Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Death & Samadhi

समाधि

120 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

आत्मघात किसी भी समस्या का हल नहीं है बल्कि एक नई समस्या है, पहली कक्षा में भर्ती होना है एवं अनेक समस्याओं को निमन्त्रण देना है।
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क्या आप अपनी मृत्यु के बारे में विचार करते हैं?
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क्षणभङ्गुर जीवन की कलियाँ, प्रातः काल खिली न खिली, मलयाचल की शुचि शीतल वायु, सुगन्ध समेत मिली न मिली। कलिकाल कुठार लिये फिरता, तन नम्र से चोट झिली न झिली, भज ले अरिहन्त अरी रसना!, फिर अन्त समय में हिली न हिली।।
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पतझड़ में पेड़ के पत्ते झड़ जाते हैं, बुरे वक्त में सगे भाई लड़ जाते हैं। चार दिन की जिन्दगी है, प्रेम से बिता डालो, अन्त समय में सभी मौन चले जाते हैं।।
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छठवें-सातवें गुणस्थानवर्ती की तरह पूर्ण परिग्रह का त्यागी न होने पर भी चौथे-पाँचवे गुणस्थानवर्ती सल्लेखना करने का अधिकारी है।
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हर शख्स को यहाँ मौत ने घेरा है, तन तरुवर पर कुछ दिन का बसेरा है। मत सताओ दुखियों को मेरे दोस्त, चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरा है।।
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सुकुमाल स्वामी- सियारनी के द्वारा उपसर्ग को सहन कर देव हुये।
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सुकोशल स्वामी-('जा सुत विरह मरी हुई बाघिन, ता सुत देह विदारी')माता सहदेवी पुत्रवियोग में मर कर व्याघ्री हुई उसी के द्वारा अपने प्रिय पुत्र का भक्षण किये जाने पर भी उपसर्ग समता से सहन किया और सर्वार्थसिद्धि गये।
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जो अपनी जिन्दगी को, अपनी मीत बना लेते हैं। वे जन्म को तो छोड़िये, मौत को भी जीत बना लेते हैं।।
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पराग को पीते-पीते कमल बन्द हो गया, भौंरा विचार करता है, रात्रि व्यतीत होगी सूर्य उदित होगा, कमल खिल जाएगा हम उड़ जाएंगे, इतने में हाथी आकर के कमलनि सहित उसे खा जाता है, इसी प्रकार संसारी प्राणी योजनाएँ बनाता रहता है और सोचता है कि इसके बाद आत्म कल्याण कर लेंगे बीच में ही यमराज रूपी हाथी खा जाता है।
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तप करना, व्रत धारण करना, संयम धारण करना, जीव दया करना और अन्त में समाधि मरण करने से चारों गति सम्बन्धी दुःखों का निवारण हो जाता है।
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एक नगर में राजा बनने के पाँच साल बाद राजा को जङ्गल में छोड़ दिया जाता था, इसलिए कोई राजा नहीं बनना चाहता था, एक राजा ने उस जङ्गल में नगर बसा लिया और अपने अनुकूल सारी व्यवस्था बना ली। इसी तरह मनुष्य पर्याय रुपी राजा बनकर मोक्ष नगर बसायें अन्यथा चौरासी लाख योनि के वन में जाने से कोई नहीं रोक सकता है।
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यह आँख खुली का वह आँख बन्द का-राजा का इकलौता बेटा मर गया, राजा की आँख खुली तो हँसने लगा, रानी के पूँछने पर बोला अभी-अभी स्वप्न में आठ आज्ञाकारी पुत्रों को देख रहा था, पर आँख खुलने पर वे गायव हो गये अब मैं सोच रहा हूँ, कि उसके खोने के लिए रोऊँ या इसके लिए रोऊँ, मन में आता है कि वो बन्द आँख का स्वप्न था और ये खुली आँख का स्वप्न है, दोनों झूठे है अतः रोना व्यर्थ है और राजा आत्म कल्याण में लग गया था।
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यमराज का पत्र- सेठ ने यमराज से दोस्ती की और कहा आने के पूर्व पत्र देना, उसने वादा किया, पहला पत्र- सफेद बाल किये पर सेठ ने हेयर डाय करा लिया, दूसरा पत्र दाँत गिराये तो बत्तीसी लगवा ली, तीसरा पत्र आँख कान खराब किये, तो चश्मा और मशीन लगवा ली, चौथा पत्र अटैक आया तो बायपास सर्जरी करवा ली, जब यमराज लेने आया तो सेठ ने कहा आपने धोका किया, यमराज ने कहा हमने चार पत्र दिये थे पर आपने आत्म कल्याण के लिए प्रयत्न नहीं किया।
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भगवन् माल छूट जाय और अन्त समय में भी माला हाथ में रहे।
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आँख खुली तो सपना गया, जब आँख मिची तो अपना गया। नश्वर है संसार यह जब आँख फिरी तो दफना गया।।
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आगाह (अनिश्चित) अपनी मौत का, कोई वसर(ठिकाना) नहीं, सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं।
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सात दिन का जीवन- राजा ने साधु से पूँछा कि आप स्त्रियों के बीच में रहते हो, मालपुआ खाते हो, इससे तुम्हारा मन चञ्चल नहीं होता है ? मुनि ने कहा इसका जबाव बाद में देंगे, कुछ समय बाद राजा को बुलाया, कहा आपका जीवन सात दिन का है, इन दिनों में खूब भोग भोग लो अन्यथा भोग कहाँ मिलेंगे, राजा घर गया चिन्ता में भोजन भी भूल गया, सात वे दिन सब लोग रोने लगे, लोगों का तांता लग गया, राजा मरा नहीं, आठवे दिन मुनि के पास गया, साधु ने कहा कि इन दिनों खूब भोग भोगे होंगे ?राजा ने कहा भोग नहीं भोगे रोते रहे, साधू ने कहा इसी प्रकार मृत्यु पर दृष्टि होने पर भोग रुचते नहीं हैं।
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एक करोड़ वर्ष में एक समय अधिक है तो अकाल मरण नहीं होगा, यदि एक समय कम है तो अकाल मरण हो सकता है।
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स्वर्ग में तीर्थंकर बनने वाले जीव की एवं अन्य सम्यग्दृष्टि देवों की भी माला नहीं मुरझाती है, किन्तु मिथ्यादृष्टि देवों की मरण के पूर्व माला मुरझाने लगती है।
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यह पर्व हमें उपसर्ग, परिषहों को सहन कर हर बाधा को उत्सव के रूप में समझकर निर्माण नहीं, निर्वाण की ओर बढ़ने की शिक्षा देता है।
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अर्थी उठने के पहले महावीर की तरह अपने अर्थ (कल्याण) को प्राप्त कर लेना चाहिये।
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जिसका प्रतिकार न किया जा सके ऐसे उपसर्ग के आने पर, दुर्भिक्ष के पड़ने पर, वृद्धावस्था आने पर, धर्म के लिए शरीर का विसर्जन करना सल्लेखना कहलाती है।
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सफेद बाल रूपी दूत समस्त मनुष्यों के मस्तक पर आरूढ़ हो जोर-जोर से चिल्ला रहा है कि बुढ़ापा और मरण तुम्हारा अनादर कर रहे हैं अतः धर्म करो और पाप से विरक्त हो जाओ।
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सर्वज्ञ भगवान् समाधि मरण को तप का फल कहते हैं, इसलिए शक्ति के अनुसार समाधिमरण के लिए प्रयास करना चाहिये।
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हे भगवन्! कल्पवृक्ष के समान फलदायी आपके श्री चरणों की सेवा में आज तक जो मेरा समय व्यतीत हुआ है, उससे जो पुण्य सञ्चित हुआ हो उसके बदले में मैं प्रार्थना करता हूँ कि अन्तिम समय में मेरा कण्ठ अवरुद्ध न हो आपका ही नाम निकले।
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उपसर्ग में अनेक मुनियों ने सल्लेखना ली, गजकुमार, सुकुमाल आदि बड़े समाधि मरण पाठ से देखें।
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दुर्भिक्ष- भद्रबाहु स्वामी आदि चौबीस हजार मुनियों को दक्षिण में जाना पड़ा था।
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पाँच प्रकार का मरण- नौ केवल लब्धि वाले केवली का पण्डितपण्डित मरण होता है, छठवें आदि गुणस्थान वाले मुनि का पण्डित मरण होता है, देशव्रती का बाल पण्डित मरण होता है, चौथे गुणस्थान वाले सम्यग्दृष्टि का बाल मरण होता है, मिथ्यादृष्टि जीवों का बालबाल मरण होता है।
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पण्डित मरण के तीन भेद हैं-1.भक्त प्रत्याख्यान मरण- बारह वर्ष तक अपने शरीर की सेवा स्वयं कर सकते हैं एवं पर से करा सकते हैं, 2.इङ्गिनीमरण- स्वयं की सेवा स्वयं करते हैं दूसरों से नहीं कराते हैं, 3.प्रायोपगमन मरण- न स्वयं की सेवा स्वयं करते हैं न पर से सेवा करवाते हैं।
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शास्त्रोक्त विधि से आहार का त्याग कर मरण करना भक्त प्रत्याख्यान कहलाता है।
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बारह वर्ष की सल्लेखना- क्षपक प्रथम के चार वर्षों में काय क्लेश तप करता है, आगे चार वर्षों में षट् रसों का त्याग करता हुआ शरीर कृश करता है, आगे दो वर्ष काँजी का भोजन, स्वाद रहित भोजन करता है, आगे एक वर्ष आचाम्ल भोजन, आगे छह माह मध्यम तप से, अन्तिम छह माह उत्कृष्ट तप करता है।
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किसी सड़क से गुजरती अर्थी देखकर भगवान् को और अपनी मृत्यु को याद रखना और दूसरों पर किये उपकार को एवं दूसरों ने की तुम्हारी बुराई को भुला देना।
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अर्थी को देखकर ये मत कहना कि बेचारा चल बसा, किन्तु यह सोचना कि एक दिन हमारी अर्थी भी इसी रास्ते से गुजर जायेगी, लोग सड़क के दोनों ओर खड़े देखते रह जायेंगे, दूसरों की मौत अपने लिये चुनौती है।
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शराबियों ने खेई नाव-बढ़ी नहीं एक पाँव- शराबियों ने रातभर नाव चलाई, रस्सा खोला नहीं इसलिए वहीं के वहीं रहे, इसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी रस्सा नहीं खोला एवं समाधि मरण नहीं किया इसलिए संसार में ही रुल रहे हैं।
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ड्रेस और एड्रेस का चेञ्ज होना मरण है।
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'मृत्यु' मित्र है, उपकारी है, शरीर रूपी पिञ्जरे से छुड़ाने वाली है, इसके विना हम अपने पुरुषार्थ का फल नहीं पा सकते हैं एवं समाधि के समय आत्मविश्वास कार्यकारी होता है।
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दुनिया को जीता-किन्तु मौत से हार गए- जिनके शरीर में नाखून की खरोंच तक नहीं थी, जिन्होंने अनेक राजाओं को जीता था, जो तीन खण्ड के अधिपति थे, जिनके पास सात रत्न थे, एक-एक रत्न की हजार-हजार देव सेवा करते थे, तो भी मृत्यु को नहीं जीत सके, ऐसे लक्ष्मण चाचा की मौत देखकर लव-कुश को वैराग्य हो गया, पिता बलभद्र श्री रामचन्द्रजी को नमस्कार किया और दीक्षा के लिए वन की ओर चले गये।
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चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर जी- शक् संवत् 1784/विक्रम संवत् 1929, अश्विन कृष्णा षष्ठि (25 जुलाई 1872 बुधवार की रात) को भोजग्राम में पिता भीम गौड़ा, माता सत्यवती के यहाँ जन्म हुआ, आपका नाम सत्यगौड़ा एवं दामोदर भी था। नौ वर्ष की उम्र में सात वर्ष की कन्या के साथ विवाह हुआ, सोलह माह बाद पत्नी की मृत्यु हो गयी, पुनः विवाह कराने से इनकार कर दिया, बैल बीमार होने पर अनुकम्पा वश स्वयं हल जोता एवं मुनि सिद्धसागरजी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। बत्तीस वर्ष की उम्र में वृद्धा माँ को पीठ पर बैठाकर सम्मेदशिखर जी की वन्दना करायी एवं स्वर्णभद्रकूट पर आजीवन घी और तैल का त्याग किया। सैंतीस वर्ष की उम्र में पिता का वियोग हुआ, उसी दिन से एक आहार एक उपवास का नियम लिया। आचार्य देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनि दीक्षा का निवेदन किया, फिर उत्तूर ग्राम में विक्रम संवत् 1972 (सन् 1915) में क्षुल्लक दीक्षा प्राप्त हुई। मार्च मङ्गलवार सन् 1920 यरनाल कर्नाटक में मुनि देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनि दीक्षा, आठ अक्टूवर सन् 1924 बुधवार को समडोली में आचार्य पद, गजपन्था जी सन् 1937 में चारित्र चक्रवर्ति की उपाधि एवं अठारह सितम्बर सन् 1955 रविवार को कुन्थल गिरी सिद्ध क्षेत्र में भाद्र शुक्ला द्वितीया के दिन समाधि हुयी। मुक्ता गिरी, श्रवण बेलगोला एवं सोनागिर में क्रमशः तीन बार शेर निकट आया, जङ्गल के मन्दिर में रात भर चींटियों का उपसर्ग हुआ, अठारह करोड़ जप किये, छत्तीस बार भगवति आराधना का स्वाध्याय किया, नौ हजार नौ सौ अड़तीस उपवास किये, छत्तीस दिन सल्लेखना चली, शिथिलाचार परिहार हेतु गुरू ने शिष्य से पुनः दीक्षा ली, आचार्य विद्यानन्दी जी कहते थे कि आचार्य शान्तिसागर जी की साधना के आगे हमारी साधना कुछ भी नहीं है।
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1978 में अजैन छात्रा किरण टण्डन ने आचार्य ज्ञानसागरजी के व्यक्तित्व-कर्तृत्व पर कुमायु विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आचार्यश्री ने वि.सं. 2004 में सात प्रतिमा ग्रहण की थी, वि.सं.2012 में क्षुल्लकदीक्षा और वि.सं.2014 में शिव सागर जी से मुनि दीक्षा जयपुर खानियाजी में ग्रहण की थी और बाद में आचार्य पदारोहण हुआ। 30 जून 1968 को अजमेर में कन्नड़ भाषी विधाधर बालक को मुनि दीक्षा दी। 75 वर्ष की उम्र में चार-पाँच घण्टा न्याय, व्याकरण, साहित्य सिद्धान्त आदि पढ़ाते थे। 22 नवम्बर 1972 को नसीराबाद में आचार्यपद अपने शिष्य विद्यासागर जी को देकर, समाधि की याचना की। 1 जून 1973 को नसीराबाद में समाधिमरण हुआ।
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शरीर और कषाय का कृश करना सल्लेखना है, जिनेन्द्र वर्णीजी का एक फेफड़ा था, डॉक्टर ने दूसरी बार पानी लेने को कहा, तब सारे समाचार पत्रों में निकलवाया एवं व्रत खेद पूर्वक छोड़े, बाम्बे हास्पिटल में डॉक्टर ने कहा आपको सूप लेना पड़ेगा, वर्णी जी से पिताजी ने कहा डॉक्टर ऐसा कह रहा है, वर्णीजी डॉक्टर के पास स्वयं गये और कहा कि क्या आप दावा कर सकते हैं कि मैं सूप लेकर जिन्दा रह सकता हूँ? किन्तु मैं दावा करता हूँ कि मैं शाकाहार से जिन्दा रह सकता हूँ। एवं वर्णी जी ने जैनेन्द्र सिद्धान्त कोष की रचना कर जैन संस्कृति को अद्भुत धरोहर समर्पित की है। आचार्य श्री विद्यासागर जी से बाद में पुनः व्रत ग्रहण कर सल्लेखना शुरू की, क्षमासागर जी समयसार सुनाते थे, पन्द्रह गाथा सुनाने के बाद पूँछा और सुनाऊँ? तो हाथ जोड़ कर बोले इतना उतर जाये तो पर्याप्त है, आचार्य श्री ने कहा वो महान साधक थे वर्णीजी की सन् 1983 ईसरी में सल्लेखना पूर्ण हुयी थी।
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जिसके मन में छल होता है उसकी समाधि बिगड़ जाती है।
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आचार्य श्री आहार करके आ गए थे, उसी समय वर्णीजी का हाथ जोड़ कर ओम् की ध्वनि के साथ प्राणान्त हो गया था।
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मौत और सन्यास उम्र को नहीं देखते हैं।
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मौत को टाला नहीं जा सकता पर सुधारा अवष्य जा सकता है।
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