Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 380

धावला पुस्तक एक।

28 सूत्र

योग स्थान- नई गति में उत्पन्न होने के प्रथम समय में उपपाद योग स्थान, अपर्याप्तक अवस्था में एकान्तानुवृद्धि योग स्थान, पर्याप्तक अवस्था से परिणाम योग स्थान होता है।
ज्ञान
समुद्घात- सभी केवली समुद्घात नहीं करते हैं, वर्ष पृथक्त्व में समुद्घात करने वालों की संख्या बीस होती है।
धर्म
यतिवृषभाचार्य- सभी केवली समुद्घात करते हैं, शेष अघातिया की स्थिति उसके विना बराबर नहीं होती है।
धर्म
संसार नाश के कारण- द्वादशांग का ज्ञान, उसी में तीव्र भक्ति, केवली समुद्घात और अनिवृत्तिकरण के परिणाम।
ज्ञान
गुरु के आशीर्वाद मात्र से विना बीज बोये फसल नहीं मिलती, उसी प्रकार भगवान् ने कहा 'तीसरे भव में मोक्ष होगा' तो भी चुपचाप घर में बैठने से नहीं तपस्या करने से ही मोक्ष होगा।
पुरुषार्थ
तीर्थङ्कर के विहार में साढ़े बारह करोड़ बाजे बजते हैं और भगवान् चतुर्मुखी दिखते हैं पर चतुर्मुखी होते नहीं, होंगे तो समचतुरस्र संस्थान बिगड़ जायेगा।
धर्म
त्रिलोक प्रज्ञप्ति में पाँच सौ गाथाओं में समवसरण का वर्णन हैं।
ज्ञान
रामचन्द्र जी का मोह हटा तो लक्ष्मण के मृत शरीर को छोड़ने में देर नहीं लगी, शत्रुघ्न से कहा! भैया राज्य सम्भालो, शत्रुघ्न ने कहा जो राज का लोभी हो उसे दो, मैं तो मुनि बनूँगा।
अनासक्ति
बारह प्रकार का समयसार- 1.समयपाहुड, 2.आत्मख्याति, 3.तात्पर्यवृत्ति, 4.समयसारनाटक, 5.छहढाला, 6.सकलज्ञेयज्ञायक की विनती, 7.मेरीभावना, 8.सहजानन्दी शुद्धस्वरूपी, 9.ध्यानसूत्राणि, 10.हूँ स्वतन्त्र निश्चल निष्काम, 11.सोऽहम्, 12.अहम्। 'यों है सकल संयम चरित, सुनिए स्वरूपाचरण अब' छहढाला में यहाँ से समयसार प्रारम्भ होता है।
ज्ञान
छह प्रकार की भूलें सकलज्ञेयज्ञायक विनती में बतायीं हैं- पहले अन्तरङ्ग-बहिरङ्ग स्तुति की, फिर भक्त अपने दुःख रोने लगा 'उचरो निज दुःख जो चिर लहाय' 1. मैं भ्रम्यो, अपन पो बिसरि आप, 2. अपनाये विधि-फल पुण्य-पाप, 3. निज को पर का करता पिछान, 4. पर में अनिष्टता इष्ट ठान, 5. आकुलित भयो अज्ञान धारि, 6. तन परिणति में आपो चितार।
ज्ञान
भाव सहित सम्मेद शिखरजी की वन्दना करने से दो अरब उपवासों का फल प्राप्त होता है।
भक्ति
छाता को देखकर भूले हुये अपने छाते की याद आ जाती है उसी प्रकार सिद्धों के स्वरूप से निज स्वरूप का स्मरण होता है।
ध्यान
बारहवें गुणस्थान में श्रुत का पूर्ण क्षयोपशम हो जाता है- (पृ.304)।
ज्ञान
केवली के द्रव्यमन के सद्भाव में सत्य और अनुभय मनोयोग होता है।
ज्ञान
क्षायिक सम्यक्त्व, दान व दान की अनुमोदना से भोगभूमि की प्राप्ति होती है (पृ.329)।
दान
एक रुद्र की इक्यासी लाख वर्ष पूर्व की आयु थी, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व गृहस्थ अवस्था में रहे, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व भावलिङ्गी मुनी रहे, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व भ्रष्ट होकर भोग भोगकर, मरकर नरक में गए।
चरित्र
अनन्तानुबन्धी का पहले गुणस्थान में बन्ध प्रथम समय से होने लगता है, उदय एक आवली तक नहीं होता है।
कर्म
उदयावली के कर्म की नियम से निर्जरा होती है जैसे टिकिट खरीदने जो रेलिङ्ग में चला गया वह इधर-उधर नहीं होता है।
कर्म
कृत्यकृत्य वेदक के पहले भाग में मरकर देव, दूसरे भाग में मरकर देव-मनुष्य, तीसरे भाग में मरकर देव-मनुष्य-तिर्यञ्च, चौथे भाग में मरकर चारों गतियों में जा सकते हैं।
कर्म
भगवान् की ऊँचाई से बारह गुना अशोक वृक्ष होता है अर्थात् पाँच सौ धनुष की काया वाले भगवान् के छः हजार धनुष ऊँचा वृक्ष होता है।
धर्म
ईर्यापथ आस्रव का समय प्रबद्ध आठ कर्मों के समय प्रबद्ध से असंख्यात गुणा होता है।
कर्म
त्रायस्त्रिंश देव को बृहस्पति कहते हैं।
ज्ञान
समचतुरस्र संस्थान तीर्थङ्कर के होता है, इसलिये उनकी मूर्ति बनती है, शेष केवली छहों संस्थान वाले हो सकते हैं।
धर्म
चौदहवें गुणस्थान का काल वचनबल ऋद्धि वाले मुनि के उच्चारण से पाँच ह्रस्व अक्षर के बराबर होता है।
धर्म
तीर्थङ्कर के छेदोस्थापना वाला चारित्र नहीं होता, वे वर्धमान चारित्र वाले होते हैं।
चरित्र
विना छेद के मोती के समान तीर्थङ्कर का चारित्र होता है एवं यम रूप सामायिक चारित्र होता है।
चरित्र
सर्वार्थसिद्धि जाने वाले मुनियों को वर्ष पृथक्त्व संयम के साथ में रहना ही पड़ता है।
संयम
गर्भज मत्स्य पाँच सौ धनुष की अवगाहना वाला होता है, वह सप्तम नरक नहीं जाता है, सम्मूर्च्छन मत्स्य एक हजार योजन की अवगाहना वाला होता है, वह सप्तम नरक जाता है।
कर्म