Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
आहार

जिन पुरुषों ने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया है, वे सुरीली आवाज वाले, निर्मल शरीर से युक्त तथा सुन्दर वस्त्राभूषणों से सहित मनुष्य होते हैं, वह सब रात्रिभोजन त्याग का ही फल है, इसमें संशय नहीं है।

Men who earlier renounced eating at night become people with melodious voices, pure bodies and fine clothes and ornaments; all this is the fruit of renouncing night-eating—of this there is no doubt.

— आराध्य सूत्र · पूज्यपाद श्रावकाचार · #233

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वनमाला और लक्ष्मण का संवाद आगम सम्मत– लक्ष्मण ने कहा! ''मुझे छोड़ दो'' कार्य हो जाने पर मैं तुम्हें लेने आऊँगा, मुझे देव आदि की शपथ है, लेकिन वनमाला को उनके आने में संदेह हुआ, तब लक्ष्मण ने कहा कि, सुनो यदि मैं न आऊँ तो मुझे रात्रि भोजन का पाप लगे। (धर्म संग्रह श्राव. अधिकार-३] श्लोक २८/२९) रामचन्द्र जी को अच्छी तरह व्यवस्थित करके यदि मैं तुम्हारे पास न आऊँ तो मुझे (लक्ष्मण को) गौ हत्या, स्त्री हत्या आदि का पाप लगे। इस प्रकार अन्य शपथों के करने पर भी वनमाला ने लक्ष्मण से एक ही शपथ करायी कि आपको रात्रिभोजन का पाप लगे।
आहार
वर्षा ऋतु में जो रात्रिभोजन करता है उसकी सैकड़ों चन्द्रायण व्रतों से भी शुद्धि नहीं हो सकती है। कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कला की तरह एक-एक ग्रास घटाना शुक्ल पक्ष में एक-एक ग्रास बढ़ाना इस प्रकार एक माह में एक चन्द्रायण व्रत होता है। ''सूर्य के अस्त हो जाने से हृदय और नाभि में स्थित कमल भी बंद हो जाता है इसलिए रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।''
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुँआ जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
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