Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Non-violence

अहिंसा

187 सूत्र · पृष्ठ 3 / 3

दूसरों को हमारे माध्यम से व्यवधान न हो यह भावना भी अहिंसा है।
अहिंसा
अभय दान प्रदाता मृगसेन धीवर- अवन्ती देश के अन्तर्गत शिरीष नामक ग्राम में मृगसेन नाम का धीवर रहता था। क्षिप्रा नदी में मछली मारने जाते समय यशोधर मुनिराज से जाल में आई प्रथम मछली न मारने का नियम लिया, एक बड़ी मछली पाँच बार जाल में आई पर उसने नहीं पकड़ा, खाली हाथ आता देख कर उसकी पत्नी 'घण्टा' ने नाराज होकर दरवाजा बन्द कर लिया। धीवर घर के बाहर पुराने काष्ठ पर 'णमोकार मन्त्र' पढ़कर सो गया, रात में सर्प के काटने से मर गया, पत्नी भी अगले जन्म में ये ही मेरे पति हों ऐसा निदान कर, साथ में उसी चिता में जलकर मर गयी। विशाला नगरी में राजा विश्वम्भर राज करते थे, रानी का नाम विश्वगुण था। वहीं गुणपाल सेठ एवं धनश्री सेठानी पुत्री के साथ रहते थे। धनश्री के गर्भ में मृगसेन धीवर का जीव आया। राजा से नर्मभर्म मन्त्री ने अपने पुत्र नर्मधर्म के लिए गुणपाल की पुत्री से विवाह करवाने के लिए कहा, सेठ अपनी स्त्री को अपने मित्र श्रीदत्त के पास छोड़कर पुत्री एवं कुछ धन लेकर कौशाम्बी में रहने लगा। आहार को आये शिवगुप्त व मुनिगुप्त में से छोटे मुनि ने धनश्री को देखकर शिवगुप्त मुनि से कहा ''इसके गर्भ में कोई अभागा आया है'', शिवगुप्त मुनि बोले ''तुम्हारा अनुमान गलत है, इसके गर्भ में धर्मात्मा पुत्र आया है और उसका विवाह राजपुत्री से होगा'', श्रीदत्त ने सुनकर ईर्ष्या वश पुत्र को मारने का विचार किया। प्रसव के समय धनश्री मूर्छित हो गयी। श्रीदत्त ने चाण्डाल को पुत्र देकर मारने को कहा, वह सुरक्षित स्थान पर छोड़ कर चला गया। श्रीदत्त का बहनोई इन्द्रदत्त माल बेचने आया, ग्वालों से सुनकर पुत्र को ले गया। श्रीदत्त को पता चला तो वह मायाचारी से बहन व भाञ्जे को लाकर पुनः चाण्डाल को लोभ देकर मारने को दिया, उसने दयावश नदी के किनारे गुफा में छोड़ दिया, वहाँ से ग्वालों का मुखिया गोविन्द ले गया। एक दिन श्रीदत्त घी खरीदने आया और सन्देश देने के बहाने धनकीर्ति को घर भेजा और पत्र में लिख दिया कि 'पत्र वाहक को विष देकर मार देना'। धीवर का जीव 'धनकीर्ति' पत्र गले में बाँधकर चला, रास्ते में थकान दूर करने एक वृक्ष के नीचे सो गया, फूल तोड़ने आई 'मछली का जीव' अनङ्गसेना वेश्या ने वह पत्र पढ़ा और आँख के काजल से उन शब्दों को बदल दिया, कि 'प्रिय यदि तुम अपना स्वामी समझती हो और पुत्र महाबल तुम मुझे अपना पिता समझते हो तो पत्र वाहक के साथ पुत्री श्रीमती का विवाह कर देना। नींद खुलते ही उसने जाकर पत्र दिया, शुभमुहूर्त में श्रीमती के साथ उसका विवाह हो गया। श्रीदत्त को पता चला तो उसने गाँव के बाहर पार्वती के मन्दिर में उसको मारने के लिए व्यक्ति नियुक्त किया। आकर दामाद को पूजा की सामग्री देकर भेजा, रास्ते में साले 'महाबल' ने सामग्री लेली और मन्दिर गया तो महाबल मारा गया। हताश होकर पत्नी से दामाद धनकीर्ति को मारने को कहा, पत्नी ने साफ़ लड्डू विष मिश्रित व मैले लड्डू सादे बनाये और पुत्री से साफ़ लड्डू दामाद को व मैले लड्डू पिता को परोसने को कहकर नदी नहाने को चली गयी। पुत्री ने लज्जा वश मैले लड्डू पति को व साफ़ लड्डू पिता को परोस दिए, श्रीदत्त का मरण जान उसकी पत्नी ने भी विषैले लड्डू खाकर मरण किया। राजा ने धन कीर्ति के गुण व ब्रह्मचर्य की प्रशंसा सुनकर अपनी पुत्री की शादी कर व दहेज़ देकर राज श्रेष्ठी के पद पर नियुक्त किया। गुणपाल पिता अपने पुत्र के भाग्योदय को सुनकर पुत्र से मिला, कुछ दिन बाद सपरिवार यशोधर मुनि की वन्दना कर धनकीर्ति के पूर्व भव की कथा सुनी। धनकीर्ति पूर्व भव में धीवर था, घण्टा स्त्री इस भव में श्रीदत्त कि पुत्री श्रीमति वनी, मछली अनङ्गसेना वेश्या वनी, धनकीर्ति ने दीक्षा लेली। श्रीमति और अनङ्गसेना ने भी दीक्षा लेली, धनकीर्ति सन्यास पूर्वक प्राण त्याग कर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ और आगे केवली हो मोक्ष प्राप्त करेगें। श्रीमति और अनङ्गसेना भी स्वर्ग गयीं। सच है दया धर्म रुपी कल्पवृक्ष से मनोवाञ्छित फल मिलता है।
अहिंसा
सब जीवों की हिंसा का त्याग करना तप है और शान्तिपूर्वक सब दुःखों का सहना भी तप है।
अहिंसा
अभय दान- मनुष्य यदि अभयदान देने वाला है तो अन्य दान हो या न हो, क्योंकि अभयदान ही सब दानों में उत्तम दान है।
अहिंसा
जिस प्रकार तप के विना लोगों का शरीर व्यर्थ है, उसी प्रकार अभय दान के विना शेष दान व्यर्थ हैं।
अहिंसा
जो अभयदान देता है उसी ने समस्त श्रुत पढ़ा है, उसी ने परम तप तपा है और उसी ने समस्त दान दिए हैं।
अहिंसा
अभयदान से क्षणभर में विद्वानों से प्रशंसनीय एवं आपत्ति से रहित तीर्थंङ्कर व चक्रवर्ती की सम्पदाएँ प्राप्त की जाती हैं।
अहिंसा
''हजार जिह्वा वाले किसी भी व्यक्ति के द्वारा कल्पकाल तक अभयदान का फल नहीं कहा जा सकता है।''
अहिंसा
अनङ्गसरा से विशल्या- वज्रनाभि चक्रवर्ती की बेटी अनङ्गसरा को एक विद्याधर हरण करके ले गया, पत्नि के भय से जङ्गल में छोड़ गया, अनङ्गसरा तीन हजार वर्ष तक जङ्गल में रही, स्थान का परिमाण कर सल्लेखना ले ली थी, एक अजगर ने उसको निगल लिया, तभी पिता को मालूम हुआ, तब वे जङ्गल में लेने गये, सर्प को मारने की सोची, बेटी ने रोका और अभय दान दिलाया, जिसके फल से विशल्या हुयी, उसके स्नान का पानी औषधि के समान था, जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी थी तो विशल्या के आते ही वह निकल कर भाग गयी थी।
अहिंसा
धोबी और नाई दोनों मित्र थे, दोनों ने मिलकर धर्मशाला बनवाई धोबी ने लाकर मुनि महाराज को ठहरा दिया, नाई उन्हें भगाने लगा, दोनों आपस में लड़कर मरे धोबी सूकर एवं नाई शेर बना, मुनि महाराज गुफा में ध्यान कर रहे थे, शेर मुनि महाराज को खाना चाहता था एवं सूकर बचाना चाहता था, दोनों आपस में लड़कर के मरे सूकर अभय दान के प्रभाव से स्वर्ग गया, और शेर मारने के भाव से नरक गया।
अहिंसा
मुनियों के 28 मूलगुणों का पालन अभयदान के लिए है।
अहिंसा
दान और जीवरक्षण के बीच दान की अपेक्षा जीव रक्षण श्रेष्ठ है क्योंकि दान से मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है और जीवरक्षण से अविनाशी मोक्षपद को प्राप्त होता है।
अहिंसा
हिंसा और अहिंसा- व्रतादि के अनुष्ठान रूप निष्ठा से हीन भी व्यक्ति द्रव्य और भाव हिंसा के त्याग से निष्ठाशाली होता है और उत्कृष्ट निष्ठावाला भी व्यक्ति हिंसा करने से चाण्डाल से भी नीच होता है।
अहिंसा
उखली, चक्की, चूल्हा, जल का घड़ा, झाड़ू इनके कारण गृहस्थ को मोक्ष नहीं होता है।
अहिंसा
शोध के अनुसार नौ लाख जीवों की हिंसा एक बार के मैथुन में होती है और आगम में असंख्यात जीवों की हिंसा बतलायी हैं।
अहिंसा
लोग मन्दिर में दीप-धूप नहीं जलाते पर घरों में दहेज के लिए बहुओं को जला देते है।
अहिंसा
भ्रूण हत्या भी कत्लखाना है, प्रति वर्ष बावन लाख शिशुओं को मारा जाता है।
अहिंसा
बेटियों को लक्ष्मी कहने वाले लोग लक्ष्मी के कारण बेटियों का गर्भपात करवा देते हैं।
अहिंसा
दो लाख से अधिक स्त्रियों का प्रतिवर्ष मरण गर्भपात से होता है, अस्सी लाख बीमार रहती हैं एवं पाँच लाख गैर कानूनी गर्भपात से उत्पन्न हुयी समस्या से मर जाती हैं।
अहिंसा
जीवन भर माँस खाने वाली बाघिन और नागिन पाँचवे नरक तक जाती है, लेकिन स्त्री छठवें नरक तक जाती है।
अहिंसा
गर्भपात कराने वाली महिला, गर्भपात की सलाह देने वाली महिला, अनुमोदना करने वाले, अस्पताल जाकर कराने वाले पुरूष को भी छः महीने तक पूजा, आहारदान, वैयावृत्ति, जिनवाणी का स्पर्श, पढ़ना और धार्मिक अनुष्ठान नहीं करना चाहिए, क्योंकि असहाय मनुष्य की हत्या करने बाला महापापी है।
अहिंसा
माँ नहीं राक्षसी- जब सक्ङ्शन पम्प (यन्त्र) भ्रूण के पास पहुँचता है तब बालक की प्रतिमिनट एक सौ चालीस बार होने वाली हृदय की धड़कन बढ़कर दो सौ बार प्रति मिनट हो जाती है, अपने जीवन रूपी दीपक को बुझाने के लिये आ रहे औजारों से बचने के लिये भ्रूण पीछे हटता है, परन्तु उसका आवरण यन्त्रों से छिद कर बाहर निकलने लगता है, बालक के मस्तक और धड़ को झटके से अलग कर दिया जाता है, तब वेदना से चीख उठता है, यह है गूँगी चीख, फिर फोरसेप यन्त्र से दबाकर कठिन खोपड़ी को चूर कर दिया जाता है, अपने हाथ से अपनी सन्तान का गला घोटने वाली माँ, माँ नहीं राक्षसी है, कसाई बकरे को एक झटके में मार डालता है, लेकिल गर्भपात में कोमल अङ्गों को तीक्ष्ण औजारों से टुकड़े-टुकड़े करके मारा जाता है।
अहिंसा
कालसौकरिक कषायी ने हिंसा नहीं की, उसके पिता ने बहुत समझाया, उसने कहा हिंसा से जो दुःख होगा उसको तुम लोग बटाओगे? सबने हाँ कह दिया, उसने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली, कहा दुःख हो रहा है बटाओ, लोगों ने कहा बेटा दुःख तो तुम को ही भोगना पड़ेगा, हम संवेदना प्रकट कर सकते हैं, कालसौकरिक कषायी की इस घटना से उस सहित पाँच सौ कषायी अहिंसक बन गये थे।
अहिंसा
नेत्रगोचर जीवों को बचाकर गमन करने वाले मुनि के ईर्यासमिति होती है, यह ईर्यासमिति व्रतोंमें शुद्धि करने वाली मानी गयी है।
अहिंसा
समवसरण में ग्यारह गणधर, चौदह हजार मुनि, छत्तीस हजार आर्यिका, एक लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकायें थीं। महावीर का शुभ सन्देश जियो और जीने दो था।
अहिंसा
सुखी रहें सब जीव जगत् के, कोई कभी न घबरावे। नहीं सताऊँ किसी जीव को झूठ कभी नहीं कहा करूँ।
अहिंसा
आज हमें मानव मात्र का दुःख दर्द मिटाना है, क्योंकि हमें सत्य और अहिंसा का बिगुल बजाना है।
अहिंसा
संसार से मुक्ति दिलाने वाले अहिंसा पर्व को मनाते हैं और पटाखा जलाकर असंख्य जीवों को मारते हैं, यह धर्म विरुद्ध है।
अहिंसा
लोगों को तीर्थ नहीं अब अस्पताल, श्मशान एवं कत्लखानों के दर्शन को जाना चाहिए, तीर्थ यात्राएँ अभी तक जो चमत्कार नहीं कर सकीं, वह चमत्कार कत्लखाने कर दिखायेंगे, वहाँ रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य देखने के बाद शायद ही कोई मांसाहारी रह पायेगा।
अहिंसा
मुनि बैठने-उठने, सोने, हाथ-पैर फैलाने में, सङ्कोच करने में, करवट बदलने इत्यादि में पिच्छी का प्रयोग करते हैं।
अहिंसा
पिच्छि जीव दया का चिन्ह है, लोगों में साधु के प्रति विश्वास कराने वाला चिन्ह है, प्राचीन मुनियों की प्रतिनिधि स्वरूप है।
अहिंसा
दयालुता एक ऐसी भाषा है जिसे बहरे भी सुन सकते हैं और अन्धे भी देख सकते हैं।
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अनुकम्पा- गणेशप्रसाद वर्णी जी सागर मोराजी से वेदान्ती के आगे नदी तक लड़कों के साथ घूमने जाते थे, नदी के पास एक लकड़ी का गट्ठा लिए बुढ़िया बैठी रो रही थी, वर्णीजी ने पूँछा क्या हो गया? उसने कहा पैर में काँटा लग गया है, चलते नहीं बन रहा, शाम हो गयी, वर्णी जी ने लुहार के यहाँ से संसी मँगायी, उसने नहीं दी, वर्णीजी रोष में बोले! ''छीन कर ले आओ'' और काँटा निकाला, एक-एक लकड़ी लड़कों को देकर बुढ़िया को उसके घर भेज दिया था।
अहिंसा
एक ट्रक में आठ गाय भैंस से ज्यादा नहीं जायेगी, ये कानून है।
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ट्रक जिस दिशा में जा रहा हो तो पशु का मुख भी उसी दिशा में होना चाहिए।
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आठ राज्यों में गो हत्या बन्द है, कसाईयों ने अपील की तो नौ जजों ने बैठकर निर्णय लिया चौदह वर्ष से छोटा पशु न काटा जाय।
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नेपाल में गाय राष्ट्रीय पशु है, उसको मारने पर फाँसी की सजा होती है।
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