Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 53

कार्बन पेपर बनो, रेत पेपर नहीं

117 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता एक पूरे जीवन काल के परिश्रम के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है, इससे कम मूल्य पर उत्कृष्टता को नहीं खरीदा जा सकता है।
पुरुषार्थ
सुधार की दृष्टि से गुरु के पास किसी की भी शिकायत करना चुगली नहीं परोपकार है।
विवेक
जिनके हृदय में सदैव परोपकार की भावना होती है, उनकी आपदाएँ समाप्त हो जाती हैं और पग–पग पर धन की प्राप्ति होती है।
दान
उदारता में चुम्बक जैसा आकर्षण होता है।
दान
यदि किसी के बीच में खुशबू बनकर नहीं महक सकते तो काँटे भी मत बनो।
संगति
परोपकार न कर सको तो कोई बात नहीं, पर किसी का अपकार हरगिज न सोचो, न करो।
अहिंसा
जब कोई दूसरों की जिंदगी को खुशहाल बनाता है, तब उसकी जिंदगी अपने आप खुशहाल बन जाती है।
दान
पेट तो एक है और हाथ दो, यदि आप चाहें तो दोनों हाथों का उपयोग करके अपने साथ दूसरों का भी पेट भर सकते हैं।
दान
सच्चा प्रेम स्तुति से प्रकट नहीं होता सेवा से प्रकट होता है।
दान
जिस प्रकार श्रम शरीर को शक्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार कठिनाइयाँ मनुष्य को शक्ति–सम्पन्न बनाती है।
पुरुषार्थ
जो मेरे साथ भलाई करता है वह मुझे भला होना सिखा देता है।
दान
अपनी भलाई चाहते हो तो दूसरों का भी भला करो।
दान
कुलीन सत्पुरुष किसी का उपकार करके उसका दिग्दर्शन न करते हुए मौन रहते हैं।
दान
राष्ट्र को आतंकवाद की नहीं अहिंसावाद व संत आशीर्वाद की आवश्यकता है।
अहिंसा
जब मनुष्य पर विपत्ति आवे तब उसे अत्यधिक उपदेश के स्थान पर सहानुभूति और सहायता की आवश्यकता होती है।
दान
आप भविष्य में भी गरीबों का ख्याल रखते रहें भगवान् आपका ख्याल रखेगा।
दान
महान् पुरुष जो उपकार करते हैं उसका बदला नहीं चाहते हैं।
दान
जो बलवान होकर निर्बलों की रक्षा करता है, वही सच्चा मानव कहलाता है।
चरित्र
दुष्ट लोग शारीरिक बल का उपयोग दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए करते हैं और सज्जन लोग हानि व कष्ट से बचाने के लिए करते हैं।
चरित्र
प्रतिभाशाली तथा पावन हृदय वाले व्यक्ति जिन विचारों को संसार में फैलाते हैं, उनसे संसार में परिवर्तन आता है।
ज्ञान
संस्कृति का संवर्द्धन देश को समृद्धशाली बनाता है।
विविध
सहयोग के बिना समाज की शृंखला टूट जाती है।
संगति
सज्जन पुरुष की सम्पत्ति दूसरों के कल्याणार्थ होती है।
दान
सहयोग से कठिन से कठिन कार्य आसानी से सम्पन्न हो जाता है।
संगति
सहयोगी व्यक्ति का कभी कोई शत्रु नहीं बनता है।
संगति
सहयोग मित्रता की ओर बढ़ाया हाथ है जो हमेशा साथ देता है।
संगति
सहमति से ज्यादा सहयोग से एक–दूसरे के दिल में आत्मीयता का संचार होता है।
संगति
सहयोग का परस्पर आदान व प्रदान प्रगति के लिए दोनों अपेक्षित होते हैं, जो औरों की प्रगति में सहयोगी बनना जानता है, वह औरों को भी अपनी प्रगति में सहयोगी बनाना जानता है।
संगति
आप बेसहारों का सहारा बनिये आपको सहारा अपने आप मिल जाएगा।
दान
आप राजमार्ग न बन सकें तो पगडंडी ही बनिए। सूरज न बन सकें तो तारा ही बनिए। ज्यादा सहयोग न कर सकें तो कुछ ही करें।
दान
इस दुनिया में किसी दु:खी व्यक्ति के लिए थोड़ी–सी भी सहायता ढेरों उपदेशों से कहीं अधिक अच्छी हैं।
दान
साधक की साधना में सहायक होना ही सच्ची वैय्यावृत्ति है।
दान
रात–दिन भगवान् के भजन–ध्यान में तल्लीन रहने वाले व्यक्ति से संसार का जो हित होता है, वह रात–दिन कर्म करने वालों से नहीं होता है।
भक्ति
सेवा करने वाले के हाथ स्तुति करने वाले के मुँह से अधिक पवित्र होते हैं।
दान
सेवा हृदय और आत्मा को पवित्र करती है। सेवा से अनुभव प्राप्त होता है और यही जीवन का लक्ष्य है।
दान
सेवा तो मूक होनी चाहिए, जिसने अपनी सेवा का ढिंढोरा पीटा वह मानो अपने–आपको समाप्त कर चुका है।
दान
सेवा मानव–वृत्तियों में सबसे ऊँची और महान् वृत्ति है।
दान
सेवा से बढ़कर व्यक्ति को द्रवित करने वाली और कोई चीज संसार में नहीं हैं।
दान
संसार में ऐसी कौन सी दुर्लभ वस्तु है जो सेवा से प्राप्त न हो सके।
दान
जो स्त्री देश को तेजस्वी, नीरोग और सुशिक्षित सन्तान भेंट करती है, वह भी सेवा ही करती है।
दान
मानव, मानव के साथ केवल उपकार करके ही अपने को देवतुल्य बनाते हैं।
दान
निःस्वार्थ भाव से किया गया सत्कर्म निश्चितत: शुभ फलप्रदाता होता है।
कर्म
स्वाध्याय और सेवा दोनों के अवसर एक साथ आ जाएँ तो सेवा श्रेष्ठ है।
दान
अगर पुण्योदय से आपको सम्पत्ति मिले तो स्वयं की सेवा के लिए भले ही नौकर रख लेना किन्तु माँ, महात्मा और परमात्मा की सेवा के लिए नौकर न रखें। प्रभु की प्रार्थना और माँ–बाप की सेवा स्वयं करना चाहिए।
दान
विधवा, विकलांग और अनाथ सेवा के प्रथम अधिकारी हैं।
दान
दूसरों का अहित करने से अपना अहित और दूसरों का हित करने से अपना हित होता है।
दान
जैसे माँ का दूध उसके अपने लिए न होकर बच्चे के लिए ही है, ऐसे ही मनुष्य के पास जो भी सामग्री है, वह उसके अपने लिए न होकर दूसरों के लिए ही है।
दान
कभी सेवा का मौका मिल जाय तो आनन्द मनाना चाहिए कि भाग्य खुल गया।
दान
सेवा से शत्रु भी मित्र बन जाता है।
दान
बिना प्रदर्शन के जो सेवा करता है, वह शीघ्र ऊँचाई पर पहुँच जाता है।
दान
बंधुभाव से की हुई सेवा की अपेक्षा आत्मभाव से की हुई सेवा उत्तम है।
दान
सेवा के लिए पैसे की जरूरत नहीं होती, जरूरत है अपना संकुचित जीवन छोड़ने की, गरीबों से एकरूप होने की।
दान
केवल वही व्यक्ति सबकी अपेक्षा उत्तम रूप से कार्य करता है, जो पूर्णतया निःस्वार्थी है, जिसे न तो धन की लालसा है, न कीर्ति की और न किसी अन्य वस्तु की।
दान
वृद्ध, बच्चे, बीमार व कमजोर पशुओं की सेवा अपने बन्धुओं की तरह करनी चाहिए।
दान
तीव्र तप करता हुआ भी तथा शास्त्र रूपी समुद्र का अवगाहन करता हुआ भी यदि वृद्ध सेवा नहीं करता अर्थात् सत्पुरुषों की आज्ञा में नहीं रहता है तो उसका कदापि कल्याण नहीं हो सकता है।
विनम्रता
मैं हर काम आऊँ यह जरूरी नहीं, पर मैं हर किसी के काम आऊँ यह जरूर सोचता हूँ।
दान
जो अपने घर को ही आदर्श न बना सका वह समाज, देश, राष्ट्र को क्या आदर्श बना सकेगा?
परिवार