Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 5

पर प्रशंसा निज निंदा ही अर्चा है

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जिस प्रकार प्राणरहित शरीर मृतक कहलाता है उसी प्रकार सम्यक्त्व से रहित मनुष्य चलता फिरता मृतक कहलाता है।
भक्ति
ईश्वर ही हमारा आश्रय और बल है वही आपत्ति के समय में रक्षा करता है।
भक्ति
डोली से शिखर जी की यात्रा तो आप कर सकते हैं, श्मशान तक कंधे पर चढ़कर पहुँच सकते हैं पर उसके आगे तुम्हें किसी का सहारा नहीं मिलेगा।
समाधि
दुःखों का मूल ममता है तो सुखों का मूल समता (सुख-दुःख में समान भाव) है।
अनासक्ति
सच्चा सुख बाहर से नहीं, अंदर (हृदय) से मिलता है।
संतोष
शारीरिक सुख पराधीन है परन्तु आत्मिक सुख स्वाधीन है।
संतोष
स्थान बदलने से नहीं मनःस्थिति बदलने से सुख मिलता है।
मन
सुख धन के अर्जन में नहीं धर्म के अर्जन में है।
धर्म
सुख के लिए शरीर को सुन्दर नहीं मन को सुन्दर बनाओ।
मन
जो आपने खो दिया उसकी तरफ कभी न देखें अपितु उस तरफ देखें जो अभी यहीं आपके पास शेष बचा है, यही सुख का रहस्य है।
संतोष
जिसे सोने के लिए नींद की गोली नहीं खानी पड़ती और जागने के लिए अलार्म की जरूरत नहीं पड़ती वही सुखी है।
संतोष
निर्मोही ही सच्चे सुख का अधिकारी होता है।
अनासक्ति
जो सुखदायी परिस्थिति में दूसरों की सेवा करता है तथा दुःखदायी परिस्थिति में दुःखी नहीं होता अर्थात् सुख की इच्छा नहीं करता वह संसार-बन्धन से सुगमता पूर्वक मुक्त हो जाता है।
संयम
गृहस्थी में अगर सबका यह भाव रहे कि मेरे को सुख कैसे मिले तो सब दुःखी हो जायेंगे और यह भाव रहे कि दूसरे को सुख कैसे मिले तो सब सुखी हो जायेंगे।
परिवार
जो सुख लेने की इच्छा से किसी के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ता वह जीता है तो आनन्द से जीता है और मरता है तो आनन्द से मरता है परन्तु सुख लेने की इच्छा से सम्बन्ध जोड़ने वाला जीते हुए भी दुःख पाता है और मरते हुए भी दुःख पाता है।
अनासक्ति
जब तक सांसारिक सुख लेने की वृत्ति नहीं मिटेगी, तब तक कितना ही पढ़-लिख लें, कितने ही चतुर और समझदार बन जायें, कितनी ही योग्यता का सम्पादन कर लें, कितने ही व्याख्यान दाता बन जायें, कितनी ही पुस्तकें लिख लें किन्तु परम शान्ति नहीं मिलेगी।
संतोष
सांसारिक पदार्थों के संयोग से होने वाला सुख हमारा नहीं है हमारे लिए भी नहीं है; क्योंकि हम तो सदा रहने वाले हैं और सांसारिक सुख मिटने वाला है।
अनासक्ति
हमारे पास जो भी वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य आदि है, वह सब स्थाई नहीं है हमसे भूल यह होती है कि उस वस्तु आदि को हम स्थाई मानकर उससे सुख भोगने लगते हैं इससे हमें विवश होकर दुःख भोगना पड़ता है।
अनासक्ति
जो अहित करने वाली चीज है वह थोड़ी देर के लिए सुंदर बनाने पर भी असुंदर है क्योंकि वह अकल्याणकारी है, सुंदर वही हो सकता है जो कल्याणकारी हो।
विवेक
सौभाग्यशाली वे नहीं जिसके पास धन, दौलत और सुख के साधन हैं बल्कि सौभाग्यशाली वे हैं जिनके पास प्रभु भक्ति व आत्मकल्याण के लिए समय है।
भक्ति
धार्मिक स्थान मनोरंजन का नहीं आत्मरंजन का स्थान है।
धर्म
स्वतंत्र वही हो सकता है जो अपना काम स्वयं कर लेता है।
संयम
सम्पत्ति से नहीं स्वतंत्रता से व्यक्ति सम्राट् बनता है।
संयम
पूर्ण स्वतंत्रता में ही सत्य से साक्षात्कार होता है।
सत्य
निज स्वतंत्रता में स्वर्ग और परतंत्रता में नरक है।
संयम
देश तो स्वतंत्र हो गया पर देह अभी परतंत्र है।
संयम
किसी की मेहरबानी माँगना अपनी आजादी बेचना है।
संयम
स्वभाव केवल आच्छादित ही हो सकता है, विनष्ट नहीं हो सकता है।
ज्ञान
जीव का स्वभाव सिर्फ देखना-जानना है।
ज्ञान