आबाल्याज्जिन देव देव! भवतः, श्रीपादयोः सेवया, सेवासक्त विनेय कल्प लतया, कालोऽध्यायावद्रतः। त्वां तस्याः फलमर्थये तदधुना, प्राणप्रयाणक्षणे, त्वन्नामप्रतिबद्ध वर्णपठने, कण्ठोऽस्त्व कुण्ठो मम्।।
हे भगवन्! कल्पवृक्ष के समान फलदायी आपके श्री चरणों की सेवा में आज तक जो मेरा समय व्यतीत हुआ है, उससे जो पुण्य सञ्चित हुआ हो उसके बदले में मैं प्रार्थना करता हूँ कि अन्तिम समय में मेरा कण्ठ अवरुद्ध न हो आपका ही नाम निकले।
O Lord! For whatever merit I have gathered from the time I have, since childhood, spent in service at your feet — as fruitful as a wish-fulfilling tree — I ask this in return: that at my final moment my throat not be choked, and that your very name issue from it.
— आराध्य सूत्र · #3
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