Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 229

सत्य वर्धन अलीक-विसर्जन।

29 सूत्र

जिसका मन सत्य शीलता में निमग्न है वह तपस्वी से और दानी से भी श्रेष्ठ है।
सत्य
वाचनिक उपकार के कारण णमोकार मन्त्र में सिद्धों से पहले अरिहन्त पद को रखा है।
णमोकार
जिस महात्मा ने प्रसन्नमुख होकर एक बार प्रेम से बात की उसने क्या–क्या उपकार नहीं किया? व क्या–क्या नहीं दिया?
वाणी
सत्य से व्यक्ति परेशान हो सकता हैं पर परास्त नहीं होता है।
सत्य
सूली पर चढ़ने के बाद भी सत्य सत्य ही रहता हैं, सिंहासन पर भी झूठ झूठ ही रहता है।
सत्य
अनेकान्त में शान्ति, एकान्त में अशान्ति व विवाद होता है, 'अस्वत्थामा हतो नरो वा कुञ्जरो वा' यह धर्मराज युधिष्ठिर का स्याद्वादी सिद्धान्त था।
विवेक
समय पर दिया गया धन्यवाद करोड़ों रुपयों से भी कीमती होता हैं।
वाणी
मौन पूर्वक दुर्व्यवहार सहने से विरोधी का हृदय परिवर्तित हो जाता हैं।
क्षमा
जब तक घी में छाछ है तब तक कड़–कड़ की आवाज आती है, शुद्ध होने पर शान्त हो जाता है, उसी प्रकार जब तक जीव के अन्दर कषाय रहती है, तभी तक अशान्त रहता है, कषाय निकल जाने पर शान्त हो जाता हैं।
संयम
वाणी से व्यक्ति की पहचान- एक बार जङ्गल में राजा, मन्त्री, कोतवाल, और सिपाही ये चारों भटक गये, उन्हें रास्ते में एक अन्धा व्यक्ति दिखा, राजा ने उससे पूँछा क्यों सूरदास जी क्या यहाँ से हमारे मन्त्री, कोतवाल, सिपाही निकले हैं? सूरदास ने कहा नहीं राजन्। थोड़ी देर में वहाँ से मन्त्री निकला, तो उसने पूँछा, क्यों सूरदास क्या यहाँ से हमारे राजा निकले हैं? सूरदास ने कहा हाँ मन्त्री जी। थोड़ी देर में कोतवाल निकला, तो वह भी अन्धे से पूँछता है, क्यों रे सूरदास क्या यहाँ से हमारे राजा, मन्त्री निकले हैं? उसने कहा हाँ कोतवाल जी। थोड़ी देर में वहाँ से सिपाही निकला, उसने भी अन्धे से पूँछा क्यों वे अन्धे क्या यहाँ से हमारे राजा निकले हैं? उसने कहा हाँ सिपाही। अन्धें ने वाणी से राजा, मन्त्री, कोतवाल, सिपाही को जाना।
वाणी
एक व्यक्ति बोला कि मैं जुआ नहीं खेलता, शराब नहीं पीता, पाप नहीं करता, कषाय नहीं करता, मेरे में कोई अवगुण नहीं है, मात्र यही अवगुण है कि में सत्य नहीं बोलता, इस एक दुर्गुण ने ही उसके सारे गुणों को बर्बाद कर दिया, क्योंकि वह जो कुछ बोल रहा है सब झूठ है।
सत्य
मुनि तो सत्य बोलते ही हैं क्योंकि मुनियों के द्वारा समस्त विद्याएँ निर्मित हैं, किन्तु सत्य को धारण करने वाले म्लेच्छों को भी विद्याएँ सिद्ध हो जाती हैं।
सत्य
सत्य सब धर्मों में प्रधान है, संसार सागर से पार होने के लिए सत्य पुल के समान है।
सत्य
सत्य वचन बोलना ही जिनवाणी की पूजा है।
सत्य
सत्य बोलने से सुस्वर एवं वाणी सम्बन्धी गुण प्राप्त होते हैं।
सत्य
सत्यवादी में हजार हाथियों का बल होता है।
सत्य
स्याद्वाद में विवाद नहीं होता, विवाद दुराग्रह में है व सत्यवादी अधिक नहीं बोलता है।
सत्य
जैसे मयूर पङ्ख में धूलि नहीं लगती, कमल को कीचड़ नहीं छूता, वैसे ही उत्तम वक्ता की जिव्हा को अपशब्द नहीं छूता है।
वाणी
प्रतिपद उदार भावों से युक्त, चमत्कार गर्भित और भाव प्रेषण में निपुण वाणी सैकड़ों में किसी एक को ही प्राप्त होती है।
वाणी
सत्य से वाणी शुद्ध होती है, ज्ञान से मन शुद्ध होता है, गुरु सेवा से शरीर शुद्ध होता है, ये शुद्धियाँ शाश्वत मानी गई हैं।
सत्य
जो लङ्गड़े–लूले, कुरूप, भाग्यहीन, रोगी और कुल–जाति आदि से हीन हैं उनका भी सत्य ही एक आभूषण है।
सत्य
जो वचनों से न कह कर चेष्टा से अपने गुणों का बखान करता है वह गुणवानों में भी श्रेष्ठ माना जाता है।
विनम्रता
सत्य के कारण पृथ्वी टिकी है, सूर्य तपता है, वायु बहती है सब कुछ सत्य पर ही प्रतिष्ठित है।
सत्य
सत्य वचन के होने पर ही शेष व्रत होते हैं और जगत्पूज्य जिनवाणी की आराधना होती है।
सत्य
धर्म एवं क्रिया का नाश होता हो, सम्यक् सिद्धान्त का अभाव होता हो तो उसके स्वरूप के प्रकाशन के लिए विना पूँछे भी बोलना चाहिए।
सत्य
उचित वाणी जिस प्रकार मनुष्य को अलंकृत करती है, उस प्रकार चन्द्रमा के समान उज्ज्वल बाजूबन्ध, स्नान, लेप, फूल और सजाए हुए बाल अलंकृत नहीं करते, आभूषण तो नष्ट हो जाते हैं पर वाणी जीवन्त रहती है।
वाणी
चन्दन, चन्द्रमा और चन्द्रकान्त मणि की माला उस प्रकार सन्तुष्ट नहीं करती, जिस प्रकार कर्णप्रिय वाणी मनुष्य को सन्तुष्ट करती है।
वाणी
उच्च कुल के मनुष्य के हाथ में कमल का चिन्ह नहीं होता एवं व्यभिचारी की सन्तान के सिर में सींग नहीं होते किन्तु जब वाणी का प्रयोग करता है तो जाति कुल का प्रमाण अपने आप हो जाता है।
वाणी
सौ लोगों में एक पहलवान होता है, हजार लोगों में एक पण्डित होता है, दस हजार में एक वक्ता होता है और इनमें दाता हो भी सकता है और नहीं भी।
चरित्र