौके का लाभ न उठाना सबसे बड़ा दुर्भाग्य है मगर किसी के हालात व मजबूरी का लाभ नहीं उठाना चाहिए।
विवेक
दोषग्राही मिथ्यादृष्टि गुणग्राही सम्यग्दृष्टि होता है।
विवेक
जो जिस कार्य में निपुण हो, उसे ही उस कार्य में लगायें, शास्त्रों का ज्ञाता मनुष्य भी यदि अनजाने काम में हाथ डाले तो धोखा खा जायेगा।
विवेक
उचित उपाय से न किया हुआ प्रयास अन्य अनेक व्यक्तियों का आश्रय प्राप्त होने पर भी व्यर्थ ही जाता है।
विवेक
गुणशीलता, तात्कालिक परिस्थिति तथा भविष्य का विचार करके शीघ्रता तथा दीर्घ सूत्रता दोनों दोषों को छोड़कर देश-काल के अनुकूल अपना कार्य करना चाहिए।
विवेक
कोई काम चाहे अच्छा हो या बुरा, बुद्धिमान को पहले उसके परिणाम का विचार करना चाहिए बाद में काम में हाथ लगाना चाहिए।
विवेक
उसी काम का करना ठीक है जिसे करके पश्चाताप न करना पड़े और जिसके फल का प्रसन्न मन से भोग कर सकें।
विवेक
विष से भी अमृत को, बालक से भी सुभाषित को, शत्रु से भी सदाचार को और अपवित्र स्थान से भी सुवर्ण को ग्रहण करना चाहिए।
विवेक
शत्रु के भी गुण ग्रहण करने चाहिए और गुरु के भी दोष बताने में संकोच नहीं करना चाहिए।
विवेक
बुद्धिमत्ता के साथ तथा धीमे चलो, जो तेज भागते हैं, उन्हें ठोकर लगती हैं।
विवेक
एक ही पत्थर से दो बार ठोकर खाना लज्जा जनक है।
विवेक
देखने, बोलने, सोचने और करने के विषय में पहले सोचिए कि क्या देखना, क्या बोलना, क्या सोचना और क्या करना क्या नहीं करना।
विवेक
जल्दबाजी में न कोई काम स्वयं करें, न दूसरे से करवाएँ, जल्दीबाजी में काम लेने से मूर्ख आदमी को पछताना पड़ता है।
विवेक
जो आदमी बिना विचारे जल्दबाजी में काम करता है, उसके वे काम ही उसे तपाते हैं, जैसे मुँह में डाला हुआ गर्म भोजन।
विवेक
जो मिट्टी से भी सोना बनाते हैं, वही व्यवहार कुशल है।
विवेक
किसी वस्तु के दोष का ध्यान न करते हुए विद्वान् उनके गुणों को ग्रहण कर लेते हैं, भौंरा जैसे काँटो वाले फूलों की गंध और पराग का उपयोग कर लेता है।
विवेक
यदि परिस्थिति अनुकूल हो तो सीधे अपने लक्ष्य की ओर चलो किन्तु जब परिस्थिति अनुकूल न हो तो उस मार्ग से चलो जिसमें सबसे कम बाधाएँ आने की सम्भावना हो।
विवेक
सुधार की दृष्टि से गुरु के पास किसी की भी शिकायत करना चुगली नहीं परोपकार है।
विवेक
निश्चिन्त हो जाने का अर्थ है असावधान हो जाना।
विवेक
उपासना के द्वारा विवेक उत्पन्न होता है, विवेकी होने से क्षणिक वस्तुओं का शोक और आनन्द ये दोनों ही नहीं होते हैं।
विवेक
वस्तु का महत्त्व नहीं है, प्रत्युत उसके सदुपयोग का महत्त्व है।
विवेक
अंधा वह नहीं जिसकी आँखें नहीं, अंधा तो वह है जो अपने दोषों को ढँकता है।
विवेक
बुद्धिमान को चाहिए कि किसी का वेष देखकर विश्वास न करें क्योंकि वेष तो दोष के लिए भी ग्रहणकर लिया जाता है।
विवेक
जो स्वयं को हर परिस्थिति के अनुसार ढालना जानता है, उसे जीवन जीने की कला आ जाती है।
विवेक
विवेक से रहित लोगों का सैकड़ों प्रकार से पतन होता है।
विवेक
संसार में जो लोग बड़े काम करते हैं, उनका व्यवहार हमारे समान साधारण लोगों के साथ यदि अक्षर-अक्षर न मिले, तो उन्हें दोष देना असंगत है, यहाँ तक कि अन्याय है।
विवेक
अपना हित करने वाली बातें पहले सुनने में कड़वी लगती हैं, परखने से अंत में वे ही बातें अत्यन्त प्रिय होती हैं।
विवेक
अकेला औचित्य गुण ही गुणों की बड़ी राशि के समान महत्त्वपूर्ण है, औचित्य गुण के बिना तो गुणों का समूह भी विषाक्त हो जाता है।
विवेक
लोग सारभूत पदार्थ की अपेक्षा छिलके पर ज्यादा झगड़ते हैं यह अविवेक है।
विवेक
जीवन में शुद्ध दृष्टिकोण का अभाव ही हमारी प्रमुख समस्या है, जिसके रहते शेष समस्यायें लाख यत्न करने पर भी नहीं सुलझ पाती हैं।
विवेक
दूसरों के दुर्भाग्य से बुद्धिमान व्यक्ति यह शिक्षा ग्रहण करते हैं कि उन्हें पाप से बचना चाहिए।
विवेक
किसी भी दोष का ज्ञान न होना ही सबसे बड़ा दोष है।
विवेक
अज्ञानी का वैराग्य धारण करना, तपस्वी का काम सेवन करना, दरिद्र का श्रृंगार करना, नौकर का आज्ञाकारी न होना ये किसके लिए सिर दर्द नहीं होता अर्थात् सभी को दुःख जनक होता है।
विवेक
जो उपदेश का लक्ष्य केवल पर को ही बनाते है, वे मूर्ख हैं।
विवेक
किसी भी कार्य में सामने वाले व्यक्ति की जरूरत को समझकर उसका समाधान किया जाये तो बहुत समय और ऊर्जा की बचत होगी।
विवेक
जरूरत समझे बिना किए गये कार्य के परिणाम ही व्यथित करते हैं।
विवेक
कर्ज इंसान की सोच पर पर्दा डाल देता है और जब तक पर्दा हट पाता है, बहुत देर हो चुकी होती है। क्रोध मूर्खों की छाती में ही बसता है।
विवेक
रास्ते पर कंकड़ ही कंकड़ हो तो भी एक अच्छा जूता पहनकर उस पर चला जा सकता है लेकिन यदि एक अच्छे जूते के अन्दर एक भी कंकड़ हो तो एक अच्छी सड़क पर भी कुछ कदम चलना मुश्किल होता है अर्थात् बाहर की चुनौतियों से नहीं हम अपनी अन्दर की कमजोरियों से हारते हैं।
विवेक
हम समझौता चाहते हैं जब हम गलत होते हैं परन्तु हम न्याय चाहते हैं जब दूसरे गलत कर रहे होते हैं, कितना अजीब है हमारे मन का तर्क।
विवेक
दो किनारों के बीच बहने वाला जल ही सागर तक पहुँचता है।
विवेक
उपकार करना पर स्वयं कष्टमय मत होना और पापी का उपकार करना सर्प को दूध पिलाना है।
विवेक
आप अपनी गलतियों पर अच्छे वकील हैं और दूसरों की गलतियों पर बहुत अच्छे न्यायाधीश बन जाते हैं पर स्वयं पर सत्य न्याय करने की कृपा करें।
विवेक
अंधा वह नहीं जिसकी आँख फूट गयी अपितु अंधा वह है जो अपने दोष ढकता है।
विवेक
भेषधारी साधु को, गुरु को, ब्राह्मण को, राजा को, स्त्री को, मूर्ख को, बालक को और सर्प को पंडितजन कुपित नहीं करते हैं। समाधि निष्परिग्रही की होती है।
विवेक
बुद्धि का फल तत्त्व विचार, शरीर का फल व्रत धारण, धन का फल पात्र दान और वाणी का फल मनुष्यों में प्रीति उत्पन्न करना है।
विवेक
इस तरह न कमाओ की पाप हो जाये, इस तरह न गमाओ की कर्ज हो जाये, इस तरह न खाओ की मर्ज हो जाये, इस तरह न बोलो कि क्लेश हो जाये, इस तरह न चलो कि देर हो जाये, इस तरह न सोचो कि चिन्ता हो जाये।
विवेक
जहाँ न सम्मान हो, न आजीविका हो, न बन्धुजन हो, न अपने धर्म की रक्षा हो, न धर्मात्मा, न दानी, न परोपकारी, न गुणवान हों और न विद्या प्राप्ति का साधन हो, न राजा हो अथवा बहुत राजा हों, जहाँ स्त्री राजा हो या बालक राजा हो या मूर्ख राजा हो वहाँ नहीं रहना चाहिए।
विवेक
सर्वाधिक धारा प्रवाही वक्ता अथवा सर्वाधिक उपयुक्त तार्किक सदैव न्याय पूर्ण विचारक नहीं होते हैं।
विवेक
अनुचित कार्यारंभ, आत्मीय जन से विरोध, बलिष्ठों से ईर्ष्या, स्त्रियों पर विश्वास ये ४ मृत्यु के द्वार हैं।
विवेक
डरपोक स्वभाव वालों का, क्रोधी का, धूर्त का, आलसी का कृतघ्न का, दूतों का, नास्तिक का और पुरुषत्व के अभिमान का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
विवेक
लोभी को धन से, अभिमानी को विनम्रता से, मूर्ख को मनोरथ पूरा करके और पंडित को सच बोलकर वश में किया जाता है।
विवेक
जो योग्यता के अभाव में पद प्राप्त कर लेते हैं, वे धर्म और राज्य का विनाश करते हैं क्योंकि दूसरों की बात सुनकर मानता है, दूसरे के अनुसार चलता है उसका विनाश निश्चित है।
विवेक
स्त्रियों का, नदियों का, राजकुल का, सर्प का, सींग वाले प्राणियों का, बड़े-बड़े नख वाले जीवों का, शस्त्र धारण करने वाले का, समान बल वाले का और शत्रु का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
विवेक
अपने शत्रु की बातों पर सदैव ध्यान दीजिए क्योंकि आपकी कमजोरियों को उनसे अधिक कोई नहीं जानता है।
विवेक
दुश्मनों के बीच दाँतों के बीच जीभवत् रहिये।
विवेक
कमजोर व्यक्ति से दुश्मनी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि वह उस समय वार करता है, जब हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
विवेक
बिना सोचे समझे खर्च करने वाला, असहाय रहते हुए झगड़ा करने वाला एवं सब जगह व्याकुल रहने वाला पुरुष शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
विवेक
आपत्ति उपस्थित होने पर जो उसका प्रतिकार कर लेता है वह बुद्धिमान है।
विवेक
हम संसार को गलत पढ़ते हैं और कहते हैं कि वह हमें धोखा देता है।
विवेक
यदि तुम सावधानी से हर समय और प्रत्येक प्रकार के आदमियों से रक्षा करने में सुस्ती नहीं करते तो इसके बराबर अच्छी और क्या बात है?
विवेक
क्या तुम अपना सर्वनाश करना चाहते हो? तो ज्ञानियों के सदुपदेश पर ध्यान न दो और जाकर उन लोगों के साथ छेड़खानी करो, जो जब चाहें तुम्हारा सर्वनाश करने की शक्ति रखते हैं जो दुर्बल मनुष्य बलवान् और सत्ताधारी पुरुषों का अपमान करता है, वह मानों यमराज को अपने पास आने के लिए संकेत करता है।
विवेक
कोई कितना ही बड़ा क्यों न हो अन्धों की तरह उसके पीछे मत चलो।
विवेक
खोटी सलाह से राजा, परिग्रह से साधु, लाड़-प्यार से पुत्र, बिना अध्ययन से ब्रह्मण, कुपुत्र से कुल, दुर्जन की सेवा से शील, स्नेह न करने से मित्रता, अनीति से समृद्धि, अधिकतर प्रवास से स्नेह, मदिरापान से लज्जा, देखभाल न करने से खेती और प्रमाद करने से त्याग रूपी धन नष्ट हो जाता है।
विवेक