Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 34

मित्रता

109 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

सूर्य कहाँ और कमल कहाँ, मेघ कहाँ और प्रमुदित मयूर कहाँ, चन्द्रमा कहाँ और समुद्र वृद्धि कहाँ? ठीक है दूरी के कारण सत्पुरुषों की मित्रता टूटती नहीं है।
संगति
संसार में कोई किसी का शत्रु-मित्र नहीं, जीव के अशुभ भाव शत्रु और शुभ भाव मित्र हैं।
संगति
मधुर वाणी और मधुर व्यवहार से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं।
संगति
रिश्ता दिल से होना चाहिए शब्दों से नहीं और नाराजगी शब्दों में होना चाहिए, दिल में नहीं।
संगति
खुश नसीब वो नहीं जिसका नसीब अच्छा है, खुश नसीब वो हैं जो अपने नसीब से खुश हैं।
संतोष
वर्तमान की परिणति से भविष्य की गति बनती है।
कर्म
घर वह है जहाँ माँ है। आगन्तुक का मुस्कुराकर स्वागत करें।
परिवार
तुम दुनिया में सबसे जीत सकते हो सिवाय उस इंसान के जो आपकी खुशी के लिए जानबूझकर हार जाता है।
संगति
जब दोस्त प्रगति करे तो गर्व से कहना वो मेरा दोस्त है और जब दोस्त मुसीबत में हो तब कहना मैं उसका दोस्त हूँ।
संगति
दीपक मिट्टी का है या सोने का यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वह रोशनी कितनी दे रहा है यह महत्त्वपूर्ण है, इसी तरह दोस्त अमीर है या गरीब यह महत्त्वपूर्ण नहीं बल्कि मुसीबत में वह हमारे साथ रहा या नहीं ये महत्त्वपूर्ण है।
संगति
स्वार्थ दोस्त को दुश्मन बना देता है, दोस्ती समर्पण व त्याग माँगती है।
संगति
राजा, ब्राह्मण, वैद्य, मूर्ख, मित्र, गुरु और प्रियजनों के साथ कभी विवाद नहीं करना चाहिए। लोग इहलोक-परलोक में मित्र को कभी दुःखी नहीं देखना चाहते हैं।
संगति
जो बात माता-पिता, गुरु अथवा भाई से नहीं कही जा सकती वह गुप्त बात मित्र से कही जा सकती है।
संगति
पवित्रता, त्यागशीलता, शूरवीरता, सुख-दुःख में समानता, सरलता, अनुराग और सत्य व्यवहार ये मित्र के गुण हैं।
संगति
मत भिन्नताएँ अनेक हो सकती हैं, पर मन भिन्नताएँ नहीं होना चाहिए।
संगति
सारे साथी काम के सबका अपना मोल। जो संकट में साथ दे वो सबसे अनमोल॥
संगति
शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे मित्र बनाये रखना चाहिए।
संगति
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं—पहले जो मौका आने पर साथ छोड़ देते हैं? दूसरे वो जो साथ देने के लिए मौका ढूढ़ते हैं।
संगति
प्यार से विष भी पिला सकते हैं, लेकिन बल पूर्वक दूध पिलाना भी मुश्किल है।
संगति
शुद्ध कमाई का धन और सत्य शिक्षक मित्र संसार में दुर्लभ हैं।
संगति
जिसका कोई साथी होता है, वह बलवान होता है।
संगति
मित्र दुःख में हो या सुख में वह अपने मित्र की सदा सहायता करता है।
संगति
साथ में यात्रा करने वाला साथी ही प्रवासी के मित्र हैं, पत्नी गृह-वासी का मित्र है, वैद्य रोगी का मित्र है और दान मरते हुए मनुष्य का मित्र है।
संगति
विद्या, शूरवीरता, दक्षता, बल और धैर्य ये मनुष्य के स्वाभाविक मित्र हैं।
संगति
शोक और भय से रक्षा करने वाला तथा प्रीति और विश्वास का पात्र ऐसे दो अक्षर वाले मित्र रूपी रत्न को किसने बनाया है?
संगति
सन्तों ने कहा है कि अच्छे मित्र का यही लक्षण है कि वह पाप से रोकता है, हितकारी कार्यों में लगाता है, उसकी गुप्त बात अन्य से छिपाता है, उसके गुणों को प्रकट करता है, विपत्ति काल में उसका साथ नहीं छोड़ता और समय आने पर धन देता है। उसी प्रकार मित्र को प्रिय व्यवहार करना चाहिए, जिस प्रकार हाथ शरीर का हित करते हैं, पलकें आँखों को प्रिय लगे वैसा करती हैं।
संगति
मित्र के शत्रु बन जाने पर भी पहले कही गयी बातों को तथा उसके दोषों को जानकर भी कहीं भी कभी भी प्रकट नहीं करना चाहिए।
संगति
वे ही वंदनीय हैं, वे ही पुण्यात्मा हैं और उन्हीं का इस संसार में जन्म लेना प्रशंसनीय है जो अपना काम छोड़कर अपने मित्रों का कार्य सिद्ध करते हैं।
संगति
विवाद करना, लेन-देन करना, माँगना, मित्र के घर की स्त्रियों से मिलना-जुलना, हर काम में स्वयं आगे रहना; इन सबसे मित्रता टूट जाती है।
संगति
सत्पुरुष से जो मित्रता होती है, उस मित्रता से बढ़कर श्रेष्ठ कुछ नहीं है।
संगति
कुलीन व्यक्तियों के साथ संपर्क, विद्वानों के साथ मित्रता और जाति-बंधुओं के साथ मेल करने वाला मनुष्य नष्ट नहीं होता है।
संगति
प्रेम की शक्ति दंड की शक्ति से हजार गुनी प्रभावशाली और स्थायी होती है।
संगति
किसी के साथ अत्यन्त प्रेम न करो और प्रेम का सर्वथा अभाव भी न होने दो क्योंकि ये दोनों ही महान् दोष हैं, अतः मध्यम स्थिति पर ही दृष्टि करो।
संगति
घृणा लड़ाई-झगड़ों को जन्म देती है, पर प्रेम सब अपराधों को क्षमा कर देता है।
संगति
जो प्रेम से नहीं सुधर सकता वह कभी नहीं सुधर सकता।
संगति
प्रेम और वासना में उतना ही अंतर है, जितना कंचन और काँच में।
अनासक्ति
प्रेम कभी दावा नहीं करता वह सदा देता है, प्रेम तकलीफ उठाता है, न क्रोध करता है, न बदला लेता है।
संगति
जो व्यक्ति अकेले में तुम्हें तुम्हारा दोष बताए, उसे अपना मित्र समझो।
संगति
तुम जिन कठिनाइयों में फँसे हुए हो, उनको जो लोग दूर कर सकते हैं और आने वाली बुराइयों से जो लोग तुम्हें बचा सकते हैं, तुम उत्साहपूर्वक उनके साथ मित्रता करने की चेष्टा करो। जिस आदमी को ऐसे लोगों की मित्रता का गौरव प्राप्त है जो उसे डाँट फटकार सकते हैं तो उसे हानि पहुँचाने वाला कौन है?
संगति
बहुत से लोगों को शत्रु बना लेना मूर्खता है किन्तु सज्जन पुरुषों की मित्रता को छोड़ना उससे भी कहीं अधिक मूर्खता है।
संगति
जगत् में ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसको प्राप्त करना इतना कठिन है जितना कि मित्रता को और शत्रुओं से रक्षा करने के लिए मित्रता के समान अन्य कौन-सा कवच है?
संगति
मित्रता का उद्देश्य हँसी-विनोद करना नहीं है, बल्कि जब कोई बहक कर कुमार्ग में जाने लगे तो उसे रोकना और उसकी भर्त्सना करना ही मित्रता का लक्ष्य है।
संगति
उस आदमी का हाथ देखो जिसके कपड़े हवा में उड़ गये हैं, कितनी तेजी के साथ फिर से अपने अंग को ढकने के लिए फुर्ती करता है? यही सच्चे मित्र का आदर्श है, जो विपत्ति में पड़े हुए मित्र की सहायता के लिए दौड़कर आता है।
संगति
जिस मित्रता में हिसाब लगाया जाता है, उसमें एक प्रकार का कंगलापन होता है, वह चाहे कितने ही गर्वपूर्वक कहें कि ''मैं उसको इतना प्यार करता हूँ और वह मुझे इतना चाहता है।''
संगति
जिस मनुष्य को तुम अपना मित्र बनाना चाहते हो, उसके कुल का उसके गुण-दोषों का, कौन-कौन लोग उसके साथी हैं और किन-किनके साथ उसका सम्बन्ध है, इन बातों का अच्छी तरह से विचार कर लो और इसके पश्चात् यदि वह योग्य है तो मित्र बना लो।
संगति
आपत्ति में एक गुण है, वह एक मापदण्ड है, जिससे तुम अपने मित्रों को नाप सकते हो।
संगति
निःसन्देह मनुष्य की बुद्धिमानी इसी में है कि मूर्खों से मित्रता न करें।
संगति
जो लोग संकट के समय धोखा दे सकते हैं, उनकी मित्रता की स्मृति मृत्यु के समय भी हृदय में दाह पैदा करती है।
संगति
पवित्र लोगों के साथ बड़े चाव से मित्रता करो; लेकिन जो अयोग्य हैं उनका साथ छोड़ दो, इसके लिए चाहे तुम्हें कुछ भेंट भी देना पड़े।
संगति