Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 34

मित्रता

109 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

कर्जे में डूबा कोई भी व्यक्ति मानसिक शान्ति का दावा नहीं कर सकता है। आप एक बार कर्ज लेंगे, परन्तु कर्ज बार-बार आपकी चेतना पर हावी हो जाएगा और आप महसूस करेंगे कि आप अपने ही मालिक नहीं रहे हैं।
धन
जीवन का सर्वश्रेष्ठ कार्य संन्यास है।
अनासक्ति
लक्ष्मी के पाते ही मनुष्य कठोर हो जाता है।
धन
संसार में रत्नत्रय से बढ़ा कोई वैभव नहीं है, अतः उसकी रक्षा करनी चाहिए मनुष्य वस्त्रों के बिना शोभित हो सकता परन्तु लज्जा व धैर्य के बिना नहीं।
धर्म
धन-धान्य के प्रयोग में, विद्या के ग्रहण करने में, आहार और व्यवहार में जो लज्जा का त्याग कर देता है वह सुखी होता है।
चरित्र
जो मैला वस्त्र रखने वाला, दाँतों का मैल साफ न करने वाला, अधिक भोजन करने वाला, कटुवादी, सूर्य उदय तक सोने वाला है उसे लक्ष्मी छोड़ देती है चाहे वह भगवान् ही क्यों न हो?
समृद्धि
भवितव्यता जिस पदार्थ को नहीं चाहती, उसे तुम अत्यन्त चेष्टा करने पर भी नहीं रख सकते और जो वस्तुएँ तुम्हारी हैं, तुम्हारे भाग्य में हैं, उन्हें तुम इधर उधर फेंक भी दो, फिर भी वे तुम्हारे पास से नहीं जावेंगी।
कर्म
मित्रता का सम्बन्ध आँख और हाथ के रिश्ते जैसा है, हाथ को चोट लगती है तो आँख आँसू बहाती है और आँख रोती है तो हाथ आँसू, पोंछते हैं।
संगति
दूर से ही आगे बढ़कर मिलना, हृदय के अनुकूल स्पष्ट अर्थ वाली वाणी और सत्कारपूर्वक कुछ देना-इन तीन बातों से मित्र बनते हैं।
संगति
मनुष्य को अपनी ओर खींचने वाला यदि जगत् में कोई असली चुम्बक है तो वह केवल प्रेम है।
संगति
किसी को अपना दुश्मन मत बनाइये, नहीं तो उसके बीस रिश्तेदार भी आपके दुश्मन बन जाएँगे।
संगति
जिनमें नम्रता नहीं आती, वे विद्या का पूरा सदुपयोग नहीं कर सकते हैं।
विनम्रता
जीवन एक पुष्प है और प्रेम उसका पराग।
संगति
जीवन के फूल प्रेम की धूप का स्पर्श पाकर ही खिलते हैं।
संगति
यदि आप लोगों का दिल जीतना चाहते हैं तो उनसे उत्साह से मिलें।
संगति
दोषी को दोषी मत समझो अन्यथा सद्भावना का नाश हो जायेगा।
संगति
दोस्ती खुशी को दुगना करके और दुःख को बाँटकर प्रसन्नता बढ़ाती है तथा मुसीबत कम करती है।
संगति
द्वेष बुद्धि को हम द्वेष से नहीं मिटा सकते, प्रेम की शक्ति ही उसे मिटा सकती है।
संगति
वह मित्र निन्द्य है जो अपने मित्र के धन धान्य और कलत्र (स्त्री) की रक्षा करने में विश्वास घात करता है।
संगति
पड़ोसी से दोस्ती रखें, रिश्तेदारी नहीं।
संगति
प्रशंसा वह हथियार है जिससे शत्रु को भी मित्र बनाया जा सकता है।
संगति
तप, दान, व्रत, शील, संयम आदि के धारण करने की ओर जो प्रेरित करे वही तीनों लोकों में परम मित्र है और जो इन कार्यों में विघ्न करता है तथा हिंसा, असंयम और प्रमाद आदि को प्रेरित करता वह परम शत्रु है।
संगति
मूर्ख छोटा सा काम करते हैं और उसी में बेचैन हो जाते हैं, बुद्धिमान बड़े से बड़ा कार्य आरम्भ करते हैं और निश्चिंत बने रहते हैं।
ज्ञान
मित्र को भूलना आसान है किन्तु शत्रु को भूलना कठिन है।
संगति
सच्चे मित्र के सामने दुःख आधा और हर्ष दोगुना प्रतीत होता है।
संगति
मित्र उन्हें बनाओ जो उम्र, धन, धर्म, विचार और व्यवहार में समान हों।
संगति
सबके साथ हिल-मिलकर रहिए, पता नहीं इस दुनिया में कब, कौन, किसके काम आ जाए।
संगति
मित्रों को पारितोषिक देने से भी अच्छा, शीघ्रता के साथ बैरियों को शांत कर लेना चाहिए।
संगति
मित्र वही है, जो आपत्ति ग्रस्त की सहायता करता है और बंधु वह है जो पथ भ्रष्ट की सहायता करता है।
संगति
आलसी, बकवादी, अहंकारी, लोभी, व्यसनी, मूर्ख एवं असन्तोषी से मित्रता न करें।
संगति
उत्सव में, कष्ट आने पर, अकाल में, शत्रु संकट में, राज्यद्वार पर और शमशान तक जो साथ देता है वहीं बंधु है।
संगति
मित्र के तीन लक्षण हैं—अहित से हटाना, हित में लगाना और मुसीबत में साथ न छोड़ना।
संगति
सच्चा मित्र वह है जो दर्पण के समान तुम्हारे दोषों को तुम्हें दर्शाए। जो तुम्हारे दोषों को गुण बताए वह तो चापलूस है।
संगति
मित्रों के बिना कोई भी जीना पसंद नहीं करेगा, चाहे उसके पास शेष सब अच्छी वस्तुएँ क्यों न हों।
संगति
दोस्ती न करो तो चलेगा लेकिन दुश्मनी भूलकर भी न करना।
संगति
मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र उसका विवेक और सत् (अच्छे) कार्य है।
विवेक
मित्रों की संख्या नहीं गुणवत्ता देखो।
संगति
बुरे मित्रों से बचना ठीक है किन्तु अच्छे मित्रों के संग रहना उससे अच्छा है।
संगति
बनाना ही है तो पुल बनाइए, दीवारें खड़ी करेंगे तो अकेले ही रह जायेंगे।
संगति
अगर आप किसी व्यक्ति की उसके सबसे खराब दिनों में मदद करेंगे तो वह जीवन भर के लिए आपका मित्र बन जाएगा।
संगति
मित्रों को एकान्त में ही बुरा कहो, सबके सामने उनकी प्रशंसा करो।
संगति
आपका अपना व्यवहार ही शत्रु-मित्र बनाने का उत्तरदायी है।
संगति
मित्र सैकड़ों भी कम हैं और शत्रु एक भी अधिक है।
संगति
विदेश में विद्या और घर में पत्नी मित्र होती है रोगी का मित्र औषधि और मृतक का पर लोक में मित्र धर्म ही है।
संगति
मिलने पर मित्र का सम्मान करो, पीठ पीछे उसकी प्रशंसा करो और आवश्यकता पड़ने पर उसकी सहायता करो।
संगति
यदि दृढ़ मित्रता चाहते हो तो मित्र से बहस न करो, उससे उधार लेना-देना व उसकी स्त्री से बात करना छोड़ दो।
संगति
जो मित्रता में से आदर निकाल देता है, वह मित्रता का सबसे बड़ा आभूषण उतार देता है।
संगति
विवेकी मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है।
संगति
मित्र पाने का एक ही मार्ग है—स्वयं किसी का मित्र बन जाना।
संगति
दोस्त बनाने का 'रॉ' मटीरियल है मुस्कान, बिना कुछ खर्च किए केवल प्रसन्नता देकर आप ढेर सारे दोस्त पा लेते हैं जो आपकी जीत के लिए आपको प्रोत्साहन रूपी रसायन देते हैं।
संगति
स्वाभाविक मित्र भाग्य से ही मिलता है इसलिए सच्चे मित्र को कभी नहीं खोना चाहिए, सच्चा मित्र सबसे बड़ा जीवन रक्षक है।
संगति
जिसके दुर्व्यवहार से मन फट गया हो, उसके साथ मैत्री नहीं करनी चाहिए।
संगति
सच्ची मित्रता का अर्थ प्रेम व्यवहार नहीं, अपितु आपसी हितैषी भाव हैं।
संगति
मूर्ख, दुर्जन, चण्डाल और पतित पुरुषों के साथ मैत्री न करें।
संगति
जीवन में मित्रता से बढ़कर कोई बहुमूल्य वस्तु संचित करने योग्य नहीं है।
संगति
यदि संसार बन्धन से मुक्त होना हो तो प्राप्त वस्तुओं में ममता का और अप्राप्त वस्तुओं की कामना का त्याग कर दो।
अनासक्ति
विपत्ति के समय विलाप करने से दुःख कम नहीं होता बल्कि बढ़ता ही है।
मन
जो कहना न माने, वह अपना कैसा? और जो सच हो जाए, वह सपना कैसा ?
संगति
धन हो या न हो किन्तु अच्छे मित्र सदा होना चाहिए।
संगति
शैक्ष्य काल और बाल्यकाल में माता-पिता, दीक्षा में गुरु, पर लोक में धर्म काम आता है किन्तु मित्र सदा सहायक होते हैं।
संगति