Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 292

चार तरह के लोग।

31 सूत्र

त्याग झाड़ू लगाने के समान है आकिञ्चन्य पोंछा लगाने के समान है।
अनासक्ति
अकिञ्चन जगत का स्वामी कैसे हो सकता है? अतः कहते हैं कि सन्त पुरुषों का चरित्र अलौकिक होता है, हे भव्य! आकिञ्चन्य रूप सुसिद्ध मन्त्र का निरन्तर अभ्यास कर, जो मन्त्र गुरु के उपदेश के अनन्तर तत्काल अपना काम करता है उस मन्त्र को सुसिद्ध मन्त्र कहते हैं, जो काल पाकर सिद्ध होता है वह सिद्धमन्त्र है, जो जप-होम आदि से साधा जाता है वह साध्यमन्त्र है और जो तत्क्षण ही शत्रु को मूल से नष्ट कर देता है वह सुसिद्ध मन्त्र है, ऐसा ही आकिञ्चन्य रूपी सुसिद्ध मन्त्र मोह को तत्काल नष्ट करने वाला है, चारित्र की रक्षा और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अन्तरङ्ग चौदह प्रकार के और बाह्य दस प्रकार के परिग्रहों को छोड़ना चाहिए।
अनासक्ति
शरीर के दुर्गुण और आत्मा की महिमा का चिन्तन करें, वो नहीं रहे अर्थात् वो कोई और था, ऐसा भेद विज्ञान जीवित अवस्था में होना चाहिए।
ज्ञान
रुपयोंके लिए सभी कहते हैं कि ये हमारे हैं पर रुपये किसी से नहीं कहते कि तुम हमारे हो या हम तुम्हारे हैं।
धन
जीवन शैली के चार भेद- 1. कुछ लोग अकेले में रहते हैं, अकेले में जीते हैं, 2. कुछ लोग अकेले में रहते हैं पर भीड़ में जीते हैं, 3. कुछ लोग भीड़ में रहते हैं पर अकेले में जीते हैं, 4. कुछ लोग भीड़ में रहते हैं और भीड़ में ही जीते हैं।
Misc.
चार तरह के लोग- 1.मेरा सो मेरा, तेरा सो तेरा, 2.तेरा सो तेरा, मेरा भी तेरा, 3.मेरा सो मेरा, तेरा भी मेरा, 4.तेरा न मेरा, चिड़िया रैन बसेरा, झूठा है झमेला।
अनासक्ति
मुनि अपने घर में रहते हैं और गृहस्थ बाहर भटकते हैं, पर कहते उल्टा हैं कि मुनि गृहत्यागी हैं, गृहस्थ घर में रहते हैं।
Misc.
भूकम्प आया तो लोग अपने घर को भागे, मुनि आँखें बन्द करके बैठ गए, श्रावक ने पूँछा! आप क्यों नहीं भागे? मुनि ने कहा हम भी अपने आत्मा रूपी घर की ओर भागे। अर्थात् तुम बाहर की ओर भागे और हम भीतर की ओर भागे।
ध्यान
आकिञ्चन्य धर्म आत्मा की उस दशा का नाम है, जहाँ पर बाहरी सब कुछ छूट जाता है और अन्तरङ्ग में भी सङ्कल्प-विकल्प की परिणति को विश्राम मिल जाता है।
अनासक्ति
शिल्पी ने मूर्ति नहीं बनाई, आवरण हटाया है, मूर्ति तो पत्थर में पहले से ही थी, उसी प्रकार आत्मा के ऊपर का आवरण हटते ही भगवान् आत्मा प्रकट हो जाती है।
ज्ञान
यदि दुनिया की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति चाहते हो, तो बाहर भटकने की जरूरत नहीं वह तुम्हारे भीतर है।
ज्ञान
प्रत्येक अवस्था में सुख का अनुभव कर सकते हैं, केवल वैराग्य होना चाहिए।
अनासक्ति
संसार शोकमय है, जीवन भोगमय है, सम्बन्ध वियोगमय है, मात्र साधना ही उपयोग मय है।
अनासक्ति
सम्बन्ध तीन प्रकार के- सांसारिक सम्बन्ध- माँ बाप का या जन्म से मरण तक चलने वाला सांसारिक सम्बन्ध है। सम्पादित सम्बन्ध- धन, पैसा, प्रतिष्ठा आदि का सम्पादित सम्बन्ध है। शाश्वत् सम्बन्ध- आत्मा का ज्ञान, दर्शन आदि से शाश्वत् सम्बन्ध है, पूर्व के दो सम्बन्ध छूट जाते हैं अतः हेय हैं।
अनासक्ति
ज्ञान-दर्शन ही मात्र मेरा है अन्य कुछ भी नहीं ऐसा अनुभव करना आकिञ्चन्य धर्म है।
ज्ञान
जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपना कोय। घर सम्पत्ति पर प्रगट ये पर हैं परिजन लोय।।
अनासक्ति
मैं हूँ कौन कहाँ से आया, किस दर पर है जाना। इस दुनिया में क्या है मेरा, साथ किसे ले जाना।। क्या खोया क्या पाया अब तक, क्या मुझको है पाना। कैसा है मम रूप सलोना, कब शिवपुर है जाना।।
ज्ञान
धरती पर सोता हूँ आसमान ओढ़ता हूँ, देह की माटी से अमृत निचोड़ता हूँ। दुनिया की दौलत से कीमती ये फकीरी है, इसलिये वैभव से नहीं विराग से नाता जोड़ता हूँ।।
अनासक्ति
दरिद्र मनुष्य पाप के उदय से बाह्य परिग्रह से रहित होते हैं किन्तु अन्तरङ्ग परिग्रह के त्यागी साधु लोक में दुर्लभ हैं।
अनासक्ति
'मेरा कुछ भी नहीं है' ऐसा सोचकर बैठ जाओ तीन लोक के अधिपति हो जाओगे किन्तु यह योगियों के बस की बात है, मैंने तुम्हें परमात्मा बनने का रहस्य बताया है।
अनासक्ति
पक्षी नाना देशों और दिशाओं से आकर वृक्षों पर रैन बसेरा करते हैं और प्रातः काल अपने-अपने कार्य के वश नाना देशों और दिशाओं में चले जाते हैं, वैसे ही परिवार के लोग अनेक गतियों से आकर के एक घर में रहते हैं और अपने-अपने कर्मों के अनुसार नाना गतियों में चले जाते हैं।
परिवार
न्यायवान की पशु भी सहायता करता है, कुमार्ग पर चलने वाले को सगा भाई भी छोड़ देता है। रावण के भाई विभीषण की तरह।
चरित्र
आत्मकल्याण की चिन्ता होना उत्तम हैं, शरीर की चिन्ता होना मध्यम हैं, भोगों की चिन्ता होना जघन्य हैं और पर की चिन्ता होना अधम से भी अधम हैं।
विवेक
एकाकी पर पदार्थों की इच्छा से रहित, शान्त, हाथ में भोजन करने वाला, दिगम्बर, कर्मों को नष्ट करने में समर्थ कब होऊँगा ऐसी जैनेतर ऋषि भी भावना भाते हैं।
अनासक्ति
प्राणी दिगम्बर ही जन्म लेता है, और दिगम्बर ही मरता है मध्यावस्था में दिगम्बर होने वाले मनुष्य दुर्लभ हैं।
अनासक्ति
यहाँ कुछ नहीं हैं, वहाँ कुछ नहीं हैं, जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ भी कुछ नहीं हैं, विचार करके पाता हूँ कि आत्मज्ञान से बढ़कर और कुछ भी नहीं हैं।
ज्ञान
ज्ञानी और अज्ञानी का लक्षण- जो पुरुष अपने से अन्य पर द्रव्य, सचित्त स्त्री पुत्रादिक, अचित्त धन धान्यादिक अथवा मिश्र ग्राम नगरादिक हैं उन्हें यह समझता है कि मैं यह हूँ, यह द्रव्य मुझ स्वरुप है, मैं इसका हूँ, यह मेरा है, यह मेरा पहले था, इसका मैं भी पहले था, यह मेरा भविष्य में होगा, मैं भी इसका भविष्य में होऊँगा, ऐसा झूठा आत्म विकल्प करता है वह मूढ़ है, मोही है, अज्ञानी है, और जो पुरुष परमार्थ वस्तुस्वरुप को जानता हुआ वैसा झूठा विकल्प नहीं करता वह मूढ़ नहीं ज्ञानी है।
ज्ञान
मेरी आत्मा शाश्वत् है, ज्ञान-दर्शन लक्षण वाली है, शेष सभी मुझसे बाह्य है और संयोग से मिलने वाले हैं।
अनासक्ति
रामचन्द्रजी विचार करतें हैं, कि मैं राम नहीं हूँ और न हि भोगों की मेरी इच्छा है, मैं तो जिनेंद्र भगवान् की तरह आत्मा में शान्ति से स्थिर रहना चाहता हूँ।
ध्यान
सभी कामभोग और बन्ध की कथाएँ श्रुत परिचित एवं अनुभूत हैं किन्तु एकत्व विभक्त आत्मा की उपलब्धि दुर्लभ है।
अनासक्ति
जीव अकेला जन्म लेता है, अकेला गर्भ में निवास करता है, अकेला ही बाल, युवा एवं वृद्ध अवस्था को प्राप्त होता है।
अनासक्ति