Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भक्ति

'दिग्भ्रान्त्या पतिता वयं भव वन मध्ये देव। सहामहे कष्टं चिराद् दर्शय वर्त्म सदैव।।'

इस पंक्ति को पढ़ते ही पण्डित पन्नालाल जी साहित्याचार्य की आँखों में आँसु आ जाते थे, जब महावीर भगवान की पूजा की जयमाला में 'घनननं घननं घन घण्ट बजे' इसको पढ़ते तो मुख कमल खिल जाता था।

On reading this line — 'O Lord, bewildered as to direction we have fallen in the midst of the forest of worldly existence; for long we bear this suffering, ever show us the path' — tears would come to the eyes of Pandit Pannalal ji Sahityacharya; and when in the jaymala of Lord Mahavir's worship he read 'ghananan ghananan the deep bell rings', his lotus face would blossom.

— आराध्य सूत्र · #2

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हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति