Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 210

शुचि संस्कृत सदन।

40 सूत्र

इन्द्रिय विषय का त्याग, तप का धारण, ब्रह्मचर्य का पालन, मद का त्याग, श्रुत का अभ्यास, मिथ्यात्व और कषाय के त्याग से शौच धर्म होता है।
धर्म
गुणों की प्रशंसा, निरन्तर तत्त्वों का चिन्तन और पापों से भय होना शौच धर्म है।
धर्म
हिंसक, परधनहर्ता, परस्त्री गामी व्यक्ति यदि करोड़ों तीर्थों में स्नान, करे करोड़ों तीर्थ वन्दना करें, करोड़ों का दान करें, करोड़ों वर्ष तप करे, शास्त्रों का अध्ययन करे तो भी शौच धर्म नहीं हो सकता है।
धर्म
साफ़ और स्वच्छ दर्पण में उभरने वाला प्रतिबिम्ब स्वच्छ होता है, उसी प्रकार स्वच्छ हृदय में धर्म अवतरित होता है।
धर्म
बाहर की नहीं मन की सफाई सबसे बड़ी है, अतः मन को साफ करने का नाम शौच धर्म है।
मन
शरीर को सजाने का प्रयत्न तो मल भरे मटके को फूलों से सजाने का प्रयत्न जैसा है।
अनासक्ति
लोगों को समझाते हैं, धन नश्वर है, पर खुद के लिये धन ही ईश्वर है।
धन
लोभ की तासीर आशाओं के बढ़ाने की होती है।
संतोष
मन आकाङ्क्षाओं में जीता है, तन आवश्यकताओं में जीता है।
मन
ये शरीर कितना अपवित्र है, कितना भी 'नहाओ, इत्र लगाओ' कुछ घण्टों में ज्यों का त्यों मैला और बदबूदार हो जाता है, लोग फिर भी शरीर से राग करते हैं।
अनासक्ति
मनुष्य जन्म बड़ी दुर्लभता से मिलता है और लोग सुलभता से नष्ट कर देते हैं।
धर्म
यश की इच्छा से दान या खाने–खिलाने वालों को लोग निर्लोभी समझ लेते हैं पर यश, रूप, नाम, काम की इच्छा भी लोभ है।
अनासक्ति
लोभी को मक्खी चूसने में ग्लानि नहीं और रक्त बहाने में दया नहीं आती है।
धन
पैसों की कीमत गाय के सामने घास के बराबर भी नहीं है, पर मनुष्य पैसों के लिए लड़ता–मरता है क्योंकि उससे यश रूप तथा पाँच इन्द्रियों के विषय मिलते हैं।
धन
नाम के लोभी कहते हैं एक दिन मरना है, कुछ करके जाओ तो नाम अमर रहेगा, आत्मा को विनाशीक और नाम को अमर समझता है, जबकि एक नाम के अनेक लोग होते हैं।
अनासक्ति
पूत सपूत तो का धन सञ्चय, क्षण में लाख कमा लेगा। पूत कपूत तो का धन सञ्चय, क्षण में लाख गँवा देगा।।
परिवार
काया तो बूढ़ी भई, तृष्णा भयी जवान। ऐसे में कैसे बने, निज आतम कल्याण।।
संतोष
कनक–कनक तै सौ गुनी, मादकता अधिकाय। यही खाए बोरात नर, वही पाय बोराय।।
धन
लोभ पाप का बाप है, क्रोध क्रूर यमराज। माया विष की वेलरी, मान विषम गिरिराज।।
चरित्र
तीन थान सन्तोष कर, धन भोजन अरु दार। तीन तोष न कीजिये, दान पठन तपाचार।।
संतोष
प्रभु जी इतना दीजिये, जामे कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।।
संतोष
कर्म कमण्डलु कर गहे, ज्ञानी मन पछताय। वापी–कूप-तड़ाग में, बूँद न अधिक समाय।।
कर्म
आतम को हित है सुख, सो सुख आकुलता विन कहिये। विषयभोग धन बिन नहीं याते, धन ही धन उपजइये।।
संतोष
जिसके श्रृङ्गारों में मेरा यह महँगा जीवन घुल जाता। अत्यन्त अशुचि जड़ काया से इस चेतन का कैसा नाता।।
अनासक्ति
केशर चन्दन पुष्प सुगन्धित वस्तु देख सारी। देह परसतें होए अपावन निश दिन मल जारी।।
अनासक्ति
धर हिरदय सन्तोष करहु तपस्या देह सो। शौच सदा निर्दोष, धरम बड़ो संसार में।।
संतोष
जब अपना मन पवित्र होता है, हर चेहरे पर अपना चित्र होता है। फिर दुनिया में कहीं भी चले जाओ, जो भी मिलता है अपना मित्र होता है।।
मन
गोधन गजधन बाजधन, और रतन धन–धान। जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूलि समान।।
संतोष
चाह गयी चिन्ता गयी, मनुआ बेपरवाह। जिन्हें कछु नहीं चाहिये, वे शाहन के शाह।।
संतोष
छोटी सी जिन्दगी बड़े–बड़े अरमान। पूरे न हो पायेंगे निकल जायेगें प्राण।।
संतोष
अगनि, चोर, भूपति, विपति, डरत रहै धनवान। निर्धन नींद निशङ्क ले, माने का की हानि।।
धन
दिन कब बीते हैं, सिर्फ हम बीत जाते हैं। घड़े फूटे भरे हों तो, खुदरीत जाते हैं।।
समय
जो अपनी जिन्दगी को, अपनी मीत बना लेते हैं। वे जन्म को तो छोड़िये, मौत को भी जीत बना लेते हैं।।
समाधि
धन की आशा से मलिन चित्त जीव जो कर्म बांधता है, उसकी शान्ति करोड़ों जन्म की तपस्या से होती है।
कर्म
प्रत्येक प्राणी के हृदय में तृष्णा रूपी गड्ढा इतना बड़ा है, कि तीन लोक की सम्पत्ति एक प्राणी के गड्ढे में डाल दी जाए तो वह परमाणु के बराबर दिखेगी तब किसको क्या और कितना मिलेगा अतः विषयों की आशा व्यर्थ है।
संतोष
परिभोग, उपभोग, जीवन और इन्द्रिय विषय इन चार प्रकार के लोभ के त्याग से शौच धर्म होता है।
धर्म
महाभारत के उपरान्त, पाण्डवों ने स्नान करके शुद्ध होने की भावना व्यक्त की, तब श्री कृष्णजी उपदेश देते हैं, कि आत्मा नदी हो, संयम का जल हो, सत्य का प्रवाह हो, ब्रह्मचर्य का तट हों, दया की लहरें हों, ऐसी नदी में हे पाण्डु पुत्रों! अवगाहन करो तो अन्तर आत्मा शुद्ध होगी, जल के स्नान से आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती है।
संयम
विना भाग्य के मत दौड़ो, मत दौड़ो, दौड़ना लक्ष्मी प्राप्ति का साधन नहीं है, यदि दौड़ने से लक्ष्मी मिलती तो फिर दौड़ने वाले कुत्ते को भी लक्ष्मी मिलना चाहिए।
संतोष
पक्के रङ्ग की तरह जिसका लोभ होता है वह नरक गति में जाता है, रथ के चक्र के मल की तरह जिसका लोभ होता है वह पशुगति में जाता है, शरीर के मेल की तरह जिसका लोभ होता है वह मनुष्य गति में जाता है और हल्दी के रङ्ग की तरह जिसका लोभ होता है वह देवगति में उत्पन्न होता है।
कर्म
कर्ज, घाव, अग्नि और कषाय इनको कभी थोड़ा नहीं समझना चाहिए क्योंकि ये बढ़ते–बढ़ते बहुत हो जाते हैं।
विवेक