Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 101

देव ने सेठ से पूजा का आग्रह।

30 सूत्र

सम्यक्त्व रत्न के बदले जो विषय सुख की आकाङ्क्षा करता है, वह मनुष्य उस विषयी मनुष्य के तुल्य है जो किसी दासी के साथ सम्भोग करने के बदले में चिन्तामणि रत्न देता है।
विवेक
विशुद्धि- व्रतों के पालन करने से सम्यग्दर्शन की विशुद्धि में वृद्धि होती है।
धर्म
दर्शन विशुद्धि- प्रारम्भ के चार अङ्ग निःशङ्कित, निःकाङ्क्षित निर्विचिकित्सा और अमूढ़दृष्टि वीतरागता प्रकट करते हैं एवं अन्त के चार अङ्ग उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना सम्यग्दर्शन की विशुद्धि को बढ़ाने वाले हैं।
विवेक
अनुपगूहन- निन्दा का भाव वात्सल्य और स्थितिकरण के अभाव में होता है।
विवेक
हार्ट फ़ैल होना उतना हानिकारक नही जितना कि श्रद्धा का फ़ैल हो जाना हानिकारक है।
विवेक
सिंह को अपने शत्रु की पहचान होती है, कुत्ते को नहीं, इसी प्रकार सम्यग्दृष्टि को अपने वास्तविक शत्रु मिथ्यात्व की पहचान होती है मिथ्यादृष्टि को नहीं।
विवेक
व्यन्तर ने सेठ से अपनी पूजा का आग्रह किया, सेठ ने मना कर दिया, उसने कहा हम तुम्हारे लड़के को मार डालेंगे, सेठ ने कहा आयु पूर्ण हुए बिना कोई नहीं मरता, दुर्भाग्य से लड़का मर गया, व्यन्तर ने कुछ दिन बाद फिर कहा हमारी पूजा करो नहीं तो दूसरे लड़के को ले जायेंगे, सेठ ने कहा- हमको ले चलो हम तुम्हारी पूजा नहीं कर रहे हैं, लड़के ने क्या बिगाड़ा है, देव ने क्षमा माँगी, कोई किसी का कुछ नहीं कर सकता, अतः हमें भय और लोभ से भी व्यन्तरादि की पूजा नहीं करना चाहिए।
विवेक
तीन मूढ़ताओं से रहित आठ अङ्गों से सहित सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन कहलाता है।
विवेक
दर्शन मोह की 3 और अनंतानुबंधी की 4 इन सात प्रकृतियों के उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम से क्रमशः औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होते हैं।
कर्म
सम्यग्दर्शन से दुर्गति का नाश होता है, निर्दोष ज्ञान से कीर्ति की प्राप्ति होती है, चारित्र से लोक में पूजा होती है परन्तु मोक्ष तीनों की एकता से ही प्राप्त होता है।
विवेक
सम्यग्दृष्टि को सभी कर्मों का अन्तःकोड़ा-कोड़ी सागर से ज्यादा स्थिति बन्ध नहीं होता है।
कर्म
मिथ्यात्व से यदि दुर्गति हुई तो निगोदादि में दीर्घकाल तक भ्रमण करना पड़ता है, यदि सुगति हुई तो देवगति में किल्विष या आभियोग्य जाति का देव हो दुःख उठाना पड़ता है, इन्द्रियों की इच्छानुकूल प्रवृत्ति करना मिथ्यात्व का लक्षण है।
कर्म
ज्ञानीजनों ने समस्त पापों को सरसों के समान और मिथ्यात्व को मेरु के समान उपमा दी है।
विवेक
जिस प्रकार राम को सीता का पता लगते ही प्राप्त करने की अत्यधिक छटपटी हुयी, उसी प्रकार अपनी आत्मा की खबर लगते ही सम्यग्दृष्टि को आत्मा की प्राप्ति की छटपटी होना चाहिए, जिसे छटपटी नहीं है वह सम्यग्दृष्टि नहीं है।
विवेक
विपत्ति में धैर्य रखने से, प्रारब्ध कार्य के पूर्ण करने आदि से तथा प्रशंसनीय प्रशम आदि गुणों से प्राणियों के आत्मरूप सम्यग्दर्शन का भी निर्णय किया जाता है।
विवेक
सम्यग्दर्शन के एक-एक अङ्ग को प्राप्त कर भव्य जीव मोक्ष को प्राप्त हुए हैं, फिर जो समस्त अङ्गों से सहित हैं वे क्या मुक्त नहीं होंगे, अर्थात् अवश्य होंगे।
विवेक
सम्यग्दर्शन रूपी रत्न का यह महान् गुण है कि दूसरे के द्वारा किये हुए दोष को भी प्रयत्न पूर्वक छिपाया जाता है।
विवेक
मनुष्य सम्यक्त्व के माहात्म्य से तीर्थंङ्कर तथा चक्रवर्ती आदि की विभूति को पाकर अन्त में मोक्ष रूप परमपद को प्राप्त होता है।
विवेक
सम्यग्दर्शन वास्तव में सूक्ष्म है, वह केवलज्ञान अथवा अवधि और मनःपर्ययज्ञान का विषय है, न कि मति-श्रुत ज्ञान का विषय है और न देशावधिज्ञान का इन ज्ञानों से उसकी उपलब्धि नहीं होती है।
ज्ञान
आठवें गुणस्थान तक सब कर्मों की स्थिति अन्तः कोड़ा-कोड़ी सागर पड़ती है, इसके आगे कम होती जाती है। क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि जीव केवली के पादमूल में तीन करण पूर्वक मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व को सम्यक् प्रकृति में संक्रमित करके सम्यक् प्रकृति की क्षपणा करता हुआ जब सम्यक् प्रकृति की स्थिति अन्तर्मुहूर्त मात्र रह जाती है उसको कृतकृत्य वेदक कहते हैं।
कर्म
आठ अङ्गों से सहित सम्यत्व दृढ़ होता है अन्यथा सम्यक्त्व की हानि होती है।
विवेक
सम्यक्त्व से रहित ध्यान दुःख का ही खजाना है, तप का फल सन्ताप मात्र है, स्वाध्याय भी बन्धन है, अज्ञानी जनों के इन्द्रिय निग्रह भी अच्छा फल देने वाले नहीं हैं, अनुपम दान, ब्रह्मचर्य निश्चय से श्री को देने वाले नहीं हैं, तथा तीर्थादि की यात्रा भी पूर्ण फल नहीं देती है, सभी कार्य अन्तर्गड़ु अर्थात् भीतर से सारहीन होते हैं अतः सम्यक्त्व प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना चाहिए।
विवेक
प्रथमानुयोग से प्रशम, करणानुयोग से संवेग, चरणानुयोग से अनुकम्पा, द्रव्यानुयोग से आस्तिक्य गुण प्रकट होता है, अर्थात् चारों अनुयोगों के अध्ययन से ये चार गुण प्रकट होते हैं।
ज्ञान
संवेग, निर्वेग, निन्दा, गर्हा, उपशम, भक्ति, वात्सल्य, अनुकम्पा ये सम्यग्दर्शन के आठ गुण हैं।
विवेक
करूणा, वात्सल्य, सज्जनता, आत्मनिन्दा, समता, भक्ति, वैराग्य, धर्मानुराग ये भी सम्यग्दर्शन के आठगुण माने गये हैं।
विवेक
धर्म में, धर्म के फल में, शास्त्र में, परिग्रह रहित साधु में जो अत्यधिक अनुराग है वह संवेग कहलाता है।
विवेक
मनोहर मित्र, स्त्री आदि सभी संयोगज सम्बन्ध हैं, एक रत्नत्रय ही पवित्र है, ऐसा मानना निर्वेद कहलाता है।
अनासक्ति
कषाय से आकुलित होकर सज्जनों के द्वारा निन्दनीय कार्य हो जाने पर अन्त में जो पश्चाताप किया जाता है, वह पापों को नाश करने वाली निन्दा कहलाती है।
क्षमा
राग-द्वेष के कारण घोर दुष्कृत हो जाने पर गुरु के आगे दोषों को कहना आलोचना कहलाती है इसप्रकार आलोचना एवं प्रतिक्रमण आत्मशोधन की डायरी कहलाती है।
विवेक
महान् दुर्निवार कलुषता के कारण उपस्थित हो जाने पर भी अन्तरङ्ग में क्षोभ नहीं होना उपशम कहलाता है।
क्षमा