Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 53

कार्बन पेपर बनो, रेत पेपर नहीं

117 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

जो सुख की चाह न कर कार्य को चाहता है; वह मित्रों का ऐसा आधार स्तम्भ है, जो मित्रों के दु:ख के आँसुओं को पोंछेगा।
पुरुषार्थ
आपत्तियों को जो 'आपत्ति' नहीं समझते, वे आपत्तियों को ही आपत्ति में डालकर वापस भेज देते हैं।
पुरुषार्थ
जब आपने अपनी सारी बुद्धिमत्ता से एक काम करने की ठान ली है, तो डगमगाना नहीं चाहिए, बल्कि लक्ष्य को शक्ति से प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
पुरुषार्थ
ऐसे कार्यों के करने में जुट जाओ, जो अन्त में प्रसन्नता बढ़ाते है, चाहे तुम्हें ऐसा करने में अनेक कठोर दु:खों की पीड़ा उठानी पढ़े, अपने हृदय को कड़ा करो और अन्त तक दृढ़ रहो।
पुरुषार्थ
किसी निश्चय पर पहुँचना यही विचार का उद्देश्य है और जब किसी बात का निश्चय हो गया है, तब उसको कार्य रूप में परिणत करने में विलम्ब करना भूल है।
पुरुषार्थ
यदि परिस्थिति अनुकूल हो तो सीधे अपने लक्ष्य की ओर चलो किन्तु जब परिस्थिति अनुकूल न हो तो उस मार्ग से चलो जिसमें सबसे कम बाधाएँ आने की सम्भावना हो।
विवेक
किसी भी काम में सफलता प्राप्त करने का यही मार्ग है कि जो मनुष्य उस काम में दक्ष है, उससे उस काम का रहस्य मालूम कर लेना चाहिए।
पुरुषार्थ
श्रम से भरा हुआ पुरुषार्थ और कार्य कुशल सद्बुद्धि, इन दोनों की परिपक्वता ही परिवार को ऊँचा उठाती है।
परिवार
पुरुष का सच्चा पुरुषत्व तो इसी में है कि जिसमें उसने जन्म लिया है उस वंश को धन में, बल में, ज्ञान में ऊँचा बना दे।
चरित्र
किसी भी दिल में आग नहीं बाग लगाओ जिससे उसकी खुशबू आपको भी मिल सके।
संगति
अपना जीवन उस फूल के समान बनाओ जो अपने मसलने वाले हाथों को भी सुगंधी से भर देता है।
चरित्र
दु:ख में साथ देने वाला भगवान् होता है, सुख में साथ देने वाला इंसान, लेकिन आप क्या हैं?
भक्ति
अमीर वह नहीं जिसके पास विपुल सम्पत्ति है, बल्कि अमीर वह है जिसके पास बूढ़े माँ बाप के लिए समय है।
परिवार
माना कि आपके पास वो आँखें नहीं है, जो आकाश में बैठे भगवान् को पहचान सकें, पर आपके पास वो आँखें तो हैं, जो पड़ोस में बैठे इंसान को पहचान सकें क्योंकि जो पड़ोस में बैठे इंसान को पहचान लेता है वो भगवान् को पहचान लेता है और फिर आज का इंसान ही भविष्य का भगवान् होता है।
संगति
स्वार्थ की कीचड़ गंदगी फैलाती है और निःस्वार्थ की गंगा गंदगी को मिटाती है।
दान
शिक्षा का फल दीक्षा है। विद्या का फल विनय है। स्वाध्याय का फल सन्त सेवा है।
ज्ञान
पौष्टिकता के बिना भोजन व्यर्थ है, सुपात्र के बिना दिया गया दान व्यर्थ है, पुत्र की सच्ची शिक्षा के बिना मातृत्व व्यर्थ है उसी प्रकार परोपकार में खर्च किए बिना अपार धन सम्पत्ति व्यर्थ है।
दान
जब हम नेकी करके उसका एहसान जताने लगते हैं, तो वहीं जिसके साथ हमने नेकी की थी वह हमारा शत्रु हो जाता है और अगर वही नेकी करने वालों के दिल में रहे तो नेकी है, बाहर निकल आए तो बदी है।
दान
अपने साथ उपकार करने वालों के साथ जो साधुता बरतता है उसकी कोई तारीफ नहीं है। महात्मा तो वह है, जो अपने साथ बुराई करने वालों के साथ भी भलाई करे।
क्षमा
दूध का सार मलाई है और जीवन का सार भलाई है।
चरित्र
सच है, धनवान मरता है तो सिर्फ घर वाले रोते हैं मगर इंसान जब मरता है तो दुनिया वाले रोते हैं।
चरित्र
सज्जन पुरुष बिना कहे दूसरों की आशा पूर्ण कर देते हैं, जैसे सूर्य स्वयं ही घर–घर प्रकाश फैला देता है।
दान
अपने सुख के लिए उद्योग करना दु:ख को निमन्त्रण देना है और दूसरों के सुख के लिए उद्योग करना आनन्द को निमन्त्रण देना है।
दान
ज्यों–ज्यों परोपकार के लिए रुपयों की थैली खाली होती है, त्यों–त्यों हमारा हृदय पुण्य से भरता जाता है।
दान
जो नित्य गुरुजनों को प्रणाम करता है और वृद्ध पुरुषों की सेवा में लगा रहता है, उसकी कीर्ति, आयु, यश और बल चारों बढ़ते हैं।
विनम्रता
यदि मनुष्य परोपकारी नहीं है तो उसमें और दीवार पर लगे चित्र में क्या फर्क है।
दान
परस्पर उपकार करते हुए जीना ही वास्तविक जीना है।
दान
आप रक्तदान भले ही न कर पायें पर आप से किसी का रक्त शोषण न हो यह जरूर सोचिए।
अहिंसा
सबसे उत्तम दानी वे हैं, जो अपने संपर्क में आए हुए व्यक्तियों को इस योग्य बना दें कि उन्हें जीवन में कभी दान–दक्षिणा लेने की आवश्यकता न पड़े।
दान
जब आप किसी को भौतिक पदार्थ देने में असमर्थ हों तो भी अपनी सद्भावनाएँ और शुभकामनाएँ दूसरों को देते रहिए।
दान
अपने लिए सुख चाहने से नाशवान् सुख मिलता है और दूसरों को सुख पहुँचाने से अविनाशी सुख मिलता है।
दान
अपनी पीड़ा तो पशु–पक्षी भी अनुभव करते हैं, मनुष्य तो वही है जो दूसरों की वेदना को महसूस करें।
दान
नेचरोपैथी, एलोपैथी और होम्योपैथी जहाँ काम नहीं करती वहाँ सिम्पैथी काम करती है।
दान
कार्बन पेपर बनो कि अपनी छाप दूसरों पर छोड़ दो।
चरित्र
बड़ों से आगे बढ़ने की प्रेरणा लेना चाहिए क्योंकि महापुरुष पैर पूजने के लिए ही नहीं प्रेरणा लेने के लिए भी होते हैं।
विनम्रता
भलाई जितनी अधिक की जाती है उतनी ही अधिक फैलती है।
दान
नेकी का उपहार नेकी है। दूसरों का भला करने से अपना ही भला होता है।
दान
विषयों की उम्र होती है कषायों की उम्र नहीं होती है अर्थात् विषय थोड़ी देर भोगे जाते, कषाय लम्बे समय तक माँगती रहती।
अनासक्ति
संसार में सबसे बड़ा अधिकार सेवा और त्याग से प्राप्त होता है।
दान
दु:ख में आँसू बहाकर मन हल्का करना अच्छा है, लेकिन दूसरों के आँसू पोंछकर उन्हें हल्का करना बहुत अच्छा है।
दान
संसार में सबसे कठिन कार्य व्यक्ति में आत्मविश्वास के भावों को जागृत करना है। भोजन करते समय भूखे प्राणी को न भूलना भव्य जीव की पहचान है।
दान
दो प्रकार के इंसान होते हैं, एक वह जो साधु की दृष्टि से गिर जाते हैं, दूसरे वह जो साधु की दृष्टि में छा जाते हैं।
संगति
उपकार करने वाले के सभी अपराध माफ कर दिये जाते हैं।
दान
दूसरों को सुख पहुँचाने और भलाई करने से ही पुण्य का सृजन होता है इसीलिए परोपकार ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।
दान
यदि मनुष्य निरंतर सुखी रहना चाहता है तो उसे परोपकार के लिए जीवित रहना चाहिए।
दान
उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता है।
दान
उपकार करने वाले में स्वार्थ की भावना नहीं होनी चाहिए।
दान
सन्त सुख का मोक्षमार्ग का उपदेश ही नहीं देते हैं, उपाय भी बताते हैं।
धर्म
उपदेश देना सरल है लेकिन उपाय बताना कठिन है।
ज्ञान
हमें तख्त पर ही नहीं वक्त पर भी एक होना चाहिए।
संगति
जीवन में वे कार्य अवश्य कीजिए जिन्हें आप मृत्यु के बाद भी याद रखवाना चाहते हैं।
चरित्र
क्रांति तो युगों के बाद आती है और वह मनुष्य को सजग कराने सुधारने के लिए आती है।
विविध
गरीब लोग प्रेम और सहानुभूति के भूखे होते हैं।
दान
सुन्दरता व गुणों की ओर सभी आकर्षित होते हैं, पर कुरूप व अयोग्य को अपनाना दुर्लभ गुण है। दुर्गुणों को सद्गुण की सेवा में लगा दें तो सारे दुर्गुण सद्गुण हो जाएँगे।
चरित्र
जीते जी आप जिनके न हो पाये तो कम से कम मरते वक्त तो उनके हो जाइये।
भक्ति
दवा से तन स्वस्थ होता है किन्तु दुआ से मन स्वस्थ होता है।
भक्ति
दवा के लिए धन चाहिए, जबकि दुआ के लिए सच्चा सहज सरल मन चाहिए।
भक्ति
सच्ची नम्रता हमसे तमाम जीवों की सेवा के लिए, सब कुछ न्यौछावर करने की आशा रखती हैं।
विनम्रता
वह निन्द्य बन्धु है जो आपत्तिकाल में अपने भाई की सहायता नहीं करता है।
संगति
अपने कुटुम्ब के लोग गुण हीन हों तो भी उनकी रक्षा करनी चाहिए फिर जो आपके कृपाभिलाषी एवं गुणवान हैं उनकी तो बात ही क्या है?
परिवार