Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Non-violence

अहिंसा

187 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

जो लोग गर्भपात करते हैं वे जन्म देकर सन्तान हीनों को देकर तीनों का भविष्य उज्ज्वल कर सकते हैं।
अहिंसा
संसार के सारे विवादों को 'जियो और जीने दो' का सूत्र मिटा सकता है।
अहिंसा
मार्ग में जीव बचाकर पाँव रखना चाहिए, वस्त्र से छान कर पानी पीना चाहिए, शास्त्रानुसार हितकारी थोड़ी वाणी बोलना चाहिए, पवित्र मन से सदाचार का पालन करना चाहिए।
अहिंसा
अहिंसापूर्वक सत्य का आचरण करके आप संसार को अपने चरणों में झुका सकते हैं।
अहिंसा
दया, करुणा व अहिंसा से विहीन शास्त्र नहीं शस्त्र हैं।
अहिंसा
बेटे को शेर पकड़े तो बचाते हैं, उसी प्रकार दूसरे जीवों की रक्षा करना चाहिए।
अहिंसा
जब तक मनुष्य या पशु की आँख में आँसू है तब तक अहिंसा और सत्य का सिद्धान्त अधूरा है। श्रावक की बंधी मुट्ठी लाख की साधु की खुली मुट्ठी आशीर्वाद की।
अहिंसा
किसी इंसान को दुःख देना इतना आसान है जितना समुद्र में पत्थर फेंकना, पर कोई यह नहीं जानता कि वो कितनी गहराई तक गया होगा?
अहिंसा
जो किसी को दुःख नहीं देता है उसके दर्शन मात्र से भी पुण्य होता है।
अहिंसा
डॉक्टर मुख पर पट्टी बाँधकर शल्यक्रिया करता है उसी प्रकार आप भी दूसरों की रक्षा करो अपनी सुरक्षापूर्वक।
अहिंसा
मांसाहार उनके लिए है जो लड़ेंगे और मरेंगे, शाकाहार उनके लिए है जो सुखमय जीवन जियेंगे एवं विचारशील बनेंगे। खून से कपड़ा व मन दोनों गंदे होते हैं। जरा विचार करो जब आपका अपना सगा सम्बन्धी समय पर घर नहीं आता, तो आप सिर पीट-पीट कर रोते हो, तो फिर दूसरे जीवों को मार कर उनका मांस कैसे खाते हो? क्योंकि कहीं पर उनके बच्चे अपने माँ-बाप का अथवा माँ-बाप अपने बच्चों का इन्तजार करते होंगे, अरे! जब आपको जरा सा काँटा चुभता है तो आप उसके दर्द में चीखते हो, तो फिर आपका हृदय दूसरे प्राणी के प्राण लेते समय क्यों नहीं चीखता है?
अहिंसा
जगत् के लोग कहते हैं कि शत्रु को शत्रु की भाँति देखो, पर जैन संस्कृति कहती है कि शत्रु को भी मित्र की भाँति देखो।
अहिंसा
दूसरों की आँखों में आँसू भरने वाले क्यों भूल जाते हैं कि उनकी भी दो आँखें हैं।
अहिंसा
दीन, हीन, दुर्बल, अंधे, बहरे, पंगु, विकलांग और वृद्धों का उपहास नहीं करना चाहिए।
अहिंसा
प्राणियों की हिंसा व मांस भक्षण से विरक्त होना सैकड़ों यज्ञों में आहुति देने से बढ़कर है।
अहिंसा
प्रेम का अर्थ दूसरों को सुख पहुँचाना है और अहिंसा का अर्थ दूसरों को दुःख नहीं पहुँचाना है।
अहिंसा
जो मनुष्य सब जीवों पर कृपा तथा दया दिखलाता है, उसे उन पाप परिणामों को नहीं भोगना पड़ता, जिन्हें देखकर ही आत्मा काँप उठती है।
अहिंसा
शब्दों में दयाभाव रखने से आत्म विश्वास बढ़ता है, विचारों में दया रखने से गंभीरता आती है, हृदय में दया रखने से प्रेम बढ़ता है।
अहिंसा
जिनेन्द्र भगवान् ने एक बूँद जल में जो जीव बतलाये हैं, वे यदि कबूतर के बराबर होकर उड़े तो जम्बूद्वीप में न समायें अत: रोग और हिंसा से बचने के लिए पानी छानकर पियें।
अहिंसा
संसार के सभी रस करूण रस के चरण चूमते हैं।
अहिंसा
एक अहिंसा ही प्राणियों का सुख, कल्याण अथवा मोक्ष प्रदान करती है, अहिंसा विहीन तप, श्रुत और संयम का समूह भी वह सुख नहीं प्रदान करता है।
अहिंसा
दया रूपी कौस्तुभ मणि जिसके हृदय में विद्यमान है, धर्म की उन्नति से हर्षित होने वाला वही पुरुषोत्तम श्रेष्ठपुरुष है।
अहिंसा
गिरते हुये को गिराने के लिये टक्कर नहीं रोकने के लिए सहारा दें, आप प्रेम दें दूसरे आपसे नफरत करना छोड़ देंगे।
अहिंसा
रत्नों में हीरा, वृक्षों में चन्दन, पशुओं में गाय, और धर्म में अहिंसा सर्वश्रेष्ठ है।
अहिंसा
जो व्यवहार तुम स्वयं नहीं चाहते हो उसे औरों के साथ भी मत करो।
अहिंसा
मन की अहिंसा जब शब्दोंमेंउतरती है तो वह सत्य कहलाती है, और आचरण में उतरती है तो परोपकार कहलाती है।
अहिंसा
धर्मात्मा इस बात का अवश्य ख्याल रखता है कि कहीं मेरी खुशी में किसी की आँखों में आँसू तो नहीं छिपे हैं।
अहिंसा
धर्मात्मा दयालु ही होगा, सम्यग्ज्ञानी वैरागी होता ही है।
अहिंसा
घृणा को केवल प्रेम से जीता जा सकता है।
अहिंसा
क्या आप दूसरों के कष्टों को अपना कष्ट समझते हैं?
अहिंसा
प्रत्येक समय संवेदनशील बने, अपने प्रति सहनशील बने, प्राणी मात्र पर स्नेहशील बने।
अहिंसा
पानी पीना छानकर, कछु कष्ट न होय। जीव दया हो जायगी, पाप लगे न कोय।।
अहिंसा
यदि अपने शरीर पर लगी हुई सूक्ष्म चींटी भी दुःख देती है तो फिर ऐसा जानने वाले लोगों के द्वारा बाण से मृग को क्यों मारा जाता है, 'शिकार' क्यों किया जाता है?
अहिंसा
दया से परिपूर्ण हृदय वाला जो गृहस्थ छने हुए जल से सब कार्य करता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है।
अहिंसा
सत्पुरुषों ने जैनधर्म के नीति मार्ग में ऐसा ही कहा है कि पानी का छानना धर्म है, जैनियों का यह धर्म तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
अहिंसा
जिनेन्द्र भगवान ने पृथ्वी पर जीव दया की सिद्धि के लिए सघन वस्त्र से पानी छानने को पुण्य कहा है।
अहिंसा
जैनधर्म में निपुण तथा दयालु मनुष्यों को पानी छानने की शुभ क्रिया में प्रमाद नहीं करना चाहिए।
अहिंसा
जो छनाजल पीते हैं वे भव्य एवं बुद्धिमान है, विना छना जल पीने वाले पाप से विकल हृदय पुरुष पशु तुल्य हैं।
अहिंसा
छने, निर्मल, णमोकार मन्त्र से पवित्र किये हुए जल से जिनपूजा के लिए विधि पूर्वक प्रतिदिन स्नान करना चाहिए।
अहिंसा
नदियों और तालाबों का जो गहरा पानी, वायु तथा घाम से अच्छी तरह प्रासुक है, उस जल में प्रवेश कर स्नान के योग्य कहीं-कहीं माना गया है।
अहिंसा
वायु से ताड़ित, पत्थर तथा घटीयन्त्र से ताड़ित एवं सूर्य की किरणों से सन्तप्त वापिका के जल को मुनि प्रासुक मानते हैं, यद्यपि उपर्युक्त लक्षण वाला जल आगम में प्रासुक कहा गया है तथापि अत्यावश्यकता वश उससे स्नान ही करना चाहिए, उसे विना छाने पीना नहीं चाहिए।
अहिंसा
जो वस्त्र छत्तीस अङ्गुल लम्बा और चौबीस अङ्गुल चौड़ा है, उसे दुहरा कर पानी छानना चाहिए।
अहिंसा
वस्त्र के मध्य आये हुए जीवों को जल के मध्य में छोड़(जीवानी) कर जो पानी पीता है वह उत्कृष्ट गति को प्राप्त होता है।
अहिंसा
छना हुआ पानी एक मुहूर्त(48मिनिट) तक, प्रासुक दो पहर(6 घण्टे) तक और अत्यधिक गर्म किया हुआ पानी दिन-रात अर्थात् चौबीस घण्टे तक चलता है, पश्चात् उसमें सम्मूर्छन जीव उत्पन्न हो जाते हैं।
अहिंसा
एक मुहूर्त के बाद पानी को फिर से नहीं छानना, अथवा सछिद्र या मलिन वस्त्र से छानना और जीवानी को अन्य जलाशय में डालना, जलगालन व्रत में योग्य नहीं माना गया है।
अहिंसा
इस प्रकार जो सदा पानी छानने में यत्न करते हैं, वे धर्मस्नेही भव्य जीव निरन्तर सुखी रहते हैं।
अहिंसा
जिस जलाशय से यत्न पूर्वक छानकर जल लाया गया है, ज्ञानी पुरुष जिवानी को उसी जलाशय में डालें।
अहिंसा
विना छने जल में असंख्यात जीव होते हैं, अत: विना छना पानी पीने वाला पुरुष पाप का अर्जन करता है।
अहिंसा
जिनेन्द्र भगवान् ने एक बूँद मात्र जल में जो जीव बतलाये हैं, वे यदि कबूतर के बराबर हो कर उड़ें, तो जम्बूद्वीप में न समावेंगे।
अहिंसा
विपदाओं के दुःख से, यदि चाहो निज त्राण। हानि अन्य की छोड़कर, करो स्व-पर कल्याण।।
अहिंसा
यज्ञ करके पशुओं को मारकर रुधिर का कीचड़ करके अगर स्वर्ग में जाया जाता है तो नरक कैसे जाया जायगा?
अहिंसा
जो हिंसा करता है उसका ध्यान, अभिषेक, दान, सत्कर्म सभी निष्फल होते हैं।
अहिंसा
यदि हम दया के विना चलते हैं तो वह मोक्ष मार्ग नहीं मोह मार्ग है।
अहिंसा
कर्म के उदय से अनेक भवों में दुःख भोगने वाले जीवों के प्रति दया होना अनुकम्पा कहलाती है।
अहिंसा
जो जीव दुर्भाग्य से दुःखी है, तीव्र असाता के उदय में घृणास्पद है, ऐसे जीवों से भी ग्लानि नहीं करना निर्विचिकित्सा अङ्ग है।
अहिंसा
मन में ऐसा भाव भी नहीं आना चाहिए कि मैं सम्पत्तियों का घर हूँ, ये विपत्तियों का घर है, ये हमारे जैसा नहीं हो सकता, किन्तु इससे विपरीत सोचें कि कर्मोदय से जितने भी त्रस-स्थावर जीव हैं, वे सब समान है, जैसे शूद्री के उदर से जन्मे दो बेटे एक विप्र के यहाँ पला, एक शूद्र के यहाँ पला, इस कारण उनमें जाति भ्रम हो गया, लेकिन वास्तव में दोनों शूद्र की सन्तान हैं, उसी प्रकार वेदनीय कर्म के दो भेद हैं एक सातावेदनीय एक असातावेदनीय।
अहिंसा
एक शाम बूढ़ी गाय धीरे-धीरे चलकर घर की ओर आ रही थी, इतने में एक शेर सामने आ गया और गाय से कहा मैं बहुत दिनों से भूखा हूँ अतः आज अपनी भूख शांत करूँगा, तब गाय ने शेर से कहा! मैं अपने बछड़े को दूध पिला आऊँ फिर तुम मुझे खा लेना, शेर हँसा और बोला! कि तुम मुझे धोखा देना चाह रही हो, गाय ने कहा मैं बछड़े की सौगन्ध खाकर कहती हूँ, दूध पिला कर अवश्य आ जाऊँगी, शेर ने बोला ठीक है, जैसे ही गाय घर पहुँची और बछड़े से दूध पीने को कहा, तो बछड़े ने देर से आने का कारण पूँछा, बताने पर उसने कहा, कि आपके स्थान पर मैं जाऊँगा, आग्रह करने पर भी उसने दूध नहीं पिया और दोनों शेर के पास चल दिए, एक के स्थान पर दो को आता देख शेर खुश हुआ, बछड़ा कहता है शेर पहले मुझे खायगा और माँ सींगों से उसे पीछे करके कहती है कि शेर पहले मुझे खायगा, गाय-बछड़े के प्रेम ने शेर का हृदय परिवर्तन कर दिया और उनका वात्सल्य देखकर दोनों को खाने का इरादा छोड़ दिया।
अहिंसा
जनता पार्टी के नेता श्री के-के- हेगड़े की पत्नि ने आचार्य विद्यानन्द जी को बतलाया था कि सौ वर्ष पहले की बात है, कि जैन परिवार में एक व्यक्ति ने शिकार कर दिया था तो समाज ने उसे जाति से बन्द कर दिया था, प्रभावशाली परिवार होने से दस हजार अन्य लोग भी वैष्णव बन गये थे, जिस दिन वे लोग जैन से वैष्णव बने थे, उस दिन वे लोग प्रति वर्ष जैन मन्दिर में पूजा पाठ करते हैं एवं सात्विक भोजन करते हैं, अतः एक व्यक्ति के पाप के पीछे अनेकों को वीतराग धर्म से वञ्चित नहीं करना चाहिए, प्रायश्चित्त प्रतिक्रमण से शुद्ध करना चाहिए।
अहिंसा
दुनिया के सब कार्य अहिंसा के लिये, चौराहे पर लाल बत्ती अहिंसा के लिये, आपस में दो टकरा न जाएँ इसलिए यातायात नियन्त्रक पुलिस अहिंसा के लिये, मजिस्ट्रेट अहिंसा के लिये, पुलिस, चिकित्सक, कानून व्यवस्था, विधानसभा, मन्त्री आदि सभी विभाग अहिंसा के लिये हैं।
अहिंसा
प्राणी मात्र के प्रति मित्रता, जो गुणों में अधिक उनके प्रति प्रमोद भाव, दुःखी जीवों के प्रति करुणा भाव और उद्दण्ड लोगों के प्रति माध्यस्थ भाव होना चाहिए।
अहिंसा
बिच्छू का आतङ्क- नदी किनारे पर बैठे हुये एक साधु ने देखा कि नदी के तीव्र प्रवाह में एक बिच्छू बहता जा रहा है, उसे देखते ही हृदय में अनुकम्पा का प्रवाह हुआ तत्काल नदी में उतर गये, बिच्छू को हाथ में उठा लिया, उसने हाथ में डङ्क मार दिया, पीड़ा के कारण बिच्छू हाथ से छूट गया, पुनः उठाया पुनः उसने हाथ में डङ्क मार दिया, लोगों ने कहा जब वह आपको बार-बार डङ्क मार रहा है तो उसको बहने दो, साधक ने इस बात को सुनकर उत्तर दिया, जब वह अपना स्वभाव नहीं छोड़ रहा है तब हम उसे बचाने का स्वभाव कैसे छोड़ें ?
अहिंसा
धर्म का सार सुनो और जीवन में उतारो, जो व्यवहार आपके लिए अच्छा नहीं लगता वैसा व्यवहार दूसरों के साथ भी कभी मत करो।
अहिंसा
महापुरुष विनम्र एवं दयालु होते हैं इसीलिए पार्श्वनाथ भगवान् ने दयार्द्र होकर नाग नागिनी को महामन्त्र सुनाया था।
अहिंसा
जब से खड़ा हूँ तब से कोई नहीं निकला- जङ्गल में साधु ध्यान कर रहे थे, तभी एक हिरन दौड़ता हुआ निकला, साधु का ध्यान बटा, उन्होंने देखा कि यह तो सताया हुआ है, अगर शिकारी ने आकर पूँछा तो क्या होगा, ऐसा सोच ही रहे थे कि शिकारी आ गया, साधु तत्काल खड़े हो गये जैसे ही शिकारी ने पूँछा कि यहाँ से कोई हिरन निकला है? तो साधु ने कहा जब से मैं खडा हूँ, तब से कोई नहीं निकला। जब हिरण निकला था तब साधु बैठे हुये थे, अर्थात् युक्ति पूर्वक जीव की रक्षा की और अपने सत्यधर्म की रक्षा की।
अहिंसा
शिकारी ने हाथ में जिंदा चिड़िया लेकर साधु से पूछा ये मरी है या जिन्दा? साधु ने कहा मरी है, वहाँ साधु का अभिप्राय झूठ बोलने का नहीं था चिड़िया के प्राण बचाने का था इसलिए झूठ होते हुए भी सत्य है।
अहिंसा
पञ्चेन्द्रिय को प्राणी, साधारण वनस्पति को सत्त्व, पृथ्वी–जल–अग्नि–वायु को भूत एवं विकलेन्द्रियों को जीव कहते हैं।
अहिंसा
व्रत रहित दयालु पुरुष को देवगति सुलभ होती है और दया रहित व्रती पुरुष को नरकगति सुलभ होती है, निर्दय मनुष्य चिरकाल तक तपस्या करे, खूब व्रत करे, दान देवे किन्तु उस तप, व्रत और दान के फल से वह दरिद्र ही रहता है, उसे उनका किञ्चित भी फल प्राप्त नहीं होता और केवल दया को पालने वाला उसके फल से पुष्ट होता है, हे मोक्ष के इच्छुक! यदि तेरा मन दया से भरा है, तो उपवास आदि के द्वारा व्यर्थ ही कष्ट उठाता है, तुझे दयाभाव से ही सिद्धि मिल जायेगी, यदि तेरा मन दया से शून्य है, तो तु मुक्ति के लिए व्यर्थ ही क्लेश उठाता है क्योंकि कोरे कायक्लेश से मुक्ति नहीं मिलती, जैसे मठा से सींचे गये प्रदेश में घास नहीं उगती वैसे ही दयालुपुरुष पर किसी असहिष्णु व्यक्ति के द्वारा लगाया गया हिंसा–चोरी आदि का दोष न उसकी अपकीर्ति का कारण होता है न दुर्गति का, बल्कि उल्टे गुणों को ही लाने में कारण होता है।
अहिंसा
हिंसा ही नरक का घोर द्वार है, हिंसा ही गहन अन्धकार है इसलिये समस्त प्राणियों की दया से युक्त एक अक्षर का ज्ञान भी अच्छा है।
अहिंसा
परमार्थ से संयम वही है जहाँ दयाधर्म है।
अहिंसा
पाश्चात्य संस्कृति कहती हैं विश्व एक व्यापार है, सिर्फ मनुष्य को जीने का अधिकार है, भारतीय संस्कृति कहती है विश्व एक परिवार है सबको जीने का अधिकार है।
अहिंसा
यमपाल का संयम– राजा ने अष्टान्हिक में सभी को हिंसा न करने का आदेश दिया, राजकुमार ने राजाज्ञा का उल्लङ्घन करके एक भेड़ को मारकर खा लिया, राजा को पता चला, तो राजा ने राजकुमार को फाँसी की सजा देने का आदेश दिया, चाण्डाल ने चतुर्दशी के दिन हिंसा का त्याग किया था जिसके कारण फाँसी देने से मना कर दिया, राजा ने दोनों को बाँधकर तालाब में फैकने का आदेश दिया, चाण्डाल के चतुर्दशी को हिंसा के त्याग के नियम के प्रभाव से, देवों ने सिंहासन की रचना की एवं राज कुमार को जल जन्तु खा गये।
अहिंसा
वैज्ञानिकों के अनुसार अनछने पानी की एक बूँद में 'छत्तीस हजार चार सौ पचास' जीव पाये जाते हैं किन्तु जैनाचार्यों के अनुसार असंख्यात जीव होते हैं।
अहिंसा
पंजाब में एक मुस्लिम भाई रोज मुर्गी लाकर घर में काटता था, उनकी पीड़ा पर उसको आनन्द आता था, उसके तीन बच्चे थे, एक बच्चे ने छोटे भाई पर छुरी चलाई, वह चिल्ला कर मर रहा था, यह आनन्द ले रहा था, माँ के डर से वह छत से गिर कर मर गया, माँ छोटे बच्चे को टब में नहला रही थी, उसको छोड़कर ऊपर तक गई तब तक छोटा बच्चा टब में गिरा और डूबकर मर गया। इस प्रकार उसे हिंसा का फल उसी जन्म में मिल गया।
अहिंसा
षट्काय में स्वयं भी आते हैं, विषय कषाय से स्वयं का घात हो रहा है इस ओर ध्यान ही नहीं है।
अहिंसा
कैसे चलें, कैसे बैठें, कैसे खड़े हों, कैसे सोयें, कैसे खाएं जिससे कि पाप का बन्ध न हो? देख कर चलें, यत्नाचार पूर्वक बैठें, यत्नाचार पूर्वक खड़े हों, यत्नाचार पूर्वक सोयें, यत्नाचार पूर्वक खाएं अर्थात् प्रत्येक कार्य में जीव रक्षा का ध्यान रखें। इससे पाप का बन्ध नहीं होगा।
अहिंसा