Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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1104 सूत्र · पृष्ठ 11 / 15

वह बाह्य सौन्दर्य किस काम का, जिसके हृदय में भूषण के समान प्रेम न हो।
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प्रेम मनुष्य का प्राण है। जिसमें प्रेम नहीं, वह केवल मांस में लिपटी हुई हड्डियों का ढेर है।
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भलाई और बुराई का प्रसंग तो सभी को आता है, पर एक 'न्याय निष्ठ मन' बुद्धिमानों के लिए गर्व की वस्तु है।
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रणक्षेत्र में खड़े होकर वीरता के साथ मृत्यु का सामना करने वाले लोग तो बहुत हैं; परन्तु ऐसे लोग बहुत ही थोड़े हैं, जो बिना काँपे श्रोताओं के समक्ष सभा मंच पर खड़े रह सकें।
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बुराई का त्याग करना, भलाई को स्वीकार कर पालन करना ही श्रेष्ठ चक्रवर्ती व्रत है क्योंकि व्रत बंधन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का द्वार है।
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अन्तःकरण की पवित्रता दुर्गुणों के त्याग करने से होती है।
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जो मनुष्य को ठगने में चतुर, दूसरों से प्रेम करने वाली, पाप युक्त तथा कपट आदि सैकड़ों दुर्गुणों की खान ऐसी वेश्या नरक का घर होती है।
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झूठी प्रशंसा से प्रसन्न होना अपने पतन के द्वार खोलना है।
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जो कुबुद्धि जन पर्व के दिन उपवासादि चारित्र को छोड़कर कामादि सेवन करता है वह निश्चय ही नरक का स्वामी होता है।
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अच्छे व्यवहार छोटे-छोटे त्याग से बनते हैं।
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तन के साधु बहुत हैं पर विषयों से रिक्त मन वाले साधु विरले होते हैं।
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जैसे सर्प के पास मणि, हाथी के पास मोती, श्रावक के पास सम्पत्ति न हो तो उसकी कीमत नहीं, वैसे ही साधु के पास समता नहीं तो कुछ नहीं है।
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समता, सहजता, सरलता, वैराग्य, संयम ही साधुता की पहचान है।
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प्रशंसा के समय अध्यात्म दृष्टि रखने वाला प्रशंसा के अभाव में दुःख न पावेगा, अपनी प्रशंसा में रुचि होना पुण्य विनाश करना है और पाप को बुलाना है व संसार में भटकने के लिए अमंगल करना है।
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प्रतिकूल कारण मिलने पर भी जो चारित्र व समता से च्युत नहीं होते वे दृढ़ प्रतिज्ञ धर्मवीर कहलाते हैं।
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आचरण से प्रस्तुत उपदेश प्रभावी होता है।
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मुनि कष्ट सहने में वीर किसी बात को सुनने में धीर व निर्णय लेने में गम्भीर होते हैं।
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मुनि क्रिया करते हैं, प्रतिक्रिया नहीं करते हैं।
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स्व कल्याण की भावना से रिक्त, पर-कल्याण की भावना रखने वाला संत कैसे हो सकता है?
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कोई भी चालक गाड़ी को गड्ढे में गिराना नहीं चाहता है, खराब होने पर सुधार कर आगे बढ़ाता है उसी प्रकार साधक व्रत में दोष लगाना नहीं चाहता है लग जाये तो प्रतिक्रमण, प्रायश्चित लेकर मोक्षमार्ग में आगे बढ़ता है।
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साधु चलते फिरते तीर्थ और धरती के मूर्तिधारी देवता होते हैं।
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सिंह भले ही भूख से दुर्बल हो, प्यास से पीड़ित हो, शरीर से शिथिल हो, कष्टमय अवस्था में हो, प्राण नष्ट हो रहे हों फिर भी जीर्ण तृण को नहीं खाता है, उसी प्रकार सच्चा साधु कितना ही कष्टमय जीवन व्यतीत करे किन्तु अपने व्रतों में दोष नहीं लगाता है।
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मैं उस शरीर को शरीर मानता हूँ जो चारित्र तथा तप करने में समर्थ है परीषह सहन करने वाला है धीर है अन्य शरीर पाप करने वाला है।
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सब प्रकार की ईर्ष्या से रहित स्वभाव के समान दूसरा और कोई बड़ा वरदान नहीं है।
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अहंकार में निकले वचन हमेशा झूठे समझो।
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साधुओं को श्रावक के प्रति वात्सल्य भाव रखना चाहिए क्योंकि श्रावक साधु के पास शान्ति पाने के लिए आता है।
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आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व बनाये रखने के लिए प्रसन्न चित्त दिखना आवश्यक है, स्नेह-प्रेम और सद्भावना से भरे हृदय में मधुरवाणी और व्यवहार में आकर्षण अपने आप दिखाई देता है।
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अभिषेक की धारा की तरह सुधार शीर्षस्थ लोगों से शुरू होना चाहिए।
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जिन्दगी में जो चाहे हासिल कर लो, बस ख्याल रखना कि आपकी मंजिल का रास्ता कभी लोगों के दिलों को तोड़ता हुआ न गुजरे।
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अच्छा 'दिल' सम्बन्धों को तो जीत सकता है, पर अच्छा स्वभाव जीवन भर निभा सकता है।
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वस्तुतः जिनके भीतर आचरण की दृढ़ता रहती है, वे ही विचार में निर्भीक और स्पष्ट हुआ करते हैं।
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नेतृत्व उस व्यक्ति को मिलता है जो खड़ा होकर अपने विचार व्यक्त कर सके।
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कुलीन व्यक्ति स्वभाव की सरलता के कारण अपमानित होने पर भी कटु वचन नहीं बोलता है; मलय चन्दन के वृक्ष पर परशु का प्रहार किए जाने पर भी दुर्गन्ध नहीं निकलती है।
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इंसान तो हर घर में जन्म लेते हैं बस इन्सानियत कहीं-कहीं है।
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वाणी से बढ़कर चरित्र की निश्चित परिचायिका और कोई चीज नहीं।
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जिसकी चर्चा और चर्या एक होती है उसकी वाणी में ओज होता है।
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सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है जो वाणी से नहीं अपने आचरण से दिया जाता है।
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अच्छे (नेक) बनने में सारी आयु लग जाती है, बदनाम होने में एक दिन भी नहीं लगता है।
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अच्छा सम्मान पाने की राह यह है कि आप जैसा प्रतीत होने की भावना करते हो वैसा करने का प्रयत्न करो।
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वर्दी (वेश) की गरिमा को दाग न लगने दें।
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अपने प्राण अथवा धन देकर यश की रक्षा करना चाहिए।
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जिन लोगों को अपनी कीर्ति प्यारी है, वे अपने दोष को राई के समान छोटा होने पर भी ताड़वृक्ष के बराबर समझते हैं।
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दुर्जन की विद्या विवाद के लिए होती है, सज्जन की विद्या अज्ञान दूर करने के लिए होती है, दुर्जन का धन अहङ्कार के लिए होता है, सज्जन का धन दान के लिए होता है, दुर्जन की शक्ति दूसरों को परेशान करने के लिए होती है, सज्जन की शक्ति जीवों की रक्षा के लिए होती है।
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जिनके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, ब्रह्मचर्य, गुण और धर्म नहीं है वे मनुष्य लोक में पृथ्वी पर भार स्वरूप मनुष्य के रूप में पशु के समान विचरण कर रहे हैं।
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भूख सहो, दारिद्र सहो, सहो लोक अपवाद। निन्द काम तुम मत करो, यही ग्रन्थ का सार।।
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पर औगुण मुख न कहे, पोषै पर के प्राण। विपदा में धीरज धरे, ये लक्षण विद्वान्।।
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मूढ़ मुढ़ाना बहुत सरल है, मन मुण्डन आसान नहीं। व्यर्थ भभूत लगाना तन पर, गर भीतर का ज्ञान नहीं।।
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मन भर वाचन की अपेक्षा कण भर पाचन अच्छा है, और उच्चारण की अपेक्षा उच्च आचरण अच्छा है।
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दुरभिनिवेश- न्याय मार्ग को भूलकर दूसरों का तिरस्कार करने के भाव से कार्यकरने को दुरभिनिवेश कहते हैं।
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ब्रह्मचर्य, परोपकार, अहङ्कार का अभाव, क्षमा, धैर्य और लोभ का परिहार ये विद्या के परिपाक के उज्ज्वल फल हैं।
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व्यक्ति को लायक बनने में वर्षों लगते हैं, नालायक बनने के लिए एक क्षण ही काफी है।
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सैकड़ों मूर्ख पुत्रों की अपेक्षा एक गुणवान पुत्र अच्छा है, क्योंकि एक चन्द्रमा अन्धकार को दूर कर देता है सैकड़ों तारें नहीं।
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आपको ए ग्रेड का बनना है तो सिगरेट पीना छोड़ो।
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आज कल के विद्यार्थी विद्या का सदुपयोग न कर विद्या की अर्थी निकालते हैं, यदि अनूकूल नहीं हुआ तो हड़ताल करते है, हजारों विद्यार्थियों को अन्तराय डालते हैं।
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जो काम करने में धीमा, बुद्धिहीन, विवेकहीन, विषय लोलुपि, अहङ्कारी, मायावी, आलसी, फूट डालने वाला, निद्रालु, ठगिया, धनधान्य में अति तीव्र लालसा रखने वाला हो वह नील लेश्या वाला कहलाता है।
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दूसरे के ऊपर क्रोध करना, दूसरे की निन्दा करना, अनेक प्रकार से दूसरों को दुःख देना अथवा औरों से बैर करना, अधिकतर शोकाकुलित रहना तथा भयग्रस्त रहना, दूसरों के ऐश्वर्यादि को सहन न कर सकना, दूसरे का तिरस्कार करना, अपनी नाना प्रकार से प्रशंसा करना, दूसरों के ऊपर विश्वास न करना, अपने समान दूसरों को भी मानना, स्तुति करने वाले पर सन्तुष्ट हो जाना, अपनी हानि वृद्धि को कुछ भी न समझना, रण में मरने की प्रार्थना करना, स्तुति करने वाले को खूब धन दे डालना, अपने करने योग्य अथवा नहीं करने योग्य का विवेक नहीं होना ये सब कापोत लेश्या वाले के चिन्ह है।
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अपने करने योग्य अथवा नहीं करने योग्य, सेवन करने योग्य अथवा नहीं सेवन करने योग्य को समझने वाला हो, सबके विषय में समदर्शी हो, दया और दान में तत्पर हो, मन-वचन और काय के विषय में कोमल परिणामी हो ये सब पीत लेश्या वाले के चिन्ह हैं।
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दान देने वाला हो, सरल परिणामी हो, जिसका उत्तम कार्य करने का स्वभाव हो, कष्टरूप तथा अनिष्ट रूप उपद्रवों को सहन करने वाला हो, मुनिजन, गुरुजन आदि की पूजा में प्रीति युक्त हो, ये सब पद्म लेश्या वाले के लक्षण हैं।
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सफल सीख- स्वस्थ बनो पर मोटे नहीं, चंगे (पतले) बनों पर निर्बल नहीं, बलवान बनो पर दुष्ट नहीं, सरल बनो पर मूर्ख नहीं, धीर बनो पर सुस्त नहीं, न्यायी बनो पर निर्दयी नहीं, उत्साही बनो पर जल्दबाज नहीं, दृढ बनों पर हठी नहीं, समालोचक बनो पर निन्दक नहीं, प्रशंसक बनो पर चापलूस नहीं, स्पष्ट बनो पर उद्दंड नहीं, चतुर बनो पर कुटिल नहीं, योगी बनो पर रोगी नहीं, विनम्र बनो पर याचक नहीं, साधु बनो पर स्वादु नहीं।
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विवेक, सन्तोष, दया, क्षमा, ज्ञान, शुभदान, निरहंकारता, जितेन्द्रियता और निष्कषायता ये गुण मनुष्यों को सदा सुखदायक होते हैं।
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विद्वान् नेत्रों से हँसते हैं, मध्यम पुरुष दाँतों से हँसते हैं, अधम पुरुष अट्टाहास करते हैं, मुनीश्वर हास्य नहीं करते हैं।
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महापुरुषों का यह स्वभाव है धन होने पर दान देते हैं, शक्ति होने पर क्षमा करते हैं, दुःख आने पर दीनहीन नहीं होते और आचरण से छलावा नहीं करते हैं।
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ब्राह्मण भोजन से सन्तुष्ट होते हैं, मयूर मेघ के गरजने से सन्तुष्ट होते हैं, सज्जन दूसरों की सम्पत्ति को देखकर सन्तुष्ट होते हैं, और दुष्ट दूसरों की विपत्ति को देखकर सन्तुष्ट होते हैं।
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नीति से रहित नेता, विनय से रहित शिष्य, ब्रह्मचर्य से रहित व्रती, शान्ति से रहित साधु, जीव से रहित देह, पुण्य से रहित प्राणी और धन से रहित गृहस्थ का कोई मूल्य नहीं है।
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मुस्कराहट एक ऐसा अस्त्र है जो न चुभता है न चूकता है और मुस्कान बड़ी-बड़ी मुश्किलों को आसान बना देती है।
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रामचन्द्रजी का जन्म नवमी को हुआ, नौ का अङ्क अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता पूरा पहाड़ा पढ़ लिजिए, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी मर्यादा को कभी नहीं छोड़ा था।
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नाम को पकड़ने वाला मर जाता है, गुणों को पकड़ने वाला तर जाता है।
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सफल व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान माना जाता है, साधु वस्त्र त्याग से नहीं क्रिया से होता है, धर्मस्थल प्रदर्शन से नहीं प्रार्थना से होता है, सम्प्रदाय संख्या से नहीं सामूहिक क्रियाओं के करने से सफल माना जाता है।
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जिनका मुख प्रसन्नता का घर है, हृदय दया सहित है, वचन अमृत झराने वाले हैं और कार्य परोपकार करना है, वे सज्जन सभी के द्वारा वन्दनीय होते हैं।
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अच्छा नेता वह नहीं जो चुनाव जीतता है, बल्कि अच्छा नेता वह होता है, जो लोगों के दिलों को जीतता है।
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जिसके पास सत्य, तप, इन्द्रिय विजय नहीं है, प्राणी मात्र के प्रति दया नहीं है वह चाण्डाल कहलाता है।
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इस जगत् में सत्पुरुष वे हैं जो उत्तम तप, चारित्र तथा यम आदि को स्वीकृत कर प्राणान्त होने पर भी नहीं छोड़ते हैं।
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बोलो तो ऐसे कि लोग लिखने लगें, आचरण करो तो ऐसा कि लोग सीखने लगें।
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आपका व्यवहार व्यक्तित्त्व का आईना और चारित्र की कसौटी है, व्यक्ति की महानता का आधार परिवार, पैसा, पद नहीं उसकी शालीनता होती है, चेहरे के रङ्ग की अपेक्षा श्रेष्ठ व्यवहार के ढ़ंग का प्रभाव ज्यादा पड़ता है।
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जो पर की निन्दा कर अपने को गुणी सिद्ध करता हैं, वह दूसरों को कटु औषधि पिलाकर स्वयं नीरोग होना चाहता है।
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