Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 11 / 11

ज्ञान हीन मनुष्य को मोक्ष प्राप्त नहीं होता जैसे पानी के बिलोने से हाथ चिकने नहीं होते हैं।
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जीवकाण्ड को जानिये, कर्मकाण्ड को खण्डिये, ज्ञानकाण्ड मय अर्थात् सिद्ध भगवान् बनिए।
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एक मत के अनुसार जम्बूस्वामी को मिलाकर पाँच केवली हुए हैं जिनमें अन्तिम श्रीधरकेवली हुए हैं। पाँच श्रुतकेवली हुए हैं, 1.विष्णु जी, 2.नन्दिमित्र जी, 3.अपराजित जी, 4.गोवर्धन जी, 5.भद्रबाहु जी, इनके द्वारा सौ वर्ष तक प्रभावना हुयी। इनके बाद ग्यारह अङ्ग चौदह पूर्व के पाठी नहीं हुये। फिर ग्यारह अङ्ग दस पूर्व के पाठी मुनि हुये। फिर ग्यारह अङ्ग के पाठी हुये। फिर दस अङ्ग के पाठी हुये।
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छः सौ तेरासी वर्ष के बाद एक अङ्ग के भी पाठी नहीं हुये, फिर अंग के अंश के ज्ञाता हुये, उनमें धरसेन जी, पुष्पदन्त जी, भूतबली जी, गुणधर जी, माघनन्दि जी, यतिवृषभ जी, कार्तिकेय जी, जिनचन्द्र जी, समन्तभद्र जी, पूज्यपाद जी, अकलङ्क जी हुये जिनके द्वारा धर्म तीर्थ आज तक सुरक्षित है।
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घीव दूध में रम रहा, व्यापक सब ही ठौर। 'दादू' वक्ता बहुत हैं, मथ काढ़े ते और।।
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1. शुक्रवार में गुरूवार का अभाव- प्रागभाव कहलाता है, 2.शुक्रवार में शनिवार का अभाव- प्रध्वंसाभाव कहलाता है, 3. एक अङ्गुलिका दूसरी अङ्गुलि में, एक फल का दूसरे फल में, एक तन्तु का दूसरे तन्तु में अभाव- अन्योन्याभाव कहलाता है, 4. एक परमाणु का दूसरे परमाणु में और एक जीव का दूसरे जीव में अभाव- अत्यन्ताभाव कहलाता है।
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अनुभवी से समझे विना शास्त्र पढ़ने से कोई सफल नहीं होता, जैसे ज्योतिषी ने कहा! मन्दिर के कलश में इतनी सम्पत्ति है, वह श्रावण कृष्ण एकम् को मिलेगी, उस नासमझ ने कलश तोड़ डाला, ज्योतिषी को झूठा ठहराया, किसी अनुभवी ने कहा भैया! इस तिथि को कलश की जहाँ छाया पड़े वहाँ खोदो, भाग्य से मिल मिलती है, कार्य की सिद्धि समझदार की होती है।
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गधों के बीच में शेर का बच्चा अपने स्वभाव को भूलकर बोझा ढो रहा था, शेर की दहाड़ सुनकर उसे अपने स्वरूप का ज्ञान हो गया, इसी प्रकार संसारी प्राणी संसार में रुल रहा है, जब गुरु रूपी सिंहों कि दहाड़ सुनता है तव अपने स्वरूप का ज्ञान होता है और फिर सिद्धों की श्रेणी मे जाकर मिल जाता है।
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बारदाने में अपनी सारी पूँजी लगा देंगे तो व्यापार किससे करेंगे, इसी तरह व्याकरण, छन्द, अलङ्कार आदि शास्त्रों में सारी जिन्दगी लगा देंगे, तो कल्याण कब करेंगे?
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जो ज्ञानदान के उपकार को भूलता है वह सौ भव तक कुत्ते की योनी में रहता है और दीर्घ काल तक निगोद में रहता है।
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योग स्थान- नई गति में उत्पन्न होने के प्रथम समय में उपपाद योग स्थान, अपर्याप्तक अवस्था में एकान्तानुवृद्धि योग स्थान, पर्याप्तक अवस्था से परिणाम योग स्थान होता है।
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संसार नाश के कारण- द्वादशांग का ज्ञान, उसी में तीव्र भक्ति, केवली समुद्घात और अनिवृत्तिकरण के परिणाम।
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त्रिलोक प्रज्ञप्ति में पाँच सौ गाथाओं में समवसरण का वर्णन हैं।
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बारह प्रकार का समयसार- 1.समयपाहुड, 2.आत्मख्याति, 3.तात्पर्यवृत्ति, 4.समयसारनाटक, 5.छहढाला, 6.सकलज्ञेयज्ञायक की विनती, 7.मेरीभावना, 8.सहजानन्दी शुद्धस्वरूपी, 9.ध्यानसूत्राणि, 10.हूँ स्वतन्त्र निश्चल निष्काम, 11.सोऽहम्, 12.अहम्। 'यों है सकल संयम चरित, सुनिए स्वरूपाचरण अब' छहढाला में यहाँ से समयसार प्रारम्भ होता है।
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छह प्रकार की भूलें सकलज्ञेयज्ञायक विनती में बतायीं हैं- पहले अन्तरङ्ग-बहिरङ्ग स्तुति की, फिर भक्त अपने दुःख रोने लगा 'उचरो निज दुःख जो चिर लहाय' 1. मैं भ्रम्यो, अपन पो बिसरि आप, 2. अपनाये विधि-फल पुण्य-पाप, 3. निज को पर का करता पिछान, 4. पर में अनिष्टता इष्ट ठान, 5. आकुलित भयो अज्ञान धारि, 6. तन परिणति में आपो चितार।
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बारहवें गुणस्थान में श्रुत का पूर्ण क्षयोपशम हो जाता है- (पृ.304)।
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केवली के द्रव्यमन के सद्भाव में सत्य और अनुभय मनोयोग होता है।
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त्रायस्त्रिंश देव को बृहस्पति कहते हैं।
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न्याय वाक्य-''वादे वादे जायते तत्त्वबोधः''। शङ्का समाधान से तत्त्व ज्ञान होता है।
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प्रथमानुयोग में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थ का, महापुरुषों के चरित्र का, वर्णन होता है, बोधि समाधि का खजाना होता है। जिनवाणी का भवन चार स्तम्भों का मेल है 'प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं नमः' इनमें प्रथम स्थान प्रथमानुयोग का है।
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ज्ञान जहाँ पर प्रमुख है, लज्जा सहचारिणी है, तप नाशता है, चारित्र पालकी है और बीच में रहने का स्थान स्वर्ग है, गुण रक्षक हैं, सरल मार्ग है, शान्ति रूपी जल है, दया की भावना ही छाया है, ऐसे मार्ग में गमन करने वाले मुनि विना विघ्न के अपने अभीष्ट स्थान मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।
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अगर जीव ऋजु गति से आया हो, अत्यन्त सरल हो तो पूर्वजन्म का उपकारी मिलने पर पूर्व जन्म का जातिस्मरण होता है।
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भगवान् महावीर स्वामी से लेकर आचार्य धरसेन के पूर्व तक, आचार्यों का आगम अभ्यास मौखिक होता था, लिपि बद्ध करने की आवश्यकता नहीं थी, भगवान् महावीर के निर्वाण से छः सौ तेरासी वर्ष बाद धरसेनाचार्य हुए, जो द्वादशाङ्ग के एकदेश के ज्ञाता थे। वे अष्टाङ्गमहानिमित्त के पारगामी और लिपि शास्त्र के ज्ञाता थे। गिरनार की चन्द्रगुफा में बैठे हुये विचार आया, कि अब ज्ञान के क्षयोपशम का निरन्तर ह्रास हो रहा है, यदि उपलब्ध ज्ञान को लिपिबद्ध नहीं किया गया, तो इसका विच्छेद हो जायेगा। ऐसा सोचकर निकट ही महिमा नगरी में हो रहे मुनि सम्मेलन से महासेन आचार्य के दो शिष्यों को बुलाया, पुष्पदन्त और भूतबली मुनिराज धरसेन आचार्य के पास पँहुचे, दो दिन के उपवास के साथ मन्त्राराधन करने को कहा, एक मन्त्र में एक अक्षर कम एवं एक मन्त्र में एक अक्षर ज्यादा था, जिससे एक को कानी देवी और एक को बड़े दाँत वाली देवी प्रकट हुई, जिसे समझ कर दोनों ने मन्त्र को शुद्ध करके आराधना की तब दोनों मुनि उसमें सफल हुये, तब आचार्य श्री ने मेधावी जानकर, श्रुत का उपदेश दिया, तथा अपना उद्देश्य बताकर ज्ञान को लिपिबद्ध करने का आदेश दिया।
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ज्ञान प्राप्त करने से नहीं ज्ञान रूप बनने से कल्याण होता है।
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ज्ञानी अभिप्राय को और अज्ञानी शब्दों को पकड़ता है।
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स्वाध्यायी जिज्ञासु हो तो बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है।
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विपरीत मति होने पर साक्षर भी राक्षस बन जाते हैं।
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बुद्धि के साथ यदि संवेदन शीलता न हो तो बुद्धि अनर्थ के लिए जन्म देती है।
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जिसको ज्ञान का सदुपयोग करना नहीं आता उसके पास ज्ञान व्यर्थ है।
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मनोरञ्जन के लिए नहीं मन मञ्जन के लिए स्वाध्याय किया जाता है।
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जो व्यक्ति हर परिस्थिति में प्रसन्न रहे वह सम्यग्ज्ञानी है।
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आचार्यश्री का आदेश शिरोधार्य कर पुष्पदन्तजी ने णमोकारमन्त्र के रूप में मंगलाचरण कर, ग्रन्थ लिखना प्रांरभ किया, वीसदि नामक (सत् प्ररूपणा पहली पुस्तक) सूत्रों की रचना की, उनको देखकर भूतबलि जी ने द्रव्य प्रमाणानुगम आदि (शेष पन्द्रह पुस्तक) से ग्रन्थ पूर्ण किया। ज्येष्ठ शुक्ला पञ्चमी के दिन ही इस ग्रन्थ की पूर्णता हुयी, तभी से यह दिन श्रुतपञ्चमी के रूप में मनाया जाता है श्रुतपञ्चमी को ज्ञानपञ्चमी भी कहते हैं। जीवट्ठाण, खुद्दाबन्ध, बन्धस्वामित्वविचय, वेदना, वर्गणा एवं महाबन्ध नामक छह खण्ड होने से षट्खण्डागम कहलाता है, वर्तमान में आठवीं शताब्दि में हुये आचार्य वीरसेन द्वारा लिखित धवला टीका उपलब्ध है।
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जैसे सूत्र (धागा) से सहित सुई गुमती नहीं है, उसी तरह सूत्र अर्थात् शास्त्र ज्ञान से सहित जीव संसार में भ्रमण नहीं करता है।
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सर्वज्ञ द्वारा कथित बारह प्रकार के तपों में स्वाध्याय के समान कोई तप न था, न है और न होगा।
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अज्ञान वह अन्धेरी रात है, जिसमें न चांद है न सितारे अथवा अज्ञान समस्त दुखों को उत्पन्न करने का कारखाना है।
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अज्ञान को अन्धकार की उपमा दी है, जैसे अन्धेरे में काँच, काँटा, सर्प, गड्ढा आदि दिखाई नहीं देते, उसी प्रकार अज्ञानी की दुर्दशा होती है।
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मयूर ने गुरू के विना नाचना सीख लिया, पर गुप्ताङ्ग दिखाई देता है जिससे लोक में हँसी का पात्र होता है अतः ज्ञानी वैरागी गुरुओं से ही ज्ञान लेना चाहिए।
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शम्बूक ने विना गुरू के विद्या सिद्ध करके खड्ग सिद्ध कर लिया, पर उसका फल भोग नहीं सका एवं उसी खड्ग से मारा गया, इसलिए अनुभवी गुरु से ही विद्या प्राप्त करना चाहिए।
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जो पुस्तक पढ़ि सीख है, गुरू को पूँछे नाही। सो शोभा नाही लहे, ज्यों वक हँसा माँहि।।
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साधु शरीर छोड़ सकते हैं पर सिद्धान्त नहीं, हाड़ मांस के पिण्ड को गुरु नहीं कहते हैं, ज्ञान को गुरु कहते हैं।
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दिन में सूर्य, रात में चन्द्रमा अन्धकार को नष्ट करता है और हृदय के गाढ़ अन्धकार को गुरू ही दूर करते हैं।
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अमावस्या की घनघोर रात्रि से लड़ने वाले नन्हे दीपक हमें शिक्षा देते हैं, कि स्वयं को कमजोर न समझो, यदि सभी मिलकर ज्ञान का प्रकाश करें तो अज्ञान अन्धकार दूर हो सकता है।
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ज्ञान दीप तप तैल भर घर शोधे भ्रम छोर। या विधि बिन निकसे नहीं पैठे पूरव चोर।।
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पिच्छी की डण्डी सम्यक्त्व का प्रतीक है, पङ्ख- चरित्र के प्रतीक हैं और डोरी- ज्ञान का प्रतीक है, जैसे डोरी डण्डी और पङ्ख को सम्भालती है उसी प्रकार ज्ञान बीच में रखा है जो सम्यक्त्व और चरित्र दोनों को सम्भालता है, तथा पिच्छी रत्नत्रय का प्रतीक है।
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आचार्य ज्ञानसागर जी का व्यक्तित्व कर्तृत्व- जन्म वि.सं. 1951 माघ-मास, छाबड़ा-गोत्र, पिता-चतुर्भुज, माँ-घृतवरीदेवी, ग्राम-राणोली, जिला-सीकर राजस्थान, खण्डेलवाल जाति, पाँच भाई, आप दूसरे नम्बर के थे, आठ वर्ष में पिता की मृत्यु, आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में, बाद में बड़े भाई छगनलाल जी के साथ 'गया' (विहार) नौकरी हेतु गये, पुन अध्ययन हेतु बनारस गये, गङ्गा घाट पर गमछा बेचकर आजीविका चलाते थे, शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की, आजीवन ब्रह्मचर्य लिया, दयोदय, भद्रोदय, सुदर्शनोदय, वीरोदय, जयोदय, विवेकोदय आदि कवि कालीदास के ही जैसी रचनायें की।
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जिनेन्द्र वर्णी- व्यक्तित्व कर्तृत्व-जिनेन्द्र वर्णी जी का जन्म पानीपत हरियाणा में हुआ था। पिता का नाम भगवानदास एडवोकेट था। इनकी शिक्षा पिताजी से हुयी थी। स्वयं इञ्जीनियर थे, पहले आचार्य विमलसागरजी से क्षुल्लक दीक्षा हुयी थी। पिता विद्वान् थे, गणेशप्रसाद वर्णीजी भी पानीपत में विराजमान थे, वहाँ पर आर्यसमाज से संस्कृत में शास्त्रार्थ हुआ। जैनी संस्कृत नहीं जानते नहीं थे, तब वर्णी जी ने एक बच्चे को द्रव्य सङ्ग्रह रटा दिया था। जब शास्त्रार्थ हुआ तो सबसे पहले बच्चे को खड़ा कर दिया, आर्य समाज प्राकृत नहीं जानती थी। वे उसका उत्तर नहीं दे सके, भगवानदास जी सभा में खड़े हो गये कि तुम हार गये एवं वर्णीजी ने समर्थन कर दिया, सभा के लोगों ने नारे लगा दिये, जैन समाज की जीत हो गयी थी।
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गणेशप्रसाद वर्णी जी निष्काम जनसेवक थे उन्होंने समाज की कुरीतियों पर कुठाराघात किया, समाज की टूटती हुई डाल को हरा भरा किया था, सुलझे विचारों वाले थे एवं जनहित के लिये जगह-जगह पर पाठशालाएं खुलवाई थीं।
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फूल की सुगन्धी फूल में, शक्कर की मिठास शक्कर में, दीपक का प्रकाश दीपक में, वैसे ही आत्मा का सुख आत्मा में रहता है।
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जिज्ञासु ने थोड़े अक्षर में जैन धर्म जानना चाहा तो वर्णीजी ने कहा- रत्नत्रय।
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ज्ञान वृद्धि कल्याण की नियामिका नहीं, किन्तु मोह की कृशता नियम से कल्याण की अविनाभावी है।
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