Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 18

धर्म मगर को दिया।

25 सूत्र

संसार के सभी रस करूण रस के चरण चूमते हैं।
अहिंसा
त्याग, विद्या तथा विवेक ये तीन गुण जिसके पास हैं, पर अहङ्कार नहीं है तो मेरा उसके लिए नमस्कार हो।
विनम्रता
मनुष्य जिस समय खोटे कार्य में प्रवृत्त होता है उसी समय वह निश्चय से मर जाता है, फिर चिरकाल बाद मरे हुए उस मनुष्य के विषय में इस समय शोक क्यों किया जाता है?
कर्म
एक अहिंसा ही प्राणियों का सुख, कल्याण अथवा मोक्ष प्रदान करती है, अहिंसा विहीन तप, श्रुत और संयम का समूह भी वह सुख नहीं प्रदान करता है।
अहिंसा
दया रूपी कौस्तुभ मणि जिसके हृदय में विद्यमान है, धर्म की उन्नति से हर्षित होने वाला वही पुरुषोत्तम श्रेष्ठपुरुष है।
अहिंसा
संसारी प्राणी गुरु से पूँछता है सुख कहाँ है? गुरु कहते हैं हमने अभी मगर को बताया है, उससे पूँछ लो, वह मगर से पूँछने गया, मगर ने कहा पहले हमें पानी पिला दो प्यास लग रही है, वह मनुष्य हँसता है कि पानी में रहकर भी प्यासा है, मगर भी कहता है, कि तुम भी हँसी के पात्र हो, सुख आत्मा का स्वभाव है तुम सुख को बाहर ढूँढ़ते हो। ज्यों तिली में तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा प्रभु तुममें बसे, जाग-जाग रे जाग॥
ध्यान
बोलो तो ऐसे कि लोग लिखने लगें, आचरण करो तो ऐसा कि लोग सीखने लगें।
चरित्र
एक बार का गुस्सा दिमाग के दस हजार ज्ञान तन्तुओं को नष्ट कर देता है।
क्षमा
अन्धकार को कोसने से अन्धकार नहीं मिटता किन्तु एक छोटा सा दीपक जला देने से अन्धकार मिट जाता है।
पुरुषार्थ
जैसे कीचड़ से सनी झाड़ू से घर साफ़ नहीं होता है, उसी प्रकार कषायों से सनी आत्मा को सुख नहीं मिलता है।
संयम
हाथ की रेखाएं टेडी हैं तो निराश मत होइए, अपने नजरिये को बेहतर बनाइए हस्त रेखाएं स्वतः अनुकूल हो जायेंगी।
पुरुषार्थ
सम्यग्दर्शन, दया, दान, तप, सन्तोष, संयम और परोपकार का स्वभाव होना ये उत्तम धर्मात्माओं के चिन्ह हैं।
धर्म
रावण विद्याधरों का अधिपति था और श्रीराम भूमिगोचरी थे, फिर भी राम के द्वारा रावण जीता गया, ठीक कहा है, जहाँ धर्म है वहाँ विजय है?
धर्म
सब वचनों में 'देदो' वचन कष्ट देने वाला है, 'नहीं है' यह वचन उससे भी अधिक कष्ट देने वाला है, 'लेलो' यह वचन सब वचनों में राजा है और 'नहीं चाहिए' यह वचन सब वचनों में राजाधिराज है।
संतोष
व्यक्ति अपनी जुबान ठीक करले तो जन्मपत्री की गड़बड़ी और शनि की साढे साति कुछ नहीं बिगाड़ सकती है।
वाणी
सफल व्यक्ति कोई महान काम नहीं करते किन्तु वे छोटे-छोटे कामों को भी महान ढंग से करते हैं।
पुरुषार्थ
अच्छी पुस्तकों के रहने पर मित्रों की कमी नहीं खटकती है। पोशाक बहुमूल्य तो हो, पर भड़कीली न हो।
ज्ञान
मैं नरक में भी अच्छी पुस्तकों का स्वागत करूँगा, इनमें वह शक्ति है कि ये जहाँ होगी वहाँ स्वर्ग बन जायेगा, विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र हैं। 'सबसे बड़ा पाप अङ्गूठा छाप'।
ज्ञान
पुराने कपड़े पहन कर नयी पुस्तक खरीदिये, जहाँ अच्छी पुस्तकें हैं वहाँ से लोभ, मोह, भ्रम, भय को भगाना कठिन नहीं है, अधिक पढ़ने से मन शैतान नहीं पवित्र होता है।
ज्ञान
रोग में हितकारी भोजन करना, स्वामी के सामने सत्य बात कहना, दुष्ट के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना, शत्रु का क्षय करना, ज्ञान होने पर ध्यान करना, धन होने पर दान करना और स्त्री समूह के समक्ष कोमल व्यवहार करना औषध है।
विवेक
वृद्धावस्था रूप को, चिन्ता सब सुखों को एवं शक्ति को, दुर्जन की सेवा विशाल अभिमान को, याचना गौरव को, अपने आपकी प्रशंसा गुणों को और लक्ष्मी दया को नष्ट करती है।
Misc.
लक्ष्मी पुरुषार्थ के अनुसार होती है, कीर्ति त्याग व दान के अनुसार होती है, विद्या अभ्यास के अनुसार होती है और बुद्धि कर्मों के अनुसार होती है।
कर्म
आपका व्यवहार व्यक्तित्त्व का आईना और चारित्र की कसौटी है, व्यक्ति की महानता का आधार परिवार, पैसा, पद नहीं उसकी शालीनता होती है, चेहरे के रङ्ग की अपेक्षा श्रेष्ठ व्यवहार के ढ़ंग का प्रभाव ज्यादा पड़ता है।
चरित्र
सोच के बोलें, न कि बोल के सोचें, बोलने से पहले एक बार सोचो, लिखने के पहले दो बार सोचो, और करने से पहले तीन बार सोचो, लोगों के मना करने से पूर्व बोलना बन्द कर दो।
वाणी
निरन्तर वृद्धजनों (गुणवानों) की सेवा और अभिवादन करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल ये चार वस्तुएँ वृद्धि को प्राप्त होती हैं।
विनम्रता