Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 64

संत सायर सपूत से जीना सीखो

116 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

किसी गरीब की झोली में १ रुपया डाला तब पता चला कि मँहगाई के इस दौर में आज भी 'दुआएँ' कितनी सस्ती हैं और दुआएँ असंभव को संभव बनाती हैं।
दान
माता-पिता के मुख से निकला आशीर्वाद जन्म-जन्मान्तर तक रक्षा करता है।
परिवार
आप किसी को सुधार पाओ या नहीं पर अपनी आँखों को अवश्य सुधार लेना।
संयम
सूर्य की तपन से नदी का नीर और स्वार्थ की तपन से आँखों का नीर सूख जाता है।
विविध
अगर इंसान शिक्षा के पहले संस्कार, व्यापार के पहले व्यवहार, भगवान् से पहले माता-पिता को पहचान ले तो जिन्दगी में कोई कठिनाई न आये।
परिवार
जलना छोड़ो प्रकाशित होना सीखो, प्रकाश में दुनिया प्रसन्न होती है, जलने वाला तो राख होने से पहले ही खोटी स्मृति रूपी दुर्गन्ध छोड़ जाता है। इतिहास कहता है उधार और वरदान नहीं देना चाहिए।
चरित्र
उपकार करना पर स्वयं कष्टमय मत होना और पापी का उपकार करना सर्प को दूध पिलाना है।
विवेक
उपकार भूलने वाला पापी और उपकारी का भी अपकार करने वाला महापापी होता है।
चरित्र
तात्कालिक लाभ की पूर्ति में जीना कलियुग के लोगों की सोच है।
विविध
कामी को माँ से नहीं स्त्री से और मिथ्यादृष्टि को धर्म से नहीं धन से प्रेम होता है।
अनासक्ति
उत्साह सफलता का अमोघ अस्त्र है इसके बिना कुछ भी हासिल नहीं होता है।
पुरुषार्थ
कार्य के बिना कारण न होने का मतलब बिना बीज के फल का नहीं मिलना है।
कर्म
तीव्र कषाय में मरीचि समवसरण छोड़कर भाग गया था मन्द कषाय में शेर की पर्याय में श्रावक बन गया था।
कर्म
कषायोदय में चारित्र नहीं होता है, चारित्र के सद्भाव में निराकुल सुख शान्ति की शक्तियाँ प्रकट होती है।
संयम
खुशी से सहन किया कष्ट, कष्ट मालूम नहीं पड़ता है।
संयम
सबको खुश करके आप मुनि नहीं बन सकते हैं और मुनि बनकर आप सबको खुश नहीं कर सकते।
विविध
मति सुधारने से गति सुधर जाती है और भ्रष्ट मति से भ्रष्ट गति होती है।
कर्म
आप अपनी गलतियों पर अच्छे वकील हैं और दूसरों की गलतियों पर बहुत अच्छे न्यायाधीश बन जाते हैं पर स्वयं पर सत्य न्याय करने की कृपा करें।
विवेक
गन्दगी तो पैसे वालों ने फैलाई वरना गरीब तो सड़कों से फटी थैलियाँ तक उठा ले जाते हैं।
विविध
गुण सर्वत्र पूजे जाते हैं, जन्म में क्या रखा है? रेशमी वस्त्र कीड़ों से उत्पन्न होता है, कमल कीचड़ में जन्म लेता है, नीलकमल गोबर से उद्भूत होता है, अग्नि काष्ठ से उत्पन्न होती है, मणि सर्प के फण से उपलब्ध होती है और गोरोचन गाय के पित्त से प्रकट होता है फिर भी गुणों के कारण मान्य हैं।
चरित्र
जिस गुणस्थान का भेष है तदनुरूपभाव भी होना चाहिए।
धर्म
घर तो मधुमक्खियों का स्थान है, यदि छत्ते से एक मक्खी टूटी तो फिर सब गिरती हैं।
परिवार
चाह रहित मनुष्य का हृदय कोमल होता है, चाह वाले का कठोर होता है।
संतोष
जिस घर में उल्लू या कबूतर आने लगें, तो वह घर रहने के लायक नहीं रहता है क्योंकि उन उल्लू कबूतर जैसे परिणाम घर वालों के होने लगते हैं।
परिवार
कितनी भी विपरीतता आये, पर आप विचलित मत होना क्योंकि लोगों का काम ही इतना है कि आपको निर्बल कर दें, संकट आते ही इसलिए हैं कि आप निर्बल हो जाओ, लोग आलोचना भी करेंगे कि आप निर्बल हो जाओ, पर आप निर्बल मत होना आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा।
पुरुषार्थ
जोंक खून को और चिंता बुद्धि को चूस लेती है।
मन
चेहरा आपके अन्तःकरण के भावों को बता देता है। वैरागी का चेहरा अलग, कामी का अलग और रागी का चेहरा अलग दिखता है जन्म लेना और देना पशु भी जानते हैं, पर इनके चक्र से छूटना केवल मनुष्य ही जानता है।
अनासक्ति
साबुन शारीरिक मैल व ज्ञान मानसिक मैल दूर करता है अतः स्नान की भाँति प्रतिदिन ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
ज्ञान
ज्ञानी अपने से बड़े ज्ञानी के समक्ष अपना ज्ञान लुटाता नहीं उनका ज्ञान लूटना चाहता है।
ज्ञान
ज्ञान शून्य वैराग्य अन्दर राग को जन्म देता है।
ज्ञान
जिस ज्ञान का असर हमारे चारित्र पर नहीं होता है, वह ज्ञान हमारे कुछ काम का नहीं है।
ज्ञान
पानी कीचड़ भी करता है और उसको साफ भी करता है उसी प्रकार ज्ञान जब अहंकार की धूल के साथ होता है तो कीचड़ करता है और चारित्र के साथ होता है तो भगवान् बनाता है।
ज्ञान
आज समय विपरीत है, तपस्वी की भी ज्ञान के बिना कोई कीमत नहीं होती है।
ज्ञान
संसार में ज्ञान से बड़ा सुख नहीं है और अज्ञान से बड़ा कोई दुःख नहीं है।
ज्ञान
ज्ञानी छुपके बैठता है लेकिन ज्ञान का प्रकाश उसे जाज्वल्यमान कर देता है।
ज्ञान
ज्ञानी सुनता समझता अधिक है, बोलता कम है। जिन्दगी जीने मिली मात्र सोचने नहीं।
ज्ञान
जिन्दगी तेरे ख्वाब भी कमाल के हैं, तू गरीबों को उन महलों के स्वप्न दिखाती है, जिसमें अमीरों को नींद नहीं आती है।
विविध
जिन्दगी में कई मुश्किलें आती हैं और आदमी जरा सी बात में घबराता है। न जाने हजारों काँटों के बीच रहकर भी एक फूल रोज कैसे मुस्कुराता है ॥
पुरुषार्थ
दिन की शुरूआत में हमें लगता है कि जिन्दगी में पैसा बहुत जरूरी है, पर दिन ढलने पर हमें पता चलता है कि जिन्दगी में शान्ति सुकून जरूरी है।
संतोष
जरूरत के अनुसार जिंदगी जियो अपेक्षाओं के अनुसार नहीं क्योंकि जरूरत तो भिखारियों की भी पूरी हो जाती है और अपेक्षायें बादशाहों की भी अधूरी रहती हैं।
संतोष
मैं जिन्दगी में हर किसी को अहमियत देता हूँ क्योंकि जो अच्छे होंगे वो साथ देंगे और जो बुरे होंगे वो सबक देंगे।
संगति
जीवन एक पुष्प है और सबसे प्रेम करना उसका रस है 'योगी न बनो पर उपयोगी अवश्य बनो'।
चरित्र
जीवन कितना ही बड़ा हो पर समय की बर्बादी से बहुत छोटा हो जाता है।
समय
आपके जीवन में आजादी नहीं है तो आप उस शरीर की तरह हैं जिसमें से आत्मा गायब है।
विविध
ऐसे जियो कि दूसरे आपसे जीना सीखें।
चरित्र
दूसरों के अधिकारों की सुरक्षा करना मनुष्य के जीवन का सबसे अच्छा अंत है।
चरित्र
जीवन वही श्रेष्ठ है, जहाँ जीना भारभूत न हो, जीने में प्रसन्नता हो।
संतोष
जीवन में हानि-लाभ का पैमाना दुःखी-सुखी होना है। यदि दुःखी हुए तो हानि हुई, दुःखी नहीं हुए तो हानि नहीं हुई समझना चाहिए।
संतोष
जिसे तनाव में डालना हो, उसे जिम्मेदारियाँ सौंप दो। खाली गाड़ी आवाज ज्यादा करती है व भरी शान्त निकल जाती है, ऐसे ही कोई ज्यादा बोले तो उसे समझाओ मत, जिम्मेदारी सौंप दो वह अपने आप शान्त हो जायेगा।
वाणी
खरीद सकते उन्हें तो अपनी जिन्दगी देकर भी खरीद लेते। मगर कुछ लोग कीमत से नहीं किस्मत से मिलते हैं ॥
विविध
कितनों की तकदीर बदलनी है तुम्हें, कितनों को रास्ते पर लाना है तुम्हें। अपने हाथों की लकीरों को मत देखो, इन लकीरों से भी आगे जाना है तुम्हें ॥
पुरुषार्थ
अजीब है न हमारे देश का संविधान, गीता पर हाथ रखकर कसम खिलाई जाती है सच बोलने के लिए, मगर गीता पढ़ाई नहीं जाती सच का ज्ञान कराने के लिए।
विविध
अगर दुनिया में मेहनत की कदर होती तो गधा ज्यादा इज्जतदार होता।
विविध
भोजन की अपेक्षा कषाय और वासना का उपवास कठिन है।
संयम
दुःखी रहने के दस कारण—१. देरी से सोना-देरी से उठना, २. लेन-देन का हिसाब न रखना, ३. किसी के लिए कुछ न करना। ४. स्वयं की बात को ही सत्य मानना। ५. किसी का भी विश्वास न करना। ६. कोई भी कार्य समय पर न करना, ७. बिना कारण झूठ बोलना, ८. बिना माँगे सलाह देना ९. बीते हुए सुख को बार-बार याद करना। १०. हमेशा अपने लिए सोचना।
मन
अपने दुःख दूर हो सकते हैं, यदि दूसरे के दुःखों से तुलना कर लें तो।
संतोष