Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
चरित्र

रूसई णिन्दइ अण्णे, दूसइ बहुसो य सोयभयवहुलो। असुयइ परिभवइ परं, पसंसये अप्पयं बहुसो।। णय पत्तियइ परं सो, अप्पाणं यिव परं पि मण्णंतो। थूसइ अभित्थुवंतो, ण य जाणइ हाणि वड्ढिं वा।। मरणं पत्थेइ रणे, देइ सुबहुगं वि थुव्वमाणो दु। ण गणइ कज्जाकज्जं, लक्खण मेयं तु काउस्स।।

दूसरे के ऊपर क्रोध करना, दूसरे की निन्दा करना, अनेक प्रकार से दूसरों को दुःख देना अथवा औरों से बैर करना, अधिकतर शोकाकुलित रहना तथा भयग्रस्त रहना, दूसरों के ऐश्वर्यादि को सहन न कर सकना, दूसरे का तिरस्कार करना, अपनी नाना प्रकार से प्रशंसा करना, दूसरों के ऊपर विश्वास न करना, अपने समान दूसरों को भी मानना, स्तुति करने वाले पर सन्तुष्ट हो जाना, अपनी हानि वृद्धि को कुछ भी न समझना, रण में मरने की प्रार्थना करना, स्तुति करने वाले को खूब धन दे डालना, अपने करने योग्य अथवा नहीं करने योग्य का विवेक नहीं होना ये सब कापोत लेश्या वाले के चिन्ह है।

To be angry with others, to slander others, to give pain to others in many ways or to bear enmity, to remain mostly grief-stricken and fearful, to be unable to tolerate others' prosperity, to despise others, to praise oneself in many ways, to distrust others, to regard others as equal to oneself, to be pleased by flatterers, to have no regard for one's own loss or gain, to pray for death in battle, to lavish wealth on flatterers, and to lack discernment of what should and should not be done — all these are signs of one with the Kapot (grey) leshya.

— आराध्य सूत्र · #3

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