Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 24

गुरु

81 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

एकाग्रता एक उपयोगी, निरापद, निश्चित, लाभदायक और प्राप्त करने योग्य गुण है।
ध्यान
अपने गुरु के प्रति अपने प्रभु के प्रति अपने पति के प्रति यदि अशुभ परिणाम हो रहे हों तो बस समझ लेना कि मेरी खोटी गति का बंध हो गया है व मेरे तीव्र पाप कर्म का उदय चल रहा है।
कर्म
गम्भीरता सज्जनों का पहला गुण होता है।
चरित्र
दूरदर्शिता, साहस और गंभीरता के बिना जिंदगी एक अंधा तजुर्बा है।
चरित्र
सच्चा बड़प्पन स्थान से कभी नहीं मिलता और न वह उपाधियों के वापस ले लेने पर कभी खो ही जाता है।
चरित्र
मस्तिष्क को शान्त रखने वाला सदैव विजयी होता है।
संयम
युवकों में जोश और प्रौढ़ों में होश की प्रधानता होती है।
चरित्र
गम्भीरता में जो प्रतिष्ठा निहित है वह वाचालता में त्रिकाली संभव नहीं है। ''एक क्षण का असंयम अनंत संसार का कारण है।''
चरित्र
जैसे उत्साह स्त्रियों का गुण है, उसी तरह गंभीरता पुरुषों का गुण है।
चरित्र
वह पुरुष धन्य है, जिसने गम्भीरता पूर्वक स्वाध्याय किया है और सत्य को पा लिया है, वह वैसे मार्ग पर चलेगा, जिससे उसे पुनः इस संसार में न आना पड़े।
ज्ञान
अनुशासन, कर्त्तव्यनिष्ठा और विश्वसनीयता ये तीन ऐसे गुण हैं, जिन्हें देखकर गुरु खुश होते हैं।
भक्ति
सच्ची शिक्षा—ममता छोड़ो मनन करो, बाधक नहीं साधक बनो, भोले नहीं पर सरल बनो, स्वच्छन्द नहीं पर स्वतन्त्र बनो, कुटिल नहीं पर चतुर बनो, मानी नहीं पर महान् बनो, कृतघ्नी नहीं कृतज्ञ बनो, क्रूर नहीं करुणा करो, शत्रुता नहीं मित्रता करो, हैवान नहीं इंसान बनो, भोगी नहीं योगी बनो, ईर्ष्यालु नहीं सच्चे इंसान बनो, कंस नहीं कृष्ण बनो, रावण नहीं राम बनो, मरीचि नहीं महावीर बनो।
ज्ञान
मैं उच्च शिक्षा उसी को कहूँगा जिसे पाकर मनुष्य विनम्र, परोपकारी, सेवाभावी और कार्य तत्पर बन जाये।
ज्ञान
सन्त के हाथों से लिखा गया हर शब्द 'ग्रन्थ' होता है और सन्त के मुँह से निकला हुआ हर शब्द 'मंत्र' होता है।
भक्ति
जो व्यक्ति अपनी वाणी, मन, क्रोध, जिह्वा, उदर और लिंग; इन छह के वेग को जीत लेता है, वही धीर कहलाता है, उसी को पूरी पृथ्वी पर शिष्य बनाने का अधिकार है अर्थात् वही गुरु बनने योग्य है।
संयम
गुरु अच्छा और सच्चा होना चाहिए।
भक्ति
गुरु जीवन को साक्षर नहीं अपितु सार्थक भी करते हैं।
भक्ति
जो दुनिया का गुरु बनता है, वह दुनिया का गुलाम हो जाता है और जो अपने आपका गुरु बनता है, वह दुनिया का गुरु हो जाता है।
संयम
गुरु से कुछ छिपाने का तात्पर्य है स्वयं को अशुद्ध रखना।
भक्ति
स्वाध्याय से भी अधिक श्रेष्ठ है गुरु सेवा।
भक्ति
गुरु के निर्देशन के आगे अपना चिन्तन एक किनारे रखना चाहिए।
भक्ति
जहाँ गुरुओं के प्रति भक्ति व प्रेम उमड़ता है वहाँ कर्त्तव्य स्वयं दौड़ लगाने लगते हैं।
भक्ति
सम्यक् शिष्य गुरु के वचन को अमृत समझकर स्वीकार करता है।
भक्ति
गुरु वही हो सकता है, जो गुणों और चरित्र में ज्यादा भारी है।
भक्ति
संन्यासी का जन्म माँ की कोख से नहीं, गुरु के वरद हस्त से होता है।
भक्ति
गुरु के निकट होकर दूर होना श्रेष्ठ नहीं, दूर होकर निकट होना अतिश्रेष्ठ है।
भक्ति
गुरु का विश्वास पात्र बनना, उनका मन जीतना, जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
भक्ति
जिसके जीवन की डोर गुरु के हाथ होती है उसकी पतंग आकाश में नहीं अनन्त आकाश की भी यात्रा करती है।
भक्ति
गुरु स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं, परमार्थ सिद्धि के लिए उपदेश देते हैं।
भक्ति
जैसे चार सौ चाचा की अपेक्षा एक पिता श्रेष्ठ होता है, वैसे ही हजारों संतों की अपेक्षा एक गुरु श्रेष्ठ होता है।
भक्ति
यदि आपका शिष्यत्व ही झूठा है तो आप कभी गुरु न पा सकोगे।
भक्ति
बुद्धिमान लोग गुरु का ऋण बहुत मानते हैं क्योंकि ऋण तो आसानी से लौटाए जा सकते हैं किन्तु ज्ञान का ऋण सबके लिए लौटाना सम्भव ही नहीं है।
भक्ति
यदि इहलौकिक व पारलौकिक सुख-प्राप्ति में बाधा न पड़ती हो तो गुरु के वचनों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
भक्ति
वह गुरु, पिता और मित्र निन्दनीय है जो अपने शिष्य, पुत्र और मित्र के दोषों की निन्दा बहुतों के सामने करता है और उसे नैतिक शिक्षा नहीं देता है।
वाणी
भगवान् बैठे हुए मुनि हैं और 'मुनि' चलते फिरते भगवान् हैं।
भक्ति
बड़प्पन अमीरी में नहीं किन्तु ईमानदारी और सज्जनता में है।
चरित्र
मैं महान् उनको मानता हूँ, जो स्वयं अपना मार्ग बनाते हैं परन्तु कभी मिथ्या मार्ग पर चल पड़े तो लौट आने का साहस और बुद्धि भी रखते हैं।
चरित्र
सन्तान के लिए तो माता-पिता ही प्रथम गुरु और सर्वथा पूज्य हैं।
परिवार
शास्त्र मील के पत्थर की भाँति हैं, जो मंजिल की तरफ इशारा करते हैं।
ज्ञान
शिक्षक में माता की ममता, पिता का प्यार, वैज्ञानिक सी सूझबूझ, तपस्वी सा मन और किसान जैसी सहजता-सरलता होनी चाहिए।
ज्ञान
शिक्षा का उद्देश्य मस्तिष्क को भरना नहीं, उसका पूर्ण विकास करना है।
ज्ञान
जिस शिक्षा में समाज और देश के कल्याण की चिंता के तत्त्व नहीं हैं, वह कभी सच्ची शिक्षा नहीं कही जा सकती है।
ज्ञान
शिक्षा राष्ट्र की सस्ती सुरक्षा है।
ज्ञान
शिक्षा का मतलब—व्यक्ति का समाजोपयोगी विकास करना है।
ज्ञान
जो मूर्ख और अहंकारी को शिक्षा दे, उसे स्वयं शिक्षा की जरूरत है।
ज्ञान
शिक्षक का आचरण ही बच्चों की असली किताब है।
ज्ञान
बच्चे को गधा कहकर शिक्षा देना, उसे लात मारने की कला सिखाना है।
ज्ञान
शिक्षा जीवन निर्वाह से अधिक जीवन निर्माण के लिए होनी चाहिए, उसका ध्येय जीविका मूलक नहीं जीवन मूलक होना चाहिए।
ज्ञान
आपके बल प्रयोग की अपेक्षा आपकी सज्जनता हमें सज्जनता की ओर चलने के लिए अधिक प्रेरित करती है।
चरित्र
सन्तों के शब्द उन्हें समझ में आते हैं, जो श्रद्धा से भरे होते हैं।
भक्ति
सन्त जलते हुए दीप हैं, जो बुझे हुए दीपों को जलाते हैं।
भक्ति
पदार्थ का स्पर्श करते ही जिह्वा स्वाद को जान लेती है उसी प्रकार श्रद्धालु भी पलक झपकते ही सन्त को पहचान लेते हैं।
भक्ति
मूर्ख दोस्तों के साथ बैठकर मुस्कुराने की अपेक्षा सन्त के सामने रोना अच्छा है।
संगति
सन्तों की कृपा दृष्टि भाग्य तक बदल देती है।
भक्ति
हृदय का मैल जल से नहीं, सन्तों की चरण रज से साफ होता है।
भक्ति
तपस्वी का मुख मंडल ऐसा होना चाहिए कि जो तपस्वी नहीं है, वे भी तपस्या की ओर उन्मुख हो जाएँ।
भक्ति
तत्त्वज्ञान रहित जीवों के परिग्रह का परित्याग (मुनिपना) भी निष्फल होता है।
ज्ञान
सन्तों को साधनों से नहीं साधना से स्नेह रखना चाहिए।
धर्म
जिसके पास भीतर कुछ होता है, वही बाहर सब कुछ छोड़ सकता है।
अनासक्ति
सच्चे साधु वही हैं जो अपनी आयु को मनुष्य और प्राणीमात्र की भलाई के लिए लगा देते हैं।
धर्म