Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Truth

सत्य

198 सूत्र · पृष्ठ 3 / 3

भारतीय परम्परा में सत्य को नारायण कहते है, 'सच्चं खु भयवं' सत्य ही भगवान है।
सत्य
मन, वाणी और व्यवहार में सत्य को स्थापित करना ही सत्य नारायण कहा जाता है।
सत्य
सत्य भावना, सत्यवाणी, और सत्यव्यवहार की त्रिवेणी ही सत्याचरण है।
सत्य
सत्य धर्म शब्दों से नहीं कहा जाता, सत्य तो सागर से गहरा और आकाश से भी बड़ा है।
सत्य
सत्याणुव्रत- स्थूल झूठ का त्याग, सत्यमहाव्रत- स्थूल व सूक्ष्म दोनों झूठ का त्याग, भाषासमिति- हित–मित–प्रिय वचन जिसमें बोले जाते हैं उसे भाषा समिति कहते हैं, 'जग सुहित कर सब अहित हर श्रुति सुखद सब संशय हरें'।
सत्य
व्यक्ति के होते हुए भी मना करना यह प्रथम असत्य है, (जैसे देवदत्त के होते हुए भी मना करना कि यहाँ नहीं है।) वस्तु के नहीं होते हुए भी हाँ कहना दूसरा असत्य है, (जैसे घड़े के नहीं होते हुए भी हाँ कहना।) वस्तु का अन्यथा कथन करना ये तीसरा असत्य है, (जैसे घोड़े को गधा कहना।)
सत्य
पाँच प्रकार की परीक्षा– 1.अग्नि में प्रवेश करना, 2.तराजू पर तुलना, 3.काल कूट जहर खाना, 4.जल में डूबना, 5.गर्म लोहे का गोला हाथ में लेना, ये सत्यता की परीक्षा के लिए होती हैं।
सत्य
जैसे जल रहित नदी अशोभनीय लगती है, उसी तरह सत्य रहित व्यक्ति भी अशोभनीय लगता है।
सत्य
एक बार का असत्य अनेक बार के सत्य को झूठ कर देता है, फिर लोग विश्वास नहीं करते हैं।
सत्य
झूठ का दुराग्रह करने वालों को दीर्घकाल तक अपयश और दुर्गति ये दो चीजें सुलभ हैं।
सत्य
कर्तृत्व बुद्धि से कुटुम्ब आदि के कारण झूठ बोलता है, असत्य के दो कारण हैं कषाय और अज्ञान।
सत्य
असत्य के पैर नहीं होते हैं और अनीति की जड़ नहीं होती हैं।
सत्य
जो अज्ञानी मनुष्यगति में सत्य को छोड़ दे, वह बाद में कौन से कर्म से संसार सागर को पार करेगा?
सत्य
लोक में चाण्डाल, उल्लू, बिल्ली, भेड़िया, सियार और कुत्ता को तो लोग पसन्द करते हैं पर झूठ बोलने वाले को कोई पसन्द नहीं करता है।
सत्य
तराजू के एक पलड़े पर चार पापों को रखा जाये और दूसरे पलड़े पर असत्य पाप को रखा जाए तो आचार्य दोनों को बराबर कहते हैं।
सत्य
सत्य, अहिंसा, प्रेम का हमसे कितना नाता है। दीवालों पर लिख देते हैं, दीवाली पर पुत जाता है।।
सत्य
वर्ष में एक झूठ– एक सेठ को एक नौकर मिल गया जिसका वेतन था, भोजन, वस्त्र एवं एक वर्ष में एक झूठ बोलना। वर्ष पूर्ण होने पर वेतन की तिथि निश्चित कर दी गयी। सेठानी से नौकर ने कहा कि आप के सुन्दर और सुशील होने पर भी सेठ कहाँ जाते हैं पता नहीं? मैं दिन भर दुकान चलाता हूँ। सेठानी ने कहा क्यों करें तब नौकर ने कहा सेठ की एक मूँछ निकाल दो, इससे चेहरे की सुन्दरता समाप्त हो जायेगी, जब सेठ जी रात्रि में सो जायें, तब आप छुरी से मूँछ निकाल देना, उधर सेठ से कहा कि आप दिन भर दुकान में रहते हो, सेठानी दिन भर ताला डाल कर पता नहीं कहाँ जाती हैं, आज जब आप सो जाओगे तब वह आपका गला काटेगी, सावधान रहना, सेठ दुकान से आकर चुप चाप सोने का बहाना करने लगे, तभी सेठानी छुरा लेकर आयी, और जैसे ही मुख से वस्त्र हटाया तो सेठ ने उसके हाथ का छुरा छीन कर उसी को मारने तैयार हो गये, तब नौकर ने कहा हुजूर सुनिये, ऐसा मत करिये हमने अपना वेतन लिया है, यानि एक झूठ बोला है। 'जब एक झूठ से प्राणों पर खतरा आ सकता है तो अनेक बार झूठ बोलने पर क्या होगा'।
सत्य
वसु झूठ से ति नरक पहुँचा– राजा वसु, नारद ब्राह्मण और क्षीरकदम्ब ब्राह्मण का पुत्र पर्वत ये तीनों क्षीरकदम्ब ब्राह्मण के पास पढ़ते थे, एक दिन क्षीरकदम्ब अपने शिष्यों के साथ वन में गये, वहाँ चारण ऋद्धिधारी मुनिराज अपने शिष्यों के साथ विराजमान थे, क्षीरकदम्ब ने उनको नमस्कार किया, तब उन मुनिराज ने कहा की इनमें गुरु और एक शिष्य सद्बुद्धि हैं, और दो शिष्य कुबुद्धि हैं, ये शब्द सुनकर क्षीरकदम्ब संसार से डर गये, शिष्यों को वापस भेजा और स्वयं ने मुनि दीक्षा ले ली, ब्राह्मण की पत्नी को बहुत दुःख हुआ, उसने बहुत विलाप किया, नारद ने उसे समझाया, एक दिन नारद और पर्वत में चर्चा चल रही थी, नारद ने कहा कि मुनियों ने 'अजैर्यष्टव्यं' का अर्थ 'जिसमें अङ्कुर शक्ति नहीं है ऐसे शालिधान' हैं, उसी से यज्ञ, विवाह आदि क्रियाओं में होम करना चाहिए। यह कहा है, पर पर्वत ने कहा कि अज का अर्थ 'बकरा' होता है, उसने झूठ कहा कि पिताजी ने यही कहा था, दोनों में विवाद बढ़ गया, और वसु के पास न्याय करने के लिए कहा, क्योंकि वह भी क्षीरकदम्ब के पास पढ़ता था, राजा वसु के सिंहासन के पाये स्फटिक के थे, जिससे सब यही समझते थे, कि उसका सिंहासन सत्य के प्रभाव से आकाश में उठा हुआ है, पर्वत ने एक दिन पहले सारा वृत्तान्त अपनी माँ को सुनाया, माँ को पता था कि पर्वत झूठ बोल रहा है, फिर भी पुत्र मोह में आकर वह राजा के पास गयी, अपनी गुरुमाँ को आता देखकर राजा ने बहुत सम्मान से बैठाया, माँ ने आने का कारण बताया और झूठ को सत्य कहने के लिए कहा, राजा ने दक्षिणा के वचन को याद किया और हाँ कह दिया, दूसरे दिन सभा लगी तो राजा ने पर्वत को सत्य ठहराया, झूठ के प्रभाव से उसके सिंहासन के पाये टूट गये, नारद ने समझाया की राजन्! झूठ के प्रभाव से पाये टूट गये अब भी सच बोल दो, पर राजा ने पर्वत का ही पक्ष लिया, और सिंहासन के नीचे की पृथ्वी फट पड़ी और राजा झूठ के प्रभाव से मरकर 'सातवें नरक' चला गया।
सत्य
सत्यघोष का असत्य जगत प्रसिद्ध- सत्यघोष ने जनेऊ में एक चाकू बाँध रखा था और कहता था कि मैं जरा सा भी झूठ बोलूँगा तो अपनी जीभ काट लूँगा, वह किसी की धरोहर वापस देता था किसी की नहीं, कोई–कोई राजा के पास जाकर उसकी शिकायत भी करते थे, लेकिन सत्यघोष के प्रभाव के कारण राजा भी किसी की नहीं सुनता था, एक दिन दूसरे गाँव का समुद्रदत्त व्यापारी रत्नद्वीप में व्यापार करने के लिए गया, उसने सत्यघोष के पास पाँच रत्न जमा कर दिए, लौटते समय जहाज डूबने से सारा धन समुद्र में डूब गया, वह सत्यघोष के पास गया, और अपने पाँचों रत्न वापिस माँगे, तो सत्य घोष उसे पागल कहकर भगाने लगा, राजा के पास भी न्याय न मिलने से वह दिन–रात सबसे यही कहता फिरता था की 'सत्य घोष मेरे पाँच रत्न नहीं देता है' रानी ने यह सुना तो राजा से न्याय करने के लिये कहा, रानी ने सत्यघोष और समुद्रदत्त दोनों की परीक्षा ली, और न्याय किया, राजा ने सत्य घोष को तीन सजा बताई उनमें
सत्य
जिसका मन सत्य शीलता में निमग्न है वह तपस्वी से और दानी से भी श्रेष्ठ है।
सत्य
सत्य से व्यक्ति परेशान हो सकता हैं पर परास्त नहीं होता है।
सत्य
सूली पर चढ़ने के बाद भी सत्य सत्य ही रहता हैं, सिंहासन पर भी झूठ झूठ ही रहता है।
सत्य
एक व्यक्ति बोला कि मैं जुआ नहीं खेलता, शराब नहीं पीता, पाप नहीं करता, कषाय नहीं करता, मेरे में कोई अवगुण नहीं है, मात्र यही अवगुण है कि में सत्य नहीं बोलता, इस एक दुर्गुण ने ही उसके सारे गुणों को बर्बाद कर दिया, क्योंकि वह जो कुछ बोल रहा है सब झूठ है।
सत्य
मुनि तो सत्य बोलते ही हैं क्योंकि मुनियों के द्वारा समस्त विद्याएँ निर्मित हैं, किन्तु सत्य को धारण करने वाले म्लेच्छों को भी विद्याएँ सिद्ध हो जाती हैं।
सत्य
सत्य सब धर्मों में प्रधान है, संसार सागर से पार होने के लिए सत्य पुल के समान है।
सत्य
सत्य वचन बोलना ही जिनवाणी की पूजा है।
सत्य
सत्य बोलने से सुस्वर एवं वाणी सम्बन्धी गुण प्राप्त होते हैं।
सत्य
सत्यवादी में हजार हाथियों का बल होता है।
सत्य
स्याद्वाद में विवाद नहीं होता, विवाद दुराग्रह में है व सत्यवादी अधिक नहीं बोलता है।
सत्य
सत्य से वाणी शुद्ध होती है, ज्ञान से मन शुद्ध होता है, गुरु सेवा से शरीर शुद्ध होता है, ये शुद्धियाँ शाश्वत मानी गई हैं।
सत्य
जो लङ्गड़े–लूले, कुरूप, भाग्यहीन, रोगी और कुल–जाति आदि से हीन हैं उनका भी सत्य ही एक आभूषण है।
सत्य
सत्य के कारण पृथ्वी टिकी है, सूर्य तपता है, वायु बहती है सब कुछ सत्य पर ही प्रतिष्ठित है।
सत्य
सत्य वचन के होने पर ही शेष व्रत होते हैं और जगत्पूज्य जिनवाणी की आराधना होती है।
सत्य
धर्म एवं क्रिया का नाश होता हो, सम्यक् सिद्धान्त का अभाव होता हो तो उसके स्वरूप के प्रकाशन के लिए विना पूँछे भी बोलना चाहिए।
सत्य
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हृदय साँच है, ताके हृदय प्रभु आप।।
सत्य
सेठ की सत्यता- व्यापार हेतु एक सेठ जङ्गल से गुजर रहा था। डांकुओं ने उसे पकड़ लिया सब धन छीन लेने के बाद भी पाँचसौ स्वर्ण मुद्राओं को और माँगा, सेठ ने पत्र लिखा और कहा कि आप इस पत्र को ले जाओ हमारे बेटे से पाँच सौ स्वर्ण मुद्रायें ले आओ। एक व्यक्ति पत्र लेकर गया। उसके बेटे ने पाँचसौ स्वर्ण मुद्रायें दे दी। सभी डाकू प्रसन्न थे लेकिन सेठ उदासीन था, मेरे बेटे ने नकली मुद्रायें दे दी हैं, सेठ पुनः पत्र लिख कर देता है, और डाकुओं से कहता है! असली मुद्रायें ले आओ नहीं तो हमारे ऊपर से विश्वास उठ जायेगा। सेठ की सत्य निष्ठासे डाकुओं का जीवन परिवर्तित हो गया।
सत्य
गाँधी जी के सत्य के प्रयोग- गाँधीजी अफ्रीका में चोरी की पैरवी कर रहे थे, उन्हे पता चला कि ये व्यक्ति झूठ बोल रहा है, गाँधीजी ने उस केस को कैंसल कर दिया, उसने गाँधीजी को मनाया तब गाँधीजी ने कहा तुम सत्य बोलो उसने सत्य बोला, मजिस्ट्रेट ने सत्य से प्रसन्न होकर दूना जुर्माना करके छोड़ दिया।
सत्य
मैं चोर हूँ- एक चोर ने झूठ बोलने का त्याग किया, राजमहल में चोरी करने गया पहरेदार ने पूँछा! कौन हो? कहा! चोर हूँ, किसी ने विश्वास नहीं किया, सोचा कोई राजपुरुष होगा, जब वह चोरी करके ले जा रहा था तब पूँछा क्या ले जा रहे हो? तो उसने कहा चोरी करके ले जा रहा हूँ, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा, चोर स्वयं विरक्त हो गया, कि एक पाप के त्याग से इतना लाभ हुआ, तब सारे पापों का त्याग करेंगे तो कितना लाभ होगा?
सत्य
शनि का सौदा- एक बार एक राजा ने इस शर्त पर बाजार लगवाया कि जिसका जो भी सामान नहीं बिकेगा वह मैं खरीद लूँगा, सब दुकान दारों का सामान बिक गया, पर एक मूर्ति बेचने वाले की शनि देव की मूर्ति नहीं बिकी, तब वह राजा ने खरीद ली, एक रात राजा ने देखा कि, मेरे महल से लक्ष्मी, यश, सुख आदि अच्छे–अच्छे गुण जा रहे हैं, साथ में सत्य भी जा रहा है, तो राजा ने पूँछा आप लोग कहाँ जा रहे हैं? उन सभी ने कहा आपके यहाँ शनि देव आ गये हैं इसलिए हम लोग नहीं रहेंगे, तब राजा ने सत्य से कहा कि मैंने आपकी रक्षा के लिए ही शनि देव को खरीदा है, इसलिए आप नहीं जा सकते, तो सत्य लौट आया, और सत्य को वापस आया हुआ देखकर, बाकी के गुण भी वापस आ गये, कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ पर सत्य होता है, वहाँ पर सभी गुण होते है।
सत्य
असत्य से इस लोक में अपमान और परलोक में दुर्गति व सत्य से इस लोक में सम्मान और परलोक में सद्गति की प्राप्ति होती है।
सत्य
राजा दशरथ ने सत्य को निभाया, राम ने सत्य वचन का पालन किया विभीषण ने सत्य को पकड़ा, रावण ने सत्य को छोड़ा था।
सत्य
सत्य व्रत की पाँच भावना- क्रोध, लोभ, भय हास्य का त्याग एवं आगम के अनुसार कथन ये सत्य व्रत की पाँच भावनाएं हैं।
सत्य
सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य न बोलो और प्रिय असत्य भी न बोलो यह शाश्वत धर्म है।
सत्य
मैं परधन कभी नहीं लेता- रिक्शा में सेठ का पैसों का थैला छूट गया, वह सेठ को लौटाने के लिये होटल में आया, सेठ ने उसे पाँच हजार रुपये पुरस्कार में देना चाहे पर उसने नहीं लिये और कह दिया मैंने टेक्सी का किराया ले लिया है, विना मेहनत के पराई कमाई नहीं लेता हूँ, ये सत्य व्यवहार है।
सत्य
सत्य अहिंसा प्रेम का बस हमसे इतना नाता है, दीवालों पर लिख देते हैं, दीवाली में पुत जाता है।
सत्य
सत्य निष्ठ- पण्डित गोपालदास जी ने बम्बई यात्रा में बेटे माणिक का टिकट नहीं लिया, वहाँ पहुंचने पर याद आया कि बच्चे की उम्र तीन वर्ष छः दिन हो गयी, इसलिये टिकट लेना चाहिये था, रेलवे की चोरी का खेद हुआ, घर आकर मनि ऑर्डर से रेलवे आफिस को आधे टिकट का पैसा क्षमा माँगते हुए भेज दिया, अङ्ग्रेज था उसने सोचा भारत में इतने प्रमाणिक लोग रहते हैं, उसने पण्डितजी का एड्रेस लेकर सूचना प्रसारित की कि पण्डित गोपालदास जी बरैया, मुरैना न्याय प्रिय व्यक्ति है, यात्रा में इनकी टिकट और लगेज में पूँछताछ न की जाये।
सत्य
पण्डित गोपालदास जी ने कुर्ते सिलवाये जब बाहर जाने लगे तो, एक-एक कुर्ता पहनते जाते और उतारते जाते, लोगों ने पूछा क्या कर रहे हो? तो कहा इनको पुराने कर रहा हूँ, नये कपड़ों पर टेक्स देना पड़ता है, पण्डितजी सरकारी नियम का उल्लङ्घन नहीं करते थे।
सत्य
ईमानदार- ट्रेन में पन्द्रह किलो लगेज फ्री में जाता था, पण्डित गोपालदास जी ने छात्रों के साथ लगेज स्टेशन पर भेजा और कहा इसको तुलवा लेना, लगेज बनवा लेना, छात्रों ने लगेज तुलवाया सत्रह किलो निकला, छात्रों से पण्डितजी ने पूँछा लगेज दे दिया, नहीं! पण्डितजी टी.टी. के पास गये, कहा लगेज बनाओं, टी.टी. ने कहा इतना तो चलता है, पण्डितजी ने टी.टी. से कहा तुम चोरी करते हो और करवाते हो, इतने में गाड़ी चल दी, पण्डितजी ने नास्ते का डिब्बा छात्रों को बापस पकड़ा दिया जो ढाई किलो का था।
सत्य