Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 190

निर्मंदी कहानी।

29 सूत्र

शब्द ज्ञान टण्की के पानी एवं आत्म ज्ञान कुंए के जल के स्रोत के समान है, जिसका अन्त नहीं होता है।
ज्ञान
ज्ञान, दर्शन, चारित्र और उपचार के भेद से विनय के चार भेद हैं।
विनम्रता
जहाँ नम्रता से कार्य निकल आये, वहाँ उग्रता नहीं दिखानी चाहिए।
विनम्रता
अहङ्कार का अर्थ- योग्यता से अधिक प्रशंसा चाहना है। अभिमान का अर्थ- योग्यता के अभाव में प्रशंसा चाहना है। स्वाभिमान का अर्थ- जितनी योग्यता उतनी प्रशंसा चाहना है। निरभिमान का अर्थ- अपमान होने पर भी विकल्प नहीं करना है।
विनम्रता
भाव विशुद्ध हुये विना कैसा त्याग विराग। मान करो मत त्याग का, करो मान का त्याग।
विनम्रता
समझाने में है नहीं, है समझे में सार। समझाने वाले कई, पड़े बीच मझधार।।
ज्ञान
नानक नन्हे बने रहो, जैसे नन्ही दूब। बड़े झाड़ कट जात हैं, बनी रहत है दूब।।
विनम्रता
कञ्चन तजना सहज है, सहज त्रिया का नेह। मान बढ़ाई ईर्ष्या दुर्लभ तजनी जेह।।
अनासक्ति
जो रहा किसी दिन बादशाह वह पथ का आज भिखारी है, जो रोटी को मुँहताज रहा वह बना राज दरबारी है। जिनकी पैदाइश की खुशियाँ प्रातः आकाश गुञ्जाती थीं, कुछ देर बाद देखा मैंने वे हा हा कार मचाती थीं।।
समय
लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूर, चींटीं ले शक्कर चले हाथी के शिर धूर। लघुता से प्रभूता मिले, प्रभूता से प्रभु दूर, जो प्रभु होना चाहते, लघुता धार जरूर।।
विनम्रता
जो आज एक अनाथ है, नरनाथ कल होता वही। जो आज उत्सव मग्न है, कल शोक कर रोता वही।
समय
मत रूप निहारो दर्पण में दर्पण गंदला हो जायेगा। निज रूप निहारो अन्तर में, अन्तर उजला हो जायेगा।।
ध्यान
जो मानता स्वयं को सबसे बड़ा है। वह धर्म से बहुत दूर अभी खड़ा है।।
विनम्रता
इक लख पूत सवा लख नाती। ता रावण घर दिया न बाति।।
अनासक्ति
अप्रसिद्धि में बड़ा ही आराम है, अपनी ही सुबह अपनी ही शाम है। प्रसिद्धि में मिलता नहीं आराम है, होती कहीं सुबह और होती कहीं शाम है।।
संतोष
जब तलक दम था, झुके न आसमाँ से हम। जब दम निकल गया, तो जमीं ने दबा दिया।
विनम्रता
कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। समय पाय तरुवर फलें, केतेक सींचों नीर।।
समय
आदमी की जात की बस यही औकात है। चार दिना की चाँदनी फिर अन्धेरी रात है।।
समय
पत्थर अहम् का क्या करें गलता नहीं है, सब दिये जलते मगर दिल का दिया जलता नहीं है। खोजते-खोजते ढ़ल जाती है जीवन की शाम, सबका पता मिलता मगर खुद का पता मिलता नहीं है।।
विनम्रता
दुर्जन की विद्या विवाद के लिए होती है, सज्जन की विद्या अज्ञान दूर करने के लिए होती है, दुर्जन का धन अहङ्कार के लिए होता है, सज्जन का धन दान के लिए होता है, दुर्जन की शक्ति दूसरों को परेशान करने के लिए होती है, सज्जन की शक्ति जीवों की रक्षा के लिए होती है।
चरित्र
विद्या विनय को देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म होता है और धर्म से सुख होता है।
ज्ञान
जो गुरू का भक्त हो, संसार से भयभीत हो, विनम्र हो, धार्मिक हो, अच्छी बुद्धि वाला हो, शान्त मन वाला हो, आलस्य रहित हो और सभ्य हो वह शिष्य माना जाता है।
विनम्रता
'ज्ञान' मद और दर्प (अक्खड़पन) को हरने वाला है और जो ज्ञान का ही मद करता है, उसके लिए कल्याण का दूसरा साधन और क्या हो सकता है? क्योंकि अमृत ही जब विष हो जाए तब चिकित्सा किससे हो सकती है?
ज्ञान
जब मैं थोड़ा जानकार हुआ तो हाथी की तरह मद से अन्धा हो गया और अपने आप को सर्वज्ञ समझने लगा, किन्तु जब मैंने ज्ञानी जनों की थोड़ी-थोड़ी सङ्गति की तो लगा कि मैं मूर्ख हूँ और तब मेरा अहङ्कार रूपी ज्वर शीघ्र ही उतर गया।
विनम्रता
हे भगवन्! आपके लिए दुराये जाने वाले चामर झुककर ऊपर जाते हुये मानो ऐसा कहते है, की जो भगवान् को नमस्कार करता है, उसकी चामरों की तरह ऊर्ध्व गति होती है।
भक्ति
धर्म का सार सुनो और जीवन में उतारो, जो व्यवहार आपके लिए अच्छा नहीं लगता वैसा व्यवहार दूसरों के साथ भी कभी मत करो।
अहिंसा
ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप और शरीर को माध्यम बनाकर अहङ्कार करने को जिनेन्द्र भगवान मद कहते हैं।
विनम्रता
फलवान वृक्ष नम्र होते हैं, गुणवान मनुष्य नम्र होते हैं, सूखे वृक्ष और मूर्ख कभी नहीं झुकते हैं।
विनम्रता
महापुरुष विनम्र एवं दयालु होते हैं इसीलिए पार्श्वनाथ भगवान् ने दयार्द्र होकर नाग नागिनी को महामन्त्र सुनाया था।
अहिंसा