Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 153

क्रोध-हरण करता बोध।

60 सूत्र

जिसमें हम दुनिया को आनन्द बाँटते हैं उसको कहते हैं त्यौहार, जो आत्मा को आनन्द देने वाला होता है उसे कहते हैं पर्व। त्यौहार में जोड़ना होता हैं और पर्व में छोड़ना होता है।
धर्म
क्रोध इंसान को शैतान बना देता है, क्रोध दोस्त को दुश्मन बना देता है। अरे क्रोधाग्नि में जलने वालों, क्रोध गुलशन को वीरान बना देता है।।
क्षमा
पर्व तीन प्रकार के होते हैं- 1. अनादि निधन पर्व- दस लक्षण, सोलहकारण आदि, 2. घटनाविशेष से संबंधित पर्व- रक्षाबन्धन, अक्षय तृतीया आदि, 3. निमित्तविशेष से संबंधितपर्व- पञ्चकल्याणक आदि।
धर्म
क्षमा- जिसमें क= कषायों का, श= शमन हो और मा= माँ की तरह जो आत्मा की रक्षा करे उसे क्षमा कहते हैं।
क्षमा
कषायों को उपमा-क्रोध अन्धा, मान बहरा, माया गूँगी और लोभ नकटा होता है।
क्षमा
क्रोध उत्पत्ति के कारण- इच्छा पूर्ति में बाधा होना, मनचाहा न होना, मानसिक अस्त-व्यस्तता, अस्वस्थता, भोजन और मौसमादि का प्रभाव।
क्षमा
संसार और मुक्ति के बीच मानव जीवन में साधना रूपी पर्व नहीं मनाया तो दीपावली जैसे अनेक पर्व निकल जायेंगे और अन्त में जीवन का दिवाला भी निकल जाएगा और हम कुछ भी नहीं कर पाएँगे।
धर्म
यदि आप से हर व्यक्ति खुश है तो आपने जीवन में बहुत से समझौते किए हैं, यदि आप हर व्यक्ति से खुश हैं तो आपने दूसरों की बहुत सी भूलों को अनदेखा किया है।
क्षमा
भैंस और खेती को लेकर आलसी मित्रों में विवाद-दो मित्र आपस में बैठे-बैठे चर्चा छेड़ देते हैं, एक कहता है 'हम इस साल खेती करेंगे' दूसरा कहता है 'हम इस साल भैंसें खरीदेंगे', पहला कहता है आपकी भैंसे मेरे खेत में नहीं आना चाहिए, दूसरा कहता है पशु हैं आयेंगे तो हम क्या करेंगे, इसी बात को लेकर दोनों में झगड़ा हो जाता है, और आपस में एक दूसरे का सिर फोड़ देते हैं, अतः व्यर्थ की चर्चा नहीं छेड़ना चाहिए।
वाणी
हर बार क्रोध करने पर कुछ सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।
क्षमा
क्रोध धीमा किन्तु घातक जहर है।
क्षमा
क्रोध से रक्त में उबाल आता है।
क्षमा
हृदय की धड़कन, रक्त सञ्चार एवं रक्तचाप में वृद्धि हो जाती है।
क्षमा
नाड़ी मण्डल भी क्षुब्ध हो जाता है।
क्षमा
मन की स्थिति में भयंकर परिवर्तन आ जाता है।
क्षमा
चेहरा, आखें, कान लाल हो जाते हैं।
क्षमा
वाणी और शरीर में कम्पन होने लगता है।
क्षमा
भाषा अनियंत्रित एवं आचरण विवेक हीन हो जाता है।
क्षमा
शनैः-शनै: शरीर में अनेक विकृतियां पनपने लगती है।
क्षमा
आयुर्वेद के अनुसार शरीर में पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है।
क्षमा
एसिडिटि, अपच, अल्सर, भूख न लगना, पाचन क्रिया आदि की समस्या पैदा हो जाती हैं।
क्षमा
क्रोध से होने वाले तनाव से मधुमेह, पागलपन, हृदयरोग की आशङ्का बढ़ जाती है।
क्षमा
कभी-कभी इससे दिल का दौरा, लकवा, ब्रेन हेमरेज तक हो जाता है।
क्षमा
क्रोध में व्यक्ति की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा नष्ट हो जाता है, इसके कारण कमजोरी आती है।
क्षमा
क्रोधी काँपता है एवं गुस्से के बाद शरीर शिथिल हो जाता है।
क्षमा
क्रोधी व्यक्ति से उसके परिजन, मित्र, हितैषी भी बोलते हुए कतराते हैं।
क्षमा
गुम-सुम वातावरण, सन्नाटा जैसा छाया रहता है।
क्षमा
क्रोधी के हित की बात भी स्वजन बताने का साहस नहीं कर पाते हैं।
क्षमा
परिणाम स्वरूप क्रोधी अलग-थलग पड़ जाता है, कुण्ठित हो जाता है।
क्षमा
इस प्रकार उस पर दोगुनी मार पड़ती है।
क्षमा
एक तो क्रोध का तनाव, दूसरा अलग-थलग पड़ने एवं कुण्ठा ग्रस्त होने का तनाव।
क्षमा
इन तनावों से व्यक्ति धीरे-धीरे शारीरिक एवं मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाता है।
क्षमा
क्रोध से नुकसान ही नुकसान है, इससे पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन तो खराब होता ही है।
क्षमा
स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है।
क्षमा
गाली देने वाला तभी विजयी होता है जब सुनने वाला नाराज हो।
क्षमा
जिस प्रकार अग्नि किसान के कष्ट से सञ्चित धान्य को जला देती है, उसी प्रकार क्रोध भी व्रती के समस्त पुण्य को क्षण भर में जला देता है।
क्षमा
परस्पर के घर्षण से वन के वृक्षों में अग्नि उत्पन्न होने पर वे वृक्ष ही जलते हैं, परन्तु क्रोध रूपी अग्नि नियम से सम्यग्दर्शन रूपी वृक्ष को भी जला देती है।
क्षमा
क्रोध देव गति को नष्ट कर, नरकगति में पहुंचाता है एवं सम्यग्दर्शन, विभूति, आयु और यश आदि का भी क्षय करता है।
क्षमा
सुन्दर मनुष्य भी क्रोध के समय वानर के समान हो जाता है व क्रोध से पाप का बन्ध कर करोड़ों जन्मों में कुरूप होता है।
क्षमा
लोभ से क्रोध होता है, क्रोध से बैर होता है और बैर से शास्त्र का जानकार विद्वान् पुरुष भी नरक जाता है।
क्षमा
पुत्र को लेकर पति-पत्नि में विवाद हो गया- पत्नि कहती मैं बेटे को डॉक्टर बनाऊँगी, पति कहता मैं बेटे को वकील बनाऊँगा। जज ने कहा! बच्चे से पूँछो वह क्या बनना चाहता है, बोले! बच्चा तो अभी हुआ ही नहीं।
क्षमा
बुढ़िया ने क्रोध में रोटी नहीं खाई पर बहु का दिमाग खा लिया।
क्षमा
जैसे वस्त्र के ऊपर लगा छोटा सा दाग वस्त्र पहनने का मजा बिगाड़ देता है, ट्यूब में हुआ छोटा सा पञ्चर कार को बेकार कर देता है, वैसे ही बैर की लगी छोटी सी गाँठ जीवात्मा को परमात्मा होने से रोक देती है।
क्षमा
क्रोध बुरे विचारों की खिचड़ी है, उसमें द्वेष, भय, तिरस्कार, घमण्ड, अविवेक सब मिले होते हैं।
क्षमा
क्रोध को हम बारूद के समान विस्फोटक और रासायनिक गैस की तरह अत्यन्त ज्वलन शील पदार्थ मान सकते है। क्रोध के समय विवेक नष्ट हो जाता है। वर्षों की मित्रता को क्रोध क्षण में नष्ट कर देता है।
क्षमा
क्रोध चारित्र मोह की प्रकृति है इससे संयम का घात होता है और निकट तम सम्बन्ध को भी तोड़ देता हैं।
क्षमा
प्रतिशोध के समय बोध अन्धा होता है एवं क्षमा माँगने पर क्षमा करना अहङ्कार को पुष्ट करना है।
क्षमा
क्रोध अग्नि या चण्डाल है, वह शरीर और क्षमादि गुणों को जलाता है।
क्षमा
क्रोध अज्ञानता से शुरू होता है और पश्चात्ताप पर खत्म होता है।
क्षमा
बहुत क्लेश से सञ्चित हुए यश और तप क्रोध से क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।
क्षमा
क्षमा के समय परमात्मा और क्रोध के समय राक्षस एक ही व्यक्ति के दो पहलु होते हैं।
क्षमा
सभी को भूलना अच्छा है पर स्वंय को भूलना पागलपन है, लेकिन व्यक्ति क्रोध के समय स्वयं को भूल जाता है।
क्षमा
क्रोध इञ्जन है, अविवेक और अज्ञान उसके दो पहिए हैं।
क्षमा
क्रोध के लक्षण शराब और अफीम से मिलते हैं।
क्षमा
क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, आदि बुद्धि का नाश तो करते ही हैं, निराशा के भी जनक हैं, निराशा तनाव की जननी है और तनाव अनेक रोगों की जड़ है, पेट के घाव में तनाव अहम भूमिका निभाता है।
क्षमा
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रम, स्मृति के नाश से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
क्षमा
जिनका मन वश में नहीं होता है वे क्षण भर में सन्तुष्ट हो जाते हैं और क्षणभर में गुस्सा हो जाते हैं उनकी प्रसन्नता भी दुःखदायी होती है।
क्षमा
वैर, अग्नि, व्याधि, विवाद और व्यसन ये पाँच वकार अनर्थकारी हैं।
क्षमा
हिरण घास में सन्तुष्ट रहता है, मछली जल में सन्तुष्ट रहती है, सज्जन सन्तोषी होते हैं फिर भी शिकारी हिरन का, मछुआरा मछली का और दुष्ट लोग सज्जनों के अकारण बैरी होते हैं।
क्षमा
जीव कषाय करके जिसमें सुख-दुःख रूपी धान उत्पन्न होती है, ऐसे संसार रूपी लम्बे खेत को जोतता है अर्थात् जीव कषाय करके संसार को बढ़ाता है।
कर्म