Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 428

पं. गोपालदास जी बरैया के रोचक प्रसङ्ग।

13 सूत्र

ग्रन्थ की समाप्ति सिद्ध क्षेत्र या अतिशय क्षेत्र पर करते थे, धर्म के प्रति अगाढ़ श्रद्धा थी, एक बार सोनागिर जी गये, दर्शन स्तुति के बाद, एक पद बड़ी मधुर वाणी में पढ़ना प्रारम्भ किया 'नाथ सुधि लीजो जी म्हारी भव-भव दुखिया जानके' इस पद को पढ़ते जाते अविरल अश्रु धारा बहती गयी, ऐसी भक्ति देख लोग गद-गद हो गये थे।
भक्ति
इस पंक्ति को पढ़ते ही पण्डित पन्नालाल जी साहित्याचार्य की आँखों में आँसु आ जाते थे, जब महावीर भगवान की पूजा की जयमाला में 'घनननं घननं घन घण्ट बजे' इसको पढ़ते तो मुख कमल खिल जाता था।
भक्ति
सत्य निष्ठ- पण्डित गोपालदास जी ने बम्बई यात्रा में बेटे माणिक का टिकट नहीं लिया, वहाँ पहुंचने पर याद आया कि बच्चे की उम्र तीन वर्ष छः दिन हो गयी, इसलिये टिकट लेना चाहिये था, रेलवे की चोरी का खेद हुआ, घर आकर मनि ऑर्डर से रेलवे आफिस को आधे टिकट का पैसा क्षमा माँगते हुए भेज दिया, अङ्ग्रेज था उसने सोचा भारत में इतने प्रमाणिक लोग रहते हैं, उसने पण्डितजी का एड्रेस लेकर सूचना प्रसारित की कि पण्डित गोपालदास जी बरैया, मुरैना न्याय प्रिय व्यक्ति है, यात्रा में इनकी टिकट और लगेज में पूँछताछ न की जाये।
सत्य
पण्डित गोपालदास जी ने कुर्ते सिलवाये जब बाहर जाने लगे तो, एक-एक कुर्ता पहनते जाते और उतारते जाते, लोगों ने पूछा क्या कर रहे हो? तो कहा इनको पुराने कर रहा हूँ, नये कपड़ों पर टेक्स देना पड़ता है, पण्डितजी सरकारी नियम का उल्लङ्घन नहीं करते थे।
सत्य
व्रतों का पालन करते हुए ज्ञानार्जन करो, जैन धर्म संसार से पार उतरने की नौका है, इसे पाकर प्रमादी मत बनो।
पुरुषार्थ
पहले जो कमाया उसे भोगने में आनाकानी मत करो, सम्यग्दृष्टि वही है जो पाप से स्वयं को अलिप्त रखे।
कर्म
खुशी में सब साथ देते हैं, विपत्ति में कोई साथ नहीं देता हैं।
संगति
पण्डित गोपालदास जी 1958 में बम्बई में रुई व चाँदी का व्यापार करते थे, एक व्यापारी को पचास हजार की रुई बेची, दूसरे दिन वह सस्ती हो गयी, उसको दस हजार का घाटा लग गया, उसने कहा पण्डित जी हमारा मकान ले लो कर्जा चुक जायगा, पण्डित जी बोले मैं खून पीकर पेट नहीं भरता, मैं तुम्हारा मकान ले लूं और तुम्हारे बच्चे दर-दर फिरें, मैं ऐसा नहीं कर सकता, न हमें मकान चाहिये न रुपया।
दान
सुधारक- विद्यालय के बच्चों ने एक दिन किसी के खेत के चने चुरा लिये, पण्डित गोपालदास जी को पता चला उस दिन भोजन नहीं किया, पण्डितजी को बहुत मनाया पर वे नहीं माने, उन्होंने कहा कि चोरी ही सीखना थी तो संस्था में क्यों आये, मीटिंग हुयी बच्चों ने चोरी के त्याग की प्रतिज्ञा ली, तब पण्डितजी ने शाम को भोजन किया।
चरित्र
ईमानदार- ट्रेन में पन्द्रह किलो लगेज फ्री में जाता था, पण्डित गोपालदास जी ने छात्रों के साथ लगेज स्टेशन पर भेजा और कहा इसको तुलवा लेना, लगेज बनवा लेना, छात्रों ने लगेज तुलवाया सत्रह किलो निकला, छात्रों से पण्डितजी ने पूँछा लगेज दे दिया, नहीं! पण्डितजी टी.टी. के पास गये, कहा लगेज बनाओं, टी.टी. ने कहा इतना तो चलता है, पण्डितजी ने टी.टी. से कहा तुम चोरी करते हो और करवाते हो, इतने में गाड़ी चल दी, पण्डितजी ने नास्ते का डिब्बा छात्रों को बापस पकड़ा दिया जो ढाई किलो का था।
सत्य
पुरुषार्थी- पण्डित गोपालदास जी का स्वास्थ खराब था, बम्बई से प्रवचनार्थ निमन्त्रण आया, पण्डित जी जाने को तैयार हो गये लोगों ने रोका मत जाओं, तब पण्डितजी ने कहा- जैसे युद्ध में शूर और जुआ में जुआरी को निमन्त्रण मिलने पर रुकता नहीं, ऐसा ही विद्वान् भी होता है।
पुरुषार्थ
निरपेक्षवृत्ति- पण्डित गोपालदास जी की पत्नी ने एक बार विद्यालय के बढ़ई से बच्चे को एक खिलौना बनवा लिया, पण्डित जी को पता चला तो पण्डितजी ने काष्ठ की कीमत, दो घण्टे कारीगर की मेहनत का पैसा विद्यालय में जमा कर दिया, विद्यार्थियों को निरपेक्ष वृति से पढ़ाते थे, उनके पढ़ाये बच्चे सभी ठोस विद्वान् निकले जो समाज के कर्णधार बने।
चरित्र
पण्डित गोपालदास जी की पत्नी का तेज स्वभाव था, अपशब्दों के साथ कभी-कभी मार-पीट भी कर देती थी, लोगों ने कहा पण्डितजी इनका स्वभाव ठीक कर दो, पण्डितजी कहते थे भैया, ये हमारे परिणामों की परीक्षिका है, हममें कितना आत्म बल है, ये परीक्षा लेती हैं, मुझे क्रोध करने का क्या अधिकार है।
क्षमा