Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 24

गुरु

81 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

जिस प्रकार चन्दन जलाये जाने या घिसे जाने पर भी अपनी सुरभि का परित्याग नहीं करता, उसी तरह सच्चे सन्त संकट आने पर अपनी साधना का त्याग नहीं करते हैं।
धर्म
सच्चा साधक लोभ और भय के आगे झुक नहीं सकता है।
चरित्र
जिसके पास सब कुछ होता है उसे राजा कहते हैं किन्तु जिसके पास कुछ भी नहीं होता उसे महाराजा कहते हैं।
अनासक्ति
सद्भाव में तो दुनिया सुखी रहती है पर सन्तों की विशेषता है कि वे अभाव में भी सुखी रहते हैं।
संतोष
मन में भगवान् का स्मरण बना रहे और मर्यादा का उल्लंघन न हो, यही सन्त का लक्षण है, संत प्रत्यक्ष शिक्षा न देते हों, तो भी उनकी सेवा करनी चाहिए।
भक्ति
धनी लोग तो दूसरे को नौकर बनाते हैं, पर सन्त लोग दूसरे को भी सन्त ही बनाते हैं। संत जिस पर प्रसन्न होते हैं वह सदा सुखी रहता है।
भक्ति
जो सन्त के सामने झुकते नहीं हैं, प्रकृति उनका सारा शरीर झुका देती है, वक्त की मार जब पड़ती है तो सन्त क्या शैतान के सामने भी सिर झुकाना पड़ता है।
विनम्रता
दुनिया पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं करना, वह कब, किस ओर लुढ़क जाए पता नहीं, गुरु जो रास्ता दिखाए, बस उसी पर चलना। वह सुई कभी नहीं खोती जिसमें धागा होता है। उसी प्रकार वह जीव कभी नहीं रोता जिसके अंदर जिनवाणी रूपी सूत्र होता है।
भक्ति
जीवन में वही गुरु बना पाता है जिसके भीतर का गुरुर मिट जाता है।
विनम्रता
गुरु आपत्ति काल के सिवाय शिष्य के विद्याध्ययन में विघ्न न डाले।
ज्ञान
दूध में चावल मिलाने से खीर बनती है, सद्गुरु के चरणों में झुकने से तकदीर बनती है।
भक्ति
सच्चे गुरु से ज्यादा कठिन समर्पित शिष्य का मिलना है।
भक्ति
गुरु के चरणों में समर्पण सिर पर ही नहीं सिद्धालय में भी बिठा देता है।
भक्ति
गुरु को शिष्य के मन का और शिष्य को गुरु के तन का ख्याल रखना चाहिए।
भक्ति
गुरु जो करें वह नहीं अपितु गुरु जो कहें वह करना चाहिए।
भक्ति
कितनी भी परेशानी आ जाये पर आप गुरु को मत छोड़ना।
भक्ति
दीक्षा गुरु एक हो सकते हैं, शिक्षा गुरु अनेक हो सकते हैं परन्तु श्रद्धा गुरु तो तीन कम नौ करोड़ होते हैं।
भक्ति
जहाँ प्रेम है वहाँ स्वर्ग है।
विविध
गुरु को खुश करने का उपाय सिर्फ गुरु की विनय है।
भक्ति
संसार में भाई तो इस लोक में प्रीति उत्पन्न करता है किन्तु गुरु तो इसलोक परलोक दोनों में प्रीति उत्पन्न करते हैं।
भक्ति
गुरु आज्ञा भंग करने वाले शिष्य की कभी समाधि नहीं हो सकती है।
भक्ति