Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 335

निश्चय व्यवहार (सोदाहरण)।

29 सूत्र

जो नयदृष्टि से विहीन है उन्हें वस्तु स्वरूप की उपलब्धि नहीं होती और वस्तुस्वभाव से विहीन सम्यग्दृष्टि ही कहाँ होता है ?
विवेक
यदि जैन धर्म का प्रवर्तन चाहते हो तो निश्चय और व्यवहार दोनों को नहीं छोड़ो, यदि व्यवहार को छोड़ोगे तो तीर्थ का उच्छेद हो जाएगा और निश्चय को छोड़ोगे तो आत्म तत्त्व की उपलब्धि नहीं होगी।
धर्म
जिस प्रकार दही को बिलोवने वाली ग्वालिनी मथानी की रस्सी को एक हाथ से खींचती है, दूसरे से ढीला कर देती है और दोनों की क्रिया से दही से मक्खन बनाने की सिद्धि करती है, उसी प्रकार जिनवाणी रूप ग्वालिनी सम्यग्दर्शन से तत्त्वस्वरूप को अपनी ओर खींचती है, सम्यग्ज्ञान से पदार्थ के भाव को ग्रहण करती है और दर्शन ज्ञान की आचरण रूप क्रिया से अर्थात् सम्यक्चारित्र से परमात्म पद प्राप्ति की सिद्धि करती है, द्रव्यार्थिक व पर्यायार्थिक दोनों नयों से वस्तुस्वरुप की सिद्धि करती है।
ज्ञान
उपचरित असद्भूत व्यवहार नय से एक निगोदया जीव की दो सौ पचास आवलि प्रमाण आयु होती है, पौन सेकेण्ड में चार हजार चार सौ सैतालिस आवलियाँ होती हैं, पौन सेकेन्ड का एक श्वाँस होता है, उसमें निगोदिया जीव अट्ठारह बार जन्म और मरण करता है, स्वस्थ पुरूष की एक मिनिट में अठत्तर बार श्वाँस चलती है।
कर्म
निश्चय-व्यवहार दोनों पक्के मित्र हैं लेकिन कार्य के समय दोनों शत्रु हैं, जैसे दो मित्र शतरञ्ज खेलते हैं, खेल के समय दोनों शत्रु हैं, शेष समय मित्र हैं।
विवेक
मञ्जिल पाने के लिये ट्रेन को पकड़ना भी पड़ेगा और छोड़ना भी पड़ेगा, उसी तरह मोक्ष को पाने के लिए व्यवहार को पकड़ना भी पड़ेगा और छोड़ना भी पड़ेगा।
विवेक
नाव से नदी पार होते हैं, नाव में बैठने से कि नाव को छोड़ने से ? यदि छोड़ते हैं तो बीच में छोड़ दें तो भी नदी पार नहीं होगी, जब छोड़ना है तो बैठना क्यों ? बैठना भी पड़ेगा और उस पार पहुँचने पर छोड़ना भी पड़ेगा।
विवेक
निश्चय व्यवहार शरण- अरहन्तादि व्यवहार शरण हैं आत्मा निश्चय शरण है, जैसे लड़की को पिता का घर व्यवहार शरण होता है, पति का घर निश्चय शरण होता है।
विवेक
व्यवहार की महिमा बोलने में है, और निश्चय की महिमा मौन में हैं।
विवेक
निश्चय मोक्षमार्ग के पिछत्तर पर्यायवाची नाम है।
विवेक
जब तक स्वरूप की प्राप्ति न हो तब तक दोनों नयों को पकड़कर रखना चाहिए।
विवेक
व्यक्ति अपने घर दोनों पैरों से जाता है उसी प्रकार आत्मा रुपी घर में जाने के लिए दोनों नयों की आवश्यकता होती है।
विवेक
ध्रुव बन्धी प्रकृतियों की अपेक्षा शुद्धोपयोगी को भी पाप प्रकृति का बन्ध होता है और अशुभोपयोगी को भी पुण्य प्रकृति का बन्ध होता है।
कर्म
सन्तान किसी एक की नहीं होती, उसी प्रकार रागादि एक से नहीं बल्कि आत्मा और कर्मोदय दोनों से होते हैं।
कर्म
निश्चय में एक का कल्याण होता है, व्यवहार में अनेकों का कल्याण होता है।
विवेक
वस्त्र को स्वभाव से गन्दा मान लेंगे, तो साफ करने का भाव नहीं होगा, इसी तरह अपने आप को शुद्ध मान लेंगे, तो शुद्ध करने का भाव नहीं होगा।
विवेक
निश्चय व्यहवार- रोटी को पहले तवे पर रखा जाता है बाद में आग पर रखा जाता है तब रोटी सिकती है, उसी प्रकार व्यवहार के आलम्बन पूर्वक निश्चय प्राप्त होता है।
विवेक
रोटी अग्नि सेंकती या तवा ? सीधे अग्नि में नहीं ड़ालते हैं, ठण्डे तवे पर भी नहीं ड़ालते हैं, जिस तवे रूप व्यवहार में अग्नि रूप निश्चय ने प्रवेश कर लिया, उस पर रोटी ड़ालते हैं, जब रोटी तवे पर कुछ कड़ी हो जाती है तो फिर अग्नि में ड़ाल देते हैं, इसी प्रकार प्रारम्भ में व्यवहार का आलम्बन लिया जाता है, बाद में निश्चय प्राप्त होता है।
विवेक
फूल लाल या सफेद- हनुमान जी ने रामचन्द्र जी से कहा ! अशोक वाटिका मुझे सबसे अच्छी लगी उसमें लाल फूल खिले थे, तभी बीच में सीता बोल पड़ी मैं उसमें बहुत दिन रही हूँ उसमें सफेद फूल खिले थे, हनुमान जी और सीताजी में लाल-सफेद रञ्ज पर बहस छिड़ी थी, तभी रामचन्द्रजी ने कहा आप दोनों सत्य बोल रहे हैं, तब हनुमानजी ने कहा सत्य तो एक ही होगा, रामचन्द्रजी ने कहा हनुमानजी जब आप अशोक वाटिका में थे तब क्रोध में थे, इसलिए लाल फूल दिखे, सीताजी उस समय आँसुओं से युक्त थी, इसलिए उसे सफेद फूल दिखे, अतः अपेक्षा से दोनों कथन सही हैं इसी प्रकार प्रत्येक विषय में समझना चाहिए।
विवेक
आँख निश्चनय और पैर व्यवहारनय के समान है जैसे आँख नहीं खोलेंगे तो वस्तु स्वरूप नहीं दिखेगा और चलेंगे नहीं तो मंजिल पर नहीं पहुँचेंगे।
विवेक
व्यवहार- कृष्ण जी शान्तिदूत बनकर दुर्योधन के पास गये, कहा पाण्डव पाँच गाँव में सन्तुष्ट हैं, युद्ध न करो, दुर्योधन ने कृष्णजी को फटकारते हुये बन्दी बनाने का आदेश दिया, तब कृष्णजी ने विराट रूप बनाकर दुर्योधन से कहा तू कौन सी मूली की जड़ है ? देखते-देखते उखाड़ कर फेक दूँगा, इस प्रकार व्यवहार नय से समझाया था।
विवेक
निश्चय- अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र में कृष्णजी से पूँछा, किस-किस के साथ युद्ध करना है ? कृष्णजी ने बताया भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, दुर्योधन आदि के साथ, अर्जुन ने कहा रथ वापस ले चलो, जिनकी गोद में खेले, उनसे युद्ध कैसे करेंगे ? तब कृष्ण जी ने निश्चय का सहारा लेकर समझाया था- अर्थात्- आत्मा शस्त्र से छिदती नहीं है, आग से जलती नहीं है, पानी से भीगती नहीं है और वायु से सूखती नहीं है, इसलिए हे अर्जुन ! युद्ध करो।
विवेक
एक पैर से चलना और एक से सम्भलना होता है, उसी तरह व्यवहार-निश्चय नय को समझना चाहिए।
विवेक
पक्षी दो पंख के बिना उड़ नहीं सकता, गाड़ी दो पहियों के बिना चल नहीं सकती।
विवेक
ज्ञान के समय व्यवहार, ध्यान के समय निश्चय काम में आता है।
विवेक
ऊपर की सीढ़ी चढ़ने पर नीचे की सीढ़ी अपने आप छूट जाती है, उसी प्रकार निश्चय प्राप्त होने पर व्यवहार अपने आप छूट जाता है।
विवेक
जब मकान, दुकान, भोजन, स्नान छोड़ दो, तब पूजा छोड़ देना इसके पहले नहीं छोड़ना, पूजा ग्रहस्थी में बंधे पापों को धोने के लिए साबुन के समान है।
भक्ति
साबुन लगाना भी पड़ेगा और धोना भी पड़ेगा, साबुन नहीं लगाएंगे तो मैल नहीं निकलेगा और धोएँगे नहीं तो साबुन नहीं छूटेगी।
भक्ति
नये कपडे मिलेंगे तो पहनेंगे अन्यथा नहीं तो ठण्ड सहनी पड़ेगी, इसी तरह अभी शुद्धपयोग...
विवेक