Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Truth

सत्य

198 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

ईमानदार होने का अर्थ है, हजार मनकों में अलग चमकने वाला हीरा।
सत्य
अंदाजा लगाकर फैसला करना ना-इन्साफी है।
सत्य
सच और झूठ ज्यादा समय तक नहीं छुपता है। लायक वर्षों में बनता है नालायक एक क्षण में।
सत्य
ईमानदारी की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। पुण्यात्मा सफल, पापात्मा असफल होता है।
सत्य
असत्य बोलने से मनुष्य विकृत जीभ वाले गधा, ऊँट, बिलाव, काग, विवेक रहित, मूर्ख तथा गूँगे होते हैं।
सत्य
झूठे दिलासे से स्पष्ट इंकार बेहतर है।
सत्य
सत्य शान्त होता असत्य शोर मचाता है।
सत्य
हठ प्रारम्भ में प्रभावी लगता है, सत्य अन्त में विजय पाता है।
सत्य
सत्य पर नहीं चलना शरीर या मन की कमजोरी है पर स्वीकार नहीं करना यह श्रद्धा की कमी है।
सत्य
सत्य वाणी संयम पर आधारित है।
सत्य
तुम सब लोगों को कुछ समय के लिए तथा कुछ लोगों को सदा के लिए मूर्ख बना सकते हो किन्तु तुम सबको सदा के लिए मूर्ख नहीं बना सकते हो।
सत्य
जो अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता वह असभ्य है, प्रतिज्ञा का पालन ही महानता का लक्षण है।
सत्य
जो छल से धन प्राप्त करता है, वह धर्म से भ्रष्ट हो जाता है।
सत्य
किसी प्रकार की हानि से रहित बोलने को सत्य बोलना कहते हैं।
सत्य
जब तुम्हारा मन सत्य से विमुख होकर असत्य की ओर झुकने लगे तो समझ लो कि तुम्हारा सर्वनाश निकट ही है।
सत्य
जिसका मन सत्यशीलता में निमग्न है, वह पुरुष तपस्वी से भी महान् और दानी से भी श्रेष्ठ है।
सत्य
पूर्ण विचार करो और किसी की ओर मत झुको, निष्पक्ष होकर नीतिज्ञजनों की सम्मति लो, न्याय की यही रीति है।
सत्य
गुरु के सामने झूठ बोलने से आत्मा का पतन होता है और डॉक्टर के सामने झूठ बोलने से शरीर का पतन होता है।
सत्य
झूठ हमेशा सुख देने का ही आश्वासन देता है पर देता कभी नहीं है।
सत्य
झूठ बोलना कायरता की निशानी है।
सत्य
सच्चाई और ईमानदारी से प्रेरित संघर्ष ही स्थाई प्रगति का आधार है।
सत्य
आपका जीवन एक ऐसी खुली पुस्तक होना चाहिए, जिसका प्रत्येक पृष्ठ खुला हुआ हो, जिसकी प्रत्येक पंक्ति स्पष्ट हो और पढ़ी जा सके।
सत्य
श्रेष्ठ जीवन के लिए बड़े झूठ की अपेक्षा छोटा सत्य अधिक मूल्यवान होता है।
सत्य
सच्चे आदमी को हम धोखा नहीं दे सकते क्योंकि उसकी सच्चाई हमारे हृदय में उच्च भावों को जागृत कर देती है।
सत्य
यदि गलती को छिपाया तो वह विष के समान अपना प्रभाव बढ़ाती जाएगी।
सत्य
पराई वस्तु लेना ही चोरी नहीं अपितु कर न चुकाना, रिश्वत लेना, मिलावट करना आदि भी चोरी है। 'कर' चोरी करने वाला भारत के १४० करोड़ लोगों की चोरी करता है।
सत्य
मुनि जो बात हँसी-हँसी में भी कह देते हैं, वह सत्य निकलती है।
सत्य
बार-बार कहने से झूठ सच में नहीं बदल जाता है।
सत्य
एक झूठ को यदि सौ बार सत्य बना करके बोला जाये तो वह झूठ भी सत्य सा महसूस होने लगता है।
सत्य
असत्य हमेशा सत्य की बैसाखियों पर चलकर आता है।
सत्य
असत्य तभी बोलिए जब सच खतरे में पड़ा हो।
सत्य
असत्य विजयी भी हो जाये तो भी उसकी विजय अल्पकालिक होती है।
सत्य
झूठ बोलकर भविष्य की किसी विशेष अर्थ हानि को बचाया जा सके अथवा महान् कार्य सिद्ध हो सके तो वह झूठ झूठ नहीं है।
सत्य
प्राणघात के अवसर पर यदि झूठ बोलकर किसी निरपराध व्यक्ति के प्राणों की रक्षा की
सत्य
भाषण सत्य हो तो संसार के बहुत से अनर्थ यूँ ही रूक जाएँ।
सत्य
सत्य वही कहना चाहिए, जिससे दूसरों का हित हो।
सत्य
सत्य स्वयं को विज्ञापित करने का कोई उपाय नहीं खोजता है।
सत्य
सत्य सबकी रक्षा करता है पर सत्य की सब हत्या करते हैं।
सत्य
जिनके साथ सत्य है वह अकेला होता हुआ भी बहुमत में है।
सत्य
सत्य समय से बढ़कर मूल्यवान है।
सत्य
सत्य बहुमत की अपेक्षा नहीं रखता आचरण और अनुभूति की अपेक्षा रखता है।
सत्य
सत्य के लिए सन्तों का चरित्र पढ़ना और उनका मनन करना आवश्यक है।
सत्य
सत्य के लिए हर वस्तु की बलि दी जा सकती हैं किन्तु सत्य की बलि किसी भी वस्तु के लिए नहीं दी जा सकती।
सत्य
तुम एकमात्र सत्य पर आरूढ़ होओ, इस बात से भयभीत मत होओ कि अधिकांश लोग तुम्हारे विरुद्ध हैं।
सत्य
सत्य की साधना करने वाला साधक सब ओर दु:खों से घिरा रहकर भी घबराता नहीं है, विचलित नहीं होता है।
सत्य
सत्य से कष्ट होता हो तो भी सत्य नहीं छोड़ो और असत्य से लाभ होता हो तो भी असत्य का अवलंबन न लो।
सत्य
यदि सत्य की ओर बढ़ने में एक हजार धारणाएँ धाराशायी होती हों तो भी हमें आगे बढ़ने से रुकना नहीं चाहिए।
सत्य
दीर्घ संसारी जीव को सत्य सुई के समान चुभता है।
सत्य
सत्य परेशान हो सकता है परास्त नहीं।
सत्य
जहाँ सत्य बोलना संभव न हो, तो झूठ बोलने से तो चुप रहना ही बेहतर है।
सत्य
सत्य का स्थान हृदय में है मुख में नहीं, केवल मुख से निकलने के कारण ही कोई बात सत्य नहीं हो जाती है।
सत्य
जो वाचाल नहीं है, वह मिथ्या नहीं बोलता है।
सत्य
मनुष्य के लिए इससे बढ़कर सुयश और कोई नहीं है कि लोगों में उसकी प्रसिद्धि हो कि वह झूठ बोलना जानता ही नहीं अर्थात् ऐसा पुरुष अपने शरीर को कष्ट दिये बिना ही सब तरह की सिद्धियों को पा जाता है।
सत्य
सत्य बोलना ही सरस्वती की पूजा है, ज्ञान की कीमत नहीं आत्मज्ञान की कीमत है।
सत्य
यदि एक सत्य गुण है, तो अन्य बहुत से गुणों की क्या आवश्यकता है? अर्थात् सत्य के साथ सभी गुण रहते हैं।
सत्य
अपने में ईमानदार रहिए- सत्य का कभी पतन नहीं हो सकता है और असत्य कभी टिक नहीं सकता है, जीवन के सङ्कटों में सत्य की नौका हिल सकती है पर डूब नहीं सकती, कर्म के फल मिलने में देर हो सकती है परन्तु विना फल दिए कर्म जाते नहीं, विचारों, शब्दों और कर्मों में एक रूपता रहे, सज्जन की यही सच्ची पहचान है।
सत्य
सत्ता और सत्य यूँ ही सीधे-सीधे नहीं मिलते हैं, दोनों के लिए तप जरूरी है। सत्ता दूसरों को सता-सता कर मिलती है और सत्य स्वयं को तपा-तपा कर प्राप्त किया जाता है। सत्ता शाश्वत नहीं है, सत्ता का पत्ता कभी भी कट सकता है, लेकिन सत्य शाश्वत है, सत्ता और सत्य दोनों के बीच युद्ध होता है, लेकिन महाभारत का उदाहरण साक्षी है कि युद्ध के अठारहवें दिन जीत सत्य की ही हुई थी।
सत्य
अन्याय को मिटाइये पर अपने को मिटाकर नहीं।
सत्य
सत्य और तैल सदैव ऊपर रहते हैं, सत्य और गुलाब के चारों ओर काँटे होते हैं।
सत्य
जीवन का ध्येय सत्य की उपासना होना चाहिये सत्ता की लालसा नहीं।
सत्य
गलत करने से बचना है तो गलत बोलने से भी बचें।
सत्य
व्यापार हो या नौकरी ईमानदारी से करें, विश्वास अर्जन का आधार सत्य वचन है।
सत्य
वादा भूल न जाएँ- सदैव स्मरण रखें कि आप जो भी वादा करें, उसे पूरा करने का हर सम्भव प्रयास करें।
सत्य
जहाँ पूर्वाग्रह(हठाग्रह) है वहाँ सत्य की खोज के सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं।
सत्य
संसारकी उपलब्धियाँ समय में और सत्य की उपलब्धियाँ सङ्कल्प में होती हैं।
सत्य
स्वयं के प्रति ईमानदार बनना ही सच्चे धर्मात्मा की पहचान है।
सत्य
वह मत कहो जो तुम नहीं कर सकते हो।
सत्य
ईमानदार की लोग मदद करते हैं।
सत्य
विवाद वस्तु स्वरूप को नहीं बदल सकता है।
सत्य
यश से अधिक सत्य की कीमत है।
सत्य
जो भी वादा करें उसे पूरा करने का प्रयास करें।
सत्य
क्या आप हँसी-मजाक में भी झूठ बोलते हैं?
सत्य
सत्य बोलता है, ताकि लोग सत्यवादी समझ कर सम्मान करें। तुम्हारे लिए वस्तु लाये हैं, ऐसा कहकर बेचना, चाहे वह वस्तु उसके काम में आये या नहीं।
सत्य
गणेशप्रसाद वर्णी जी जब पढ़ते थे, तो एक दिन एक भङ्गेड़ी के चक्कर में पड़ गये, उसने कहा कि भाँग खाने से शिवजी दिखते हैं, वर्णी जी ने सोचा हमें भी अरहन्त भगवान् दिख जायेंगे, तो उन्होंने भाँग खाली, उसका नशा चढ़ गया, और अपने गुरु अम्बादास जी की अविनय कर दी, गुरू ने नशा उतरने पर पूँछा, भाँग खाई थी? तो सही बता दिया, कि अर्हन्त भगवान् के दर्शन के लोभ में खाई थी, अब ऐसी गलती नहीं करेंगे कपट हीन होने पर शिष्य की मूर्खता भी गुरु का हृदय जीत लेती है।
सत्य
धन की नहीं साफ़ नियत की कमी है- एक किसान बहुत ईमानदार था, इसलिए नगर में उसकी बहुत इज्जत थी, दैवयोग से उसका देहावसान हो गया, उसका लड़का पिताजी की तेरहवी के लिए सेठ जी के यहाँ उधार पैसे लेने गया, सेठ जी ने पिताजी की छवि के कारण पैसे दे दिए, पैसे लेकर उसके मन में आया की यदि मैं सेठ जी के पैसे नहीं दूँगा तो क्या कर लेंगे, और आकर रास्ते में वृक्ष के नीचे सो गया, पैसे टोपी में रक्खे थे वह हवा चलने से उड़ गयी और भेंस ने उसके ऊपर गोबर कर दिया, जब सो कर उठा तो टोपी नहीं मिली तो वह घबरा गया, इधर-उधर ढूँढने लगा, जब नहीं मिली तो परेशान हो गया, निराश हो कर सेठ जी के पास पुनः गया, तो सेठ जी को उसकी हालत देखकर दया आ गयी, और उसको फिर से पैसे दे दिए, तब उसके मन में आया की मैं सेठ के बारे में कितना गलत सोच रहा था, सेठ जी कितने दयालु है, विना कुछ लिए दुबारा पैसे दे दिए, अब मैं सेठ जी का बिलकुल कर्ज नहीं रखूँगा, और कुछ दिन बाद किसी काम से उसी स्थान पर गया जहाँ उसके पैसे गुम हुए थे, वर्षा के कारण गोबर बह गया था जिससे उसकी टोपी मिल गयी, आकर उसने अपनी माँ को सारी बात बताई, तो माँ ने कहा बेटा धन की कमी नहीं साफ़ नियत की कमी है।
सत्य