Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 397

सबसे बड़ा कौन, प्रश्न खड़ा मौन।

23 सूत्र

धर्म में प्रेरणा और अधर्म के निवारण द्वारा इष्ट प्रयोजन को साधता हुआ तथा अनिष्ट प्रयोजन को बाधता हुआ साधुओं का समूह जीवों का जैसा उत्कृष्ट उपकार करता है वैसा तीर्थ, ज्ञान और देव भी नहीं कर सकते हैं।
संगति
दिगम्बरत्व कोई वेश नहीं है, इसमें सब कुछ छोड़ना होता है, भीतर से भी और बाहर से भी, प्रकृति प्रदत्त वीतराग रूप है। अन्य धर्मों के लोग ओढ़ते हैं, जिन धर्म के लोग छोड़ते हैं।
अनासक्ति
किसी साधु में दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनों ही प्रधानता से रहते हैं। किसी में दो प्रधानता से रहते हैं और किसी में सम्यग्दर्शन के लिए प्रधानता से उद्यम होता है। प्रायः कोई साधु गुणरहित नहीं होता है अतः सभी निर्ग्रन्थ मुद्रा के धारक मुनि सत्पुरुषों के लिए स्तुति करने के योग्य हैं।
भक्ति
चित्र में अङ्कित अचेतन साधु भी विद्वानों द्वारा वन्दनीय होता है, फिर जिनशासन को धारण करने वाले चेतन साधु की तो बात ही क्या है?
भक्ति
साधु सङ्गति होने पर खोटे कार्यों में प्रवृत्ति नहीं होती। खोटी स्त्री, पुत्र तथा स्वामी आदि के दुर्वचन सुनने का दुःख नहीं होता। राजादिक को प्रणाम नहीं करना पड़ता, भोजन, वस्त्र, धन तथा स्थान की चिन्ता नहीं होती। ज्ञान की प्राप्ति होती है, लोक में प्रतिष्ठा बढ़ती है, शान्ति और सुख में प्रीति होती है। मृत्यु के बाद मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है, इस प्रकार श्रामण्य पद के ये गुण हैं अतः हे बुद्धिमान् पुरुषों! उस श्रामण्य पद को प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
संगति
सबसे बड़ा कौन-प्रश्न खड़ा मौन- दो मित्रों में विवाद हुआ कि सबसे बड़ा कौन? पहले ने कहा पृथ्वी। दूसरे ने कहा पृथ्वी बड़ी तो शेषनाग पर क्यों पड़ी? तो पुनः कहा शेषनाग बड़ा। तो पुनः पूँछा शेषनाग बड़ा तो महादेव जी के गले में क्यों पड़ा? तो उसने कहा महादेव जी बड़े। फिर कहा महादेव जी बड़े तो हिमालय पर क्यों पड़े? तो पुनः कहा हिमालय बड़ा। उसने कहा हिमालय बड़ा तो हनुमान जी की हथेली पर क्यों पड़ा? पुनः बोला तो हनुमान जी बड़े। पुनः पूँछा हनुमान जी बड़े तो रामचन्द्र जी के चरणों में क्यों पड़े? तब वह बोला रामचन्द्र जी बड़े। तो पुनः पूँछा रामचन्द्र जी बड़े तो गुरु जी के चरणों में क्यों पड़े? अतः संसार में सबसे बड़े गुरु होते हैं।
भक्ति
स्मरण गुरु- जैसे कछवी स्मरण करके अण्डे पकाती है वैसे ही तीर्थंङ्कर सिद्धों का स्मरण करके दीक्षित होते हैं।
ध्यान
दृष्टि गुरु- जैसे मछली अण्डा देखकर पकाती है वैसे ही गणधर मानस्तम्भ या तीर्थंङ्कर को देखकर दीक्षित होते हैं।
भक्ति
शब्द गुरु- जैसे कुररी जमीन में अण्डा देती है और आकाश में शब्द करके पकाती है वैसे ही शेर ने ऋद्धिधारी मुनिराजों के उपदेश से सम्यक्त्व प्राप्त किया था।
भक्ति
स्पर्श गुरु- जैसे मुर्गी स्पर्श करके अण्डा पकाती है वैसे ही गुरु सिर पर हाथ रख कर अठ्ठाईस मूलगुणों का आरोपण करते हैं।
भक्ति
गुरु से हूँ-हूँ तू-तू करके बात करना और विद्वान या साधु को विवाद करके नीचा दिखने वाला श्मशान में वृक्ष होता है, जिस पर कौए और गिद्ध बैठते हैं।
विनम्रता
गुरू ब्रह्मा-विष्णु-महेश तथा साक्षात् परम ब्रह्म हैं इसलिए गुरुजी के लिए नमस्कार है।
भक्ति
तपस्वियों को प्रणाम करने से उच्च गोत्र अर्थात् इक्ष्वाकु आदि वंश में उत्पत्ति होती है, दान देने से भोगों की अर्थात् चक्रवर्ती आदि पद की प्राप्ति होती है, सेवा करने से पूजा की अर्थात् तीर्थंङ्कर आदि पद की प्राप्ति होती है, भक्ति करने से सुन्दर रूप अर्थात् कामदेव आदि पद की प्राप्ति होती है और स्तवन करने से कीर्ति की अर्थात् शलाका पुरुषों आदि में उत्पत्ति होती है।
भक्ति
गुरु के सानिध्य में थूकना, टिक के बैठना, जम्हाई लेना, अङ्गड़ाई लेना, झूठ बोलना, असभ्य हँसना, पैर फैलाना, उपदेशक बनना, ताल ठोकना, ताली बजाना, कटाक्ष करना, अङ्ग संस्कार आदि नहीं करना चाहिये।
विनम्रता
एक अक्षर भी यदि गुरु शिष्य को देता है, तो पृथ्वी पर ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जिसे देकर गुरु के ऋण को चुकाया जा सके, एक अक्षर भी देने वाले को जो गुरु नहीं मानता वह कुत्ते की सौ योनी प्राप्त करके चाण्डालों में उत्पन्न होता है।
भक्ति
जिसका पिता धैर्य है, माता क्षमा है, स्त्री शान्ति है, पुत्र सत्य है, बहिन दया है, भाई मानसिक संयम है, शैय्या भूमितल है, वस्त्र दिशाएँ है और भोजन ज्ञानामृत है ये जिसके कुटुम्बी हैं, बोलो मित्र उस योगी को किससे भय होगा?
संयम
गुरुओं से व्रत लेकर जो तोड़ता है उसे सहस्रकूट जिनालय तोड़ने का पाप लगता है।
चरित्र
जो स्नान, उपभोग, पूजा, अलङ्कार से रहित हैं, मधु-मांस का त्यागी है, वह गुणवान अतिथि कहलाता है।
चरित्र
मयूर ने गुरू के विना नाचना सीख लिया, पर गुप्ताङ्ग दिखाई देता है जिससे लोक में हँसी का पात्र होता है अतः ज्ञानी वैरागी गुरुओं से ही ज्ञान लेना चाहिए।
ज्ञान
शम्बूक ने विना गुरू के विद्या सिद्ध करके खड्ग सिद्ध कर लिया, पर उसका फल भोग नहीं सका एवं उसी खड्ग से मारा गया, इसलिए अनुभवी गुरु से ही विद्या प्राप्त करना चाहिए।
ज्ञान
जो करते हैं गुरू भक्ति पागलों की तरह। उन पर गुरूओं की कृपा बरसती है बादलों की तरह।।
भक्ति
जो पुस्तक पढ़ि सीख है, गुरू को पूँछे नाही। सो शोभा नाही लहे, ज्यों वक हँसा माँहि।।
ज्ञान
गुरू को पूँछी चालता, सहज थान मिल जाय। क्लेश मिटे, आनन्द बढ़ै, लागे सुगम उपाय।।
भक्ति