Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 54

सज्जनों का काम ट्रेफिक पुलिसवत्

48 सूत्र

जिनका भोजन पात्र के लिए है, धन का उपार्जन दान के लिए है और जीवन धर्म के लिए है, वे मनुष्य स्वर्गगामी देव होते हैं।
दान
स्वार्थ ही नर्क बनाता है।
अनासक्ति
वृक्ष अपने काटने वाले को भी छाया देता है।
दान
उपकार करके प्रत्युपकार न चाहना सज्जनता है।
दान
उपकार करना सबसे बड़ा धर्म है, कार्य निपुणता सबसे बड़ा अर्थ है, सुपात्र को दान देना सबसे बड़ी तृप्ति है तथा वैराग्य सबसे बड़ी मुक्ति है।
दान
सेवा करने से हृदय शुद्ध होता है अहंकार दूर होता है और बहुत शान्ति मिलती है भारतीय आदर्श भी है सेवा और त्याग।
दान
दूसरों में महानता देख पाना और उन्मुक्त हृदय से उन्हें उसका गौरव देना मनुष्य की महानता की कसौटी है।
विनम्रता
हाथ में श्रेष्ठ संयमोपकरण, शिर से गुरु चरणों में प्रणाम, मुख में सत्यवाणी, विजयी भुजाओं में अतुल बल, हृदय में पवित्रता, ईश्वर के ध्यान में तत्पर करा देने वाला शास्त्र अध्ययन; ये सब ऐश्वर्य के बिना ही स्वभावतः महापुरुषों के आभूषण हैं।
चरित्र
यदि झुर्रियाँ हमारे माथे पर पड़नी ही हैं तो भी उन्हें हृदय में मत पड़ने दो। उत्साह को कभी वृद्ध नहीं होना चाहिए।
पुरुषार्थ
अपकार करने वालों को यदि बदला देना चाहते हो तो उपकार दो, इसमें तुम्हारी विलक्षण विजय होगी। वर्तमान परिणमन पर ध्यान दो।
क्षमा
जो लोग गर्भपात करते हैं वे जन्म देकर सन्तान हीनों को देकर तीनों का भविष्य उज्ज्वल कर सकते हैं।
अहिंसा
भगवन् मुझे सम्पत्ति के साथ सद्बुद्धि भी देना जिससे मैं कुँए के पानी की भाँति उसका सदुपयोग कर सकूँ।
धन
संतों का काम ट्रेफिक पुलिस के समान है, जो समाज के गतिरोधों को दूर करता है।
धर्म
किए गये उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाते, कभी इस भव में तो कभी अगले भव में फल अवश्य देते हैं।
कर्म
बिना कारण ही जो उपकार किए जाते है उनका फल अवश्य मिलता है।
दान
किसी को कुछ देने की इच्छा हो तो आत्म विश्वास जगाने वाला प्रोत्साहन सर्वोत्तम उपहार रूप में दें। ''उपहार का आदान–प्रदान मैत्री को मजबूत करता है।''
दान
कभी–कभी उपहार हमारी पसंद के विपरीत भी हो सकता है किन्तु हमे उपहार धैर्य व प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिए।
संतोष
अच्छा काम करते रहो कोई सम्मान करे या न करे, सूर्य का उदय तब भी होता है जब करोड़ों लोग सोये होते हैं।
पुरुषार्थ
सद्व्यवहार में शक्ति है, जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है। ''दृढ़ इच्छा शक्ति ही व्यक्ति को महान् बनाती है।''
चरित्र
कदाचित् भाग्य की प्रतिकूलता से माता भी विकार को प्राप्त हो जावे परन्तु अच्छी तरह की गई वृद्ध सेवा किसी भी देश व किसी भी काल में विकार को प्राप्त नहीं होती है।
दान
परोपकारी, सदाचारी दूसरे के हितार्थ अपनी आपत्ति की भी परवाह नहीं करता है।
दान
जब किसी जरूरतमंद की आवाज आप तक पहुँचे तो परमात्मा को धन्यवाद देना कि उसने अपने भक्त की मदद के लिए आपको चुना, वरना वो तो सबके लिए अकेला ही काफी है।
दान
मदद करने के लिए सिर्फ धन की ही नहीं एक अच्छे मन की भी जरूरत होती है।''जो सादगी में महत्त्व है, भलाई है, वह दौलत में नहीं'' जो हम प्राप्त करते हैं उससे हमारा जीवन बनता है तथा जो हम देते हैं उससे दूसरों का जीवन बनता है अत: अपने साथ–साथ दूसरों का जीवन भी बनाएँ।
दान
साधु दयालु और पवित्र होते हैं, वे अपकार होने पर भी उपकार करते हैं।
दान
दिल से दूसरों की सेवा करो तो दुआओं का दरवाजा खुल जायेगा।
दान
जो व्यक्ति रोगी, दु:खी, गुरु, माता–पिता और वृद्धजनों की सेवा करता है वह नियम से मुक्ति लक्ष्मी को प्राप्त करता है। कहा भी है ''सेवा करो मेवा पाओ''
दान
जब हम एक दूसरे की मदद करने या उन्हें समझाने मुड़ते हैं तो हम अपने दुश्मनों की संख्या कम कर देते हैं।
दान
जिन्दगी, धन और सत्ता के संचय का नाम नहीं है, बल्कि आशीर्वादों के मोती एकत्रित करने का नाम है, जहाँ धन और सत्ता की प्राप्ति के लिए शोषण और जुल्म अनिवार्य है वहाँ आशीर्वादों के मोती बटोरने के लिए किसी को पीड़ित करने की नहीं बल्कि दूसरों की पीड़ा हरने की जरूरत है।
दान
गुण रहित शरीर प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है, इसका एक ही महान् गुण है कि यह परोपकार का साधन है।
दान
करुणा से आर्द्र सज्जन सभी के निःस्वार्थ बन्धु होते हैं।
दान
अपने विनाश की ओर जाने वाले शत्रुओं को भी सज्जन दयालुता वश उपदेश देते हैं।
दान
ठीक समय पर किया हुआ थोड़ा सा भी कार्य बहुत उपकारी होता है और समय बीतने पर किया हुआ महान् उपकार भी व्यर्थ हो जाता है।
समय
सरकार का उचित कार्य लोगों के लिए अच्छे कार्य कर सकना सरल बनाना और बुराई कर सकना कठिन बनाना है।
विविध
मनुष्य को चाहिए कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसको बिना पूछे भी अच्छी अथवा बुरी, कल्याण करने वाली या अनिष्ट करने वाली, जो भी बात हो बता दें।
संगति
कठिनाइयों वाले लक्ष्य को सहायकों वाला व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है।
संगति
अपने कल्याण के साधन के इच्छुक सुयोग्य व्यक्ति भी सहायक के बिना उसे सिद्ध करने में कुशल नहीं हो पाते हैं।
संगति
साहस और धैर्य ऐसे गुण हैं जिनकी कठिन परिस्थितियों में बड़ी आवश्यकता होती है। संकट में साहस का होना आधी मंजिल तय कर लेना है।
पुरुषार्थ
अगर मेरे पास बहुतेरे साधन होते तो मैं कितनी ज्यादा सेवा कर सका होता, इस उधेड़बुन में पड़ने की अपेक्षा जो साधन आज तुम्हारे पास मौजूद हैं उनके द्वारा की गयी जरा सी मदद भी कहीं कीमती है।
दान
माँगने पर देना अच्छा है लेकिन आवश्यकता अनुभव करके, बिना माँगें देना और भी अच्छा है।
दान
संतों के द्वारा दिया गया संताप भी भला होता है और दुष्टों के द्वारा दिया गया सम्मान भी बुरा होता है। सूर्य तपता है तो जल की वर्षा भी करता है परन्तु दुष्टों के द्वारा दिया गया भक्ष्य भी मछली के प्राण ले लेता है।
संगति
न तो कोई इतना धनाढ्य है कि उसे दूसरे की सहायता की आवश्यकता न हो और न ही कोई इतना दरिद्र है कि किसी भी रूप में अपने साथियों के लिए उपयोगी सिद्ध न हो सके।
संगति
निश्चिन्त हो जाने का अर्थ है असावधान हो जाना।
विवेक
व्यक्ति बहुत प्रत्युपकार करने पर भी पूर्व उपकारी के समान शोभा नहीं पाता है क्योंकि एक तो उपकृत होने पर उपकार करता है जबकि अन्य तो निष्कारण उपकार करता है।
दान
अपने उपाय से ही उपकारी का उपकार करना चाहिए उपकार बड़ा है या छोटा–इस प्रकार का विद्वानों का विशेष आग्रह नहीं होता है।
दान
प्रवीणता एवं आत्म विश्वास अविजित सेनाएं हैं।
पुरुषार्थ
जिस धनी पुरुष का जन्म याचक जन की इच्छा को पूर्ण करने के लिए नहीं है, उस पुरुष से ही यह पृथ्वी अत्यन्त भार वाली है न कि पेड़ों, पर्वतों या समुद्रों से।
दान
जब महान् व्यक्ति संघर्ष में अकेले होते हैं तब वे सशक्ततम होते हैं।
पुरुषार्थ
यह महापुरुषों का स्वभाव है कि वे आपत्ति में पड़े हुए लोगों से सहानुभूति रखते हैं।
दान