Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 342

भावों का प्रभाव। मन के हारे हार है। अग्नि में चार कषायें।

29 सूत्र

मन्दिर जाने के परिणाम और मन्दिर से घर जाने के परिणाम में महान अन्तर है, मन्दिर जाते समय मृत्यु हो तो अलग फल, घर जाते समय अगर मृत्यु हो तो अलग फल इसी प्रकार भोजन के प्रथम ग्रास और अन्तिम ग्रास के राग में अन्तर होता है।
भक्ति
गजब का तमाशा- रामकृष्णपरमहँस जी का इन्दौर में प्रवचन था, प्रवचन के प्रारम्भ में उन्होंने दो-तीन बार कहा ! आज हमने गजब का तमाशा देखा, श्रोताओं को सुनने की उत्कण्ठा हुई, उन्होंने कहा ! एक महिला दो-तीन बच्चों के साथ धान कूट रही थी, वह बीच-बीच में बच्चों से बातें भी करती जाती थी, और फटाफट मूसल भी पटकती जाती थी, लेकिन एक भी मूसल उसके हाथ में नहीं लगा, उसी प्रकार ज्ञानी भी घर में रहता है, घर के सारे काम करता है, पर पाप कर्म से अपने को हमेशा बचाता रहता है।
विवेक
भावों का प्रभाव- राजा भटक गया, जङ्गल में बुढ़िया की कुटिया पर गया पानी माँगा, बुढ़िया ने कहा बेटा लू लग जायेगी, बगीचा से एक अनार का लौटा भर रस लाकर राजा को पिलाया, राजा ने सोचा इतना सुन्दर बगीचा मेरे राज्य में आता है या नहीं ? मन्त्री से पता करवाया, अपना है तो 'कर' लगाना है, अगली बार राजा फिर भटक कर, बुढ़िया के यहाँ गया, जूस माँगा, अब बुढ़िया ने पचास अनारों को निचोड़ा फिर आधा लोटा जूस निकला, वह भी बेस्वाद था, राजा ने पूँछा आज क्या हो गया, बुढ़िया ने कहा ! राजा का भाव बिगड़ गया है, भावों का प्रभाव पड़ता है।
मन
जल तें भिन्न कमल है, नगरनारी को प्यार यथा कादे में हेम अमल है' जैसे धाय पुत्र को अपना नहीं मानती है, मुनीम धन को अपना नहीं मानता, इसी प्रकार सम्यग्दृष्टि पर पदार्थ को अपना नहीं मानता है।
अनासक्ति
उपशमसम्यक्त्व, सूक्ष्मसाम्परायसंयम, आहारककाययोग, आहारकमिश्रकाययोग, वैक्रियिकमिश्रकाययोग, लब्ध्यपर्याप्तक- मनुष्य, सासादनसम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये आठ सान्तर मार्गणाएँ हैं।
ज्ञान
उक्त आठ अन्तर मार्गणाओं का उत्कृष्ट काल क्रम से सात दिन, छ: महिना, पृथक्त्व वर्ष, पृथक्त्व वर्ष, बारह मुहूर्त और अन्त की तीनमार्गणाओं का काल पल्य के असंख्यातवें भाग है और जघन्य काल सबका एक समय है।
समय
अनन्तकाल से संसारी थे, कोई देव या नारकी बना, कोई क्रोधी, कोई सज्जन, कोई हिंसक, कोई अहिंसक, कोई समतावान, कोइ विषमतावान ये सब भावों का खेल हैं।
कर्म
कोई तीर्थों को जाता है तो कहते हैं पेटी, थैला, रुपया, बच्चों को सम्भाल कर रखना, लेकिन कोई ये नहीं कहता कि भावों को सम्भालकर रखना क्योंकि भावों का सम्भालना ही महत्त्वपूर्ण है।
मन
जब राम ने सीता को जङ्गल में छोड़ा तो सीता ने अपने भावों को सम्भाला और श्रीराम को सन्देश भेजा धर्म को नहीं छोड़ना।
धर्म
साधु को अन्तराय आय तो भावों को सम्भालते हैं, श्रावक को विपत्ति आये तो भावों को बिगाड़ते हैं।
मन
एक मूर्ख कुंए में पैर लटका के बैठा था, लोगों ने उससे पागल कहा, वह बोला यहाँ पर किस ने बताया कि मुझे लोग पागल कहते हैं, चेष्टा देखकर भावों का पता चल जाता है बताने की आवश्यकता नहीं होती है।
मन
ये रागद्वेष आदि औदयिक भाव हैं, अवग्रहादि क्षायोपशमिक भाव हैं।
कर्म
मिट्टी पर पानी पड़ने से आर्द्र हो जाती है, उसी प्रकार जिनवाणी माँ के श्रवण से भाव आर्द्र होते हैं जैसे हल्दी और चूना को मिलाते ही रंग बदल जाता है उसी प्रकार जिनवाणी माँ के शब्द कान में पड़ते ही अंतरंग बदल जाता है।
भक्ति
सबसे कम भाव सिद्धों में और सबसे ज्यादा भाव संसारी जीवों में पाये जाते हैं।
मन
लेश्या- एक मिथ्यादृष्टि मुनि पर आरा चला रहा है और एक मिथ्यादृष्टि मुनिव्रत पालन कर आरा के कष्ट को सह रहा है, दोनों का गुणस्थान एक है, पर लेश्या भिन्न है।
कर्म
मन के हारे हार है- जापान का सेनापति तेगूलाङ्ग बड़ा चतुर था, अपनी सेना के मनोबल को कम देखकर उसने कहा कि देवी ने प्रसन्न होकर ये सिक्का दिया है, यदि दो बार उछालने पर चित्त आये तो अपनी जीत होगी सिक्का उछाला दोनो बार चित्त आया क्योंकि उसमें पट्ट था ही नहीं, सेना का हौसला बढ़ गया और कम सेना भी विशाल सेना से जीत गयी।
मन
उपशम सम्यक्त्व, क्षयोपशम सम्यक्त्व, अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना और देशसंयम, ये चारों असंख्यात बार भी होकर छूट सकते हैं।
कर्म
आदि के तीन और अन्त के तीन गुणस्थानों में औपशमिक भाव नहीं होता है।
कर्म
द्वितीय अध्याय में मोहनीय कर्म की अठ्ठाईस प्रकृतियों का वर्णन है, आनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान क्रोध मान माया लोभ, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये चौदह सर्वघाती प्रकृतियाँ हैं, सञ्ज्वलन क्रोध मान माया लोभ, हास्य आदि नौ और सम्यग्प्रकृति ये चौदह देशघाती प्रकृतियाँ हैं।
कर्म
उदयाभावी क्षय- सर्वघाती स्पर्धकों का अनुभाग अनन्त गुणा क्षीण होकर देशघाती रूप से उदय में आता है, सर्वघाती रूप से उदय का अभाव है, अत: उन सर्वघाती स्पर्धकों की उदयाभावी क्षय संज्ञा है।
कर्म
भाँग के नशे का नीबू का रस लेने से अनन्त गुणा हीन स्थिति अनुभाग वाला होकर उदयावली में आना उदयाभावी क्षय कहलाता है।
कर्म
अग्नि में चार कषाय- क्रोध के कारण जला देती है, मान के कारण ऊपर जाती है, माया के कारण राख में छिपी रहती है, लोभ के कारण ईधन से तृप्त नहीं होती है।
क्षमा
जो असंख्यात भव के बाद मोक्ष जायेंगे उनको भी निकट भव्य कहते हैं।
कर्म
जो भव्य ज्यादा से ज्यादा पन्द्रह भव में मोक्ष जाते हैं, उन्हें भव्य पुण्डरीक कहते हैं।
कर्म
आसन्न भव्य-जो पृथक्त्व(3से लेकर 9के बीच) भव में मोक्ष चला जाता है, दूर भव्य अर्ध पुद्गल परावर्तन में, दूरानुदूर भव्य हमेशा नित्यनिगोद में रहते हैं उनको मोक्ष के निमित्त ही नहीं मिलते हैं, अभव्य तो चारों गतियों में घूमते हैं।
कर्म
उनतीस अङ्ग प्रमाण पर्याप्तक मनुष्यों में दो या तीन अभव्य होंगे, देवों में पाँच-छ: अभव्य होंगे, नारकियों में तीन-चार अभव्य होंगे, बाकी एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय में अभव्य पाए जाते हैं।
कर्म
उपयोग के माध्यम से मिली चीज का भी अनुभव कर सकते हैं, जैसे दाल में नमक, रोटी में घी आदि उसी प्रकार शरीर में आत्मा का अनुभव कर सकते हैं।
ज्ञान
'उपयोग' दो जगह आया है, 'उपयोगो लक्षणम्', 'लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् एक में ज्ञान दर्शन लेना, दूसरी जगह क्षयोपशम लेना है, लब्धि के निमित्त से जो परिणमन होता है उसे उपयोग कहते हैं।
ज्ञान
विसंयोजना का उदाहरण- किरायेदार मकान छोड़ के गया, अपना कुछ सामान पड़ोसी को दे गया यदि वह पुन: वहाँ आता है तो फिर अपना सामान ले लेता है।
कर्म