Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 31

वैराग्य दोहावली

20 सूत्र

जो सुख चाहो मित्र तुम तज दो बातें चार। चोरी चुगली जामनी (जमानत) और पराई नार।।
चरित्र
जो सुख चाहो जीव तुम तज दो बातें चार। बहुभोजन बहुजागना बहुसोना बहुजार (मैथुन)।।
संयम
जो सुख चाहो आत्मा तज दो बातें चार। कुगुरू कुदेव कुधर्म अरु दुःख कर असदाचार।।
धर्म
जो-जो देखी वीतराग ने, सो-सो होसी वीरा रे। अनहोनी कबहूँ न होसी रे, काहे होत अधीरा रे।।
कर्म
वीतराग ने क्या क्या देखा, तु जाने क्या वीरा रे। वीतराग की वाणी सुनकर, हर ले भव की पीरा रे।।
भक्ति
जो चाहत दुःख से बचे, करो न पर की चाह। पर पदार्थ की चाह से, मिटे न मन की दाह।।
संतोष
खाने से नहीं पचाने से पहलवान बनते हैं, कमाने से नहीं बचाने से धनवान बनते हैं। पढ़ने से नहीं चिन्तन से विद्वान् बनते हैं, चर्चा से नहीं चर्या से भगवान् बनते हैं।।
पुरुषार्थ
ज्ञान बढ़े गुणवान की सङ्गति, ध्यान बढ़े तपसी सङ्ग कीने, मोह बढ़े परिवार की सङ्गति, लोभ बढ़े धन में चित दीने। क्रोध बढ़े नर मूढ़ की सङ्गति, काम बढ़े तिए को सङ्ग कीने, बुद्धि विवेक विचार बढ़े कवि दीन सो 'सज्जन सङ्गति' कीजे।।
संगति
क्या आप अपने किए हुए अहसान को भूल जाते हैं?
विनम्रता
क्या आप अपनी मृत्यु के बारे में विचार करते हैं?
समाधि
क्या आप कभी दुष्टजनों के बीच भी सज्जनता का परिचय देते हैं?
चरित्र
क्या आप संसार की नश्वरता का कभी विचार करते हैं?
अनासक्ति
क्या अभी तक आपने अपने जीवन जीने का कोई आदर्श लक्ष्य निर्धारित किया है?
पुरुषार्थ
जर, जोरू और जमीन ये भाई-भाई को दुश्मन बनाते हैं। सच्चाई, कर्तव्य और मौत इनको याद रखना जरूरी है। माँ, बाप और जवानी ये जीवन में एक ही बार मिलते हैं। अकल, चारित्र और हुनर ये कोई चुरा नहीं सकता है। तीर, वाणी और प्राण ये निकलकर वापस नहीं आते हैं। धन, भोजन और स्त्री ये पर्दे के योग्य हैं।
विविध
यह विवेक का नहीं विज्ञापन का युग है, चिन्तन का नहीं चाटुकारिता का युग है। चारित्रवान मनीषियों का नहीं चारित्रहीन चमचों का युग है। सत्य शोधकों का नहीं सत्ता लिप्सुओं का युग है। आचार का नहीं प्रचार का युग है। दूरदृष्टि का नहीं दूर दर्शन का युग है। शब्द साधना का नहीं शब्द जाल का युग है। प्रज्ञा पुरूषों का युग नहीं पण्डितों का युग है। परमेष्ठियों का युग नहीं पाखण्डियों का युग है।
समय
जैसे मूरख हाथी पाकर ईंधन उस पर ढोता है। तैसे मूरख अमृत पाकर अपने पग को धोता है।।
विवेक
मानव ने जीवन में, विषय भोगों को चाह लिया। काजू की खीर में, हींग का बघार लगा दिया।।
अनासक्ति
नदी की शोभा पानी से होती है रेत से नहीं, पर्वतों की शोभा वृक्षों से होती है पत्थरों से नहीं। वृक्षों की शोभा फलों से होती है पत्तों से नहीं, मानव जीवन की शोभा संयम से होती है विषय भोगों से नहीं।।
संयम
कुछ जन्म लेते हैं जमाने के लिए, कुछ जन्म लेते हैं धन कमाने के लिए। कुछ जन्म लेते हैं मोक्ष जाने के लिए, शेष पैदा हुए है आबादी बढ़ाने के लिए।।
विविध
साधु ऐसा चाहिए जैसे सूप स्वभाव। सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाए।।
विवेक